खेती करने वाली महिलाओं से लेकर कॉलेज प्रोफेसर तक, ब्रेस्ट मिल्क डोनेट कर बचाई 37 हजार बच्चों की जान!

खेती करने वाली महिलाओं से लेकर कॉलेज प्रोफेसर तक, ब्रेस्ट मिल्क डोनेट कर बचाई 37 हजार बच्चों की जान!

World Human Milk Donation Day: दुनिया में मां के दूध से बढ़कर कोई अमृत नहीं है। लेकिन कई बार बच्चे समय से पहले पैदा हो जाते हैं और उनकी मां उन्हें दूध पिलाने की स्थिति में नहीं होतीं। ऐसे में कमजोर और बीमार नवजात बच्चों के लिए गुजरात के मदर मिल्क बैंक किसी संजीवनी से कम नहीं हैं। पिछले 18 सालों में राज्य की 48,983 माताओं ने अपनी मर्जी से 14,966 लीटर ब्रेस्ट मिल्क (मां का दूध) दान किया है। इस पहल के तहत 37,771 बच्चों को नया जीवन मिला है।

पेश की इंसानियत की मिसाल

खेड़ा जिले के कापडवंज की रहने वाली 25 साल की किसान वर्षा डाभी का बच्चा 7 महीने में ही पैदा हो गया था। फेफड़े पूरी तरह विकसित न होने के कारण वह अहमदाबाद सिविल अस्पताल के एनआईसीयू (NICU) में भर्ती है। खुद परेशानी में होने के बावजूद वर्षा अस्पताल के मां वात्सल्य मदर्स मिल्क बैंक में अपना दूध दान कर रही हैं। उनका कहना है कि, उनके बच्चे के पीने के बाद जो दूध बच जाता है वह दूसरे बच्चों के काम आ जाता है।

इसी तरह 21 साल की सपना राव का बच्चा भी कमजोर है। सपना के पति इंद्रजीत का कहना है कि, अगर उनके बच्चे के हिस्से के बचे दूध से किसी दूसरे बच्चे की जान बचती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है। अस्पताल की नर्स खुशबू जानी बताती हैं कि, सपना ने पिछले एक महीने में 13 लीटर और वर्षा ने 5 लीटर दूध डोनेट किया है।

कॉलेज प्रोफेसर ने भी किया डोनेट

सिर्फ अस्पताल में भर्ती बच्चों की मां ही नहीं बल्कि अन्य महिलाएं भी इस नेक काम में आगे आ रही हैं। आरजी साइंस कॉलेज में बॉटनी (वनस्पति विज्ञान) की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ शीतल चौधरी भी नियमित रूप से ब्रेस्ट मिल्क डोनेट करती हैं। डॉ शीतल बताती हैं कि, उनके पहले बच्चे के समय उन्हें पर्याप्त दूध नहीं होता था जिससे उन्हें बहुत बुरा लगता था। अब उनका दूसरा बच्चा एक साल का हो गया है और खाना खाने लगा है। इसलिए वे अपना दूध जरूरतमंद बच्चों के लिए दान कर देती हैं।

ऐसे काम करता है मदर मिल्क बैंक

गांधीनगर मेडिकल कॉलेज की बाल रोग विशेषज्ञ डॉ गीत गुंजना खेतान बताती हैं कि, यह सिस्टम बहुत ही सुरक्षित तरीके से काम करता है:

  • सबसे पहले दूध दान करने वाली माताओं की काउंसलिंग की जाती है और उनका ब्लड टेस्ट होता है ताकि किसी तरह के इंफेक्शन का पता चल सके।
  • रिपोर्ट नॉर्मल आने पर मांएं ब्रेस्ट पंप की मदद से साफ बोतलों में दूध निकालती हैं।
  • इसके बाद दूध को पास्चराइज़्ड (खराब होने से बचाने और बैक्टीरिया मारने की प्रक्रिया) किया जाता है और डीप फ्रीजर में सुरक्षित रखा जाता है।
  • पूरी सुरक्षा तय करने के लिए पाश्चुरीकरण से पहले और बाद में दूध के सैंपल की लैब में जांच होती है।

सूरत से हुई थी इस पहल की शुरुआत

गुजरात में सरकारी लेवल पर मदर मिल्क बैंक की शुरुआत 11 दिसंबर, 2008 को सूरत के स्मीमेर अस्पताल से हुई थी। इसे प्रोजेक्ट यशोदा नाम दिया गया था। इसके बाद वड़ोदरा वलसाड गांधीनगर और अहमदाबाद में भी ऐसे बैंक खोले गए।

अब सूरत में एक मोबाइल मिल्क वैन शुरू करने की तैयारी है जो, घर-घर जाकर डोनर माताओं से दूध इकट्ठा करेगी। इसके अलावा जल्द ही सौराष्ट्र इलाके के राजकोट, भावनगर और जामनगर में भी नए ह्यूमन मिल्क बैंक शुरू होने वाले हैं जिससे उस क्षेत्र के हजारों बच्चों को सीधा फायदा मिलेगा।

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