जबलपुर में ब्रिटिश शासनकाल में बनाई गई ऐतिहासिक इमारतें आज भी मजबूती से खड़ी हैं, लेकिन इन पर लगी घड़ियों की सुइयां थम चुकी हैं। शहर की पहचान रहे घंटाघर, गोकुलदास धर्मशाला, कमानिया गेट और नगर निगम मुख्यालय की एंटीक घड़ियां अब बदहाली का शिकार हैं। इनके रखरखाव और जीर्णोद्धार पर लाखों रुपए खर्च होने के बावजूद इनका ‘टिक-टॉक’ अब सुनाई नहीं देता। एक ओर शहर में कई पुराने और जर्जर मकान लगातार गिर रहे हैं, वहीं ब्रिटिश दौर की ये इमारतें आज भी मजबूती से खड़ी हैं। हालांकि, इन इमारतों की पहचान बनी घड़ियों को चलाए रखने में नगर निगम और प्रशासन नाकाम साबित हुए हैं। रखरखाव के नाम पर हर साल बजट खर्च किया जाता है, लेकिन कुछ ही समय बाद घड़ियां फिर बंद हो जाती हैं। समय की पाबंदी के लिए लगाई गई थीं घड़ियां ब्रिटिश काल में शहरवासियों को समय का पाबंद बनाने के उद्देश्य से प्रमुख स्थानों पर बड़ी घड़ियां लगाई गई थीं। रेलवे स्टेशन के पास गोकुलदास धर्मशाला में 1910 में और घंटाघर में 1921 में घड़ी स्थापित की गई। इसके बाद मुख्य बाजार फुहारा के पास त्रिपुरी कांग्रेस स्मारक, कमानिया गेट पर 1939 में और नगर निगम परिसर में 1942 में घड़ी लगाई गई। एक समय था जब इन घड़ियों की घंटियों की आवाज सुनकर शहरवासी अपनी घड़ियां मिलाया करते थे। घंटाघर को लेकर कहावत भी प्रचलित थी, ‘घंटाघर की चार घड़ी, चारों में जंजीर पड़ी, जब-जब घंटा बजता है, खड़ा मुसाफिर हंसता है।’ अब इनमें से कमानिया गेट की घड़ी केवल एक तरफ से चल रही है, जबकि घंटाघर का ऐतिहासिक घंटा महज शोपीस बनकर रह गया है। स्मार्ट सिटी और धरोहर संरक्षण के नाम पर लाखों खर्च धरोहरों के संरक्षण और स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत इन ऐतिहासिक स्थलों पर लाखों रुपए खर्च किए गए। कमानिया गेट के जीर्णोद्धार पर करीब 26 लाख रुपए, घंटाघर पर 41 लाख रुपए और गोकुलदास धर्मशाला के कायाकल्प पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए। इसके अलावा दिल्ली की हेरिटेज कंसल्टेंट कंपनी और ओडिशा से विशेषज्ञ घड़ीसाजों को बुलाकर भी लाखों रुपए खर्च किए गए। पुरानी चाबी से चलने वाली मैकेनिकल घड़ियों को इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम में बदला गया। इसके बावजूद नियमित रखरखाव की व्यवस्था नहीं होने से घड़ियां कुछ दिन चलने के बाद फिर बंद हो गईं। हालात ऐसे हैं कि बंद घड़ियां दिन में केवल दो बार ही सही समय दिखाती हैं। तीन पीढ़ियों ने संभाली इन घड़ियों की जिम्मेदारी जबलपुर के वॉच टावर विशेषज्ञ घड़ीसाज छोटू मियां, उनके बेटे मंजूर आलम और तीसरी पीढ़ी के मेहमूद आलम लंबे समय तक इन जटिल मैकेनिकल घड़ियों की देखभाल करते रहे हैं। वर्तमान में मेहमूद आलम आसपास के शहरों में जाकर भी ऐसी घड़ियों की मरम्मत करते हैं। मेहमूद के मुताबिक, अंग्रेजों के समय इन घड़ियों में चाबी भरने की व्यवस्था थी। मशीन में चाबी भरने के बाद घड़ी के भीतर लगा भार ऊपर जाता था और करीब एक सप्ताह बाद भार नीचे आने पर दोबारा चाबी भरनी पड़ती थी। यह सिस्टम लंबे समय तक चलता था। उनका कहना है कि नगर निगम ने पुरानी मशीनों को हटाकर इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम लगा दिया, लेकिन बारिश के मौसम में यह सिस्टम अक्सर खराब हो जाता है। कमानिया गेट की घड़ी सुधारी, भुगतान अब तक नहीं कुछ दिन पहले मेहमूद आलम ने कमानिया गेट की घड़ी को ठीक किया था। उनका कहना है कि इसके बदले नगर निगम की ओर से अब तक भुगतान नहीं किया गया है। उनका कहना है कि यदि निगम यह राशि चुका देता है तो वे उसी रकम से दूसरी ऐतिहासिक घड़ी को भी ठीक कर सकते हैं। घड़ी चौक में ही दो साल से घड़ी गायब शहर में घड़ियों की बदहाली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विजय नगर के जिस चौराहे का नाम ‘घड़ी चौक’ है, वहां से ही करीब दो साल से घड़ी गायब है। शहरवासी कहते हैं कि लोग अपने घरों में बंद घड़ी रखना अपशगुन मानते हैं, लेकिन जिम्मेदार तंत्र ऐतिहासिक घड़ियों के बंद होने के बावजूद बेपरवाह है। साइंस कॉलेज और अंजुमन इस्लामिया स्कूल में टावर तो बने, घड़ी नहीं लगी शहर की कुछ पुरानी इमारतों में घड़ी लगाने के लिए टावर तो बनाए गए, लेकिन घड़ियां नहीं लग सकीं। इनमें साइंस कॉलेज और अंजुमन इस्लामिया स्कूल जैसे भवन शामिल हैं। अब स्थिति देखकर शहरवासी व्यंग्य करते हैं कि शायद इन टावरों पर घड़ी नहीं लगना ही बेहतर रहा, वरना उनकी देखरेख की जिम्मेदारी भी इसी व्यवस्था के भरोसे होती।


