एक महिला, 80 गांव और बदलाव की बयार! ममता कुजूर बनीं आदिवासी उत्थान की मिसाल

एक महिला, 80 गांव और बदलाव की बयार! ममता कुजूर बनीं आदिवासी उत्थान की मिसाल

जशपुर के छोटे से गांव घोलेंग से निकली ममता कुजूर आज उस बदलाव की मिसाल बन चुकी हैं, जिसकी कल्पना अक्सर सिर्फ योजनाओं और कागजों तक सीमित रह जाती है। Jashpur district के इस सुदूर इलाके में उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य आदिवासी समाज के उत्थान को बना लिया। उनका काम सिर्फ सेवा नहीं, बल्कि एक ऐसी सामाजिक क्रांति है, जिसने पहाड़ी कोरवा और बिरहोर जैसे अत्यंत पिछड़े समुदायों तक साक्षरता की रोशनी पहुंचाई है।

साक्षरता: बदलाव की पहली शर्त

ममता कुजूर का स्पष्ट मानना है कि जब तक समाज शिक्षित नहीं होगा, तब तक वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझ ही नहीं सकता। यही सोच उनके काम की नींव बनी। उन्होंने गांव-गांव जाकर लोगों को शिक्षा के महत्व से जोड़ा और खासकर बच्चों व महिलाओं को पढ़ाई की मुख्यधारा में लाने का प्रयास किया।

एक कहानी, जिसने शुरू की बदलाव की शृंखला

उनके प्रयासों का सबसे प्रेरक उदाहरण बिरहोर समाज की एक लड़की की कहानी है, जो सीमित अवसरों के कारण आंध्रप्रदेश मजदूरी करने चली गई थी। ममता के संपर्क में आने के बाद वह वापस लौटी, शिक्षित हुई और आज अपने ही समाज के बच्चों को पढ़ा रही है। यह सिर्फ एक सफलता नहीं, बल्कि उस बदलाव की शुरुआत है, जो अब कई गांवों में दिखाई दे रहा है।

Tribal Literacy Movement: महिला सशक्तीकरण: समाज की असली ताकत

ममता का मानना है कि जब तक महिलाएं आर्थिक और कानूनी रूप से मजबूत नहीं होंगी, तब तक समाज में वास्तविक बदलाव संभव नहीं है। उन्होंने महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया। स्वसहायता समूहों के जरिए महिलाओं को संगठित कर उन्हें अपनी पहचान और आवाज दी।

ममता कुजूर ने आदिवासी समाज पर लुटाई ‘ममता’ (photo source- Patrika)

80 गांवों में फैली बदलाव की बयार

साल 2003 से ममता कुजूर ने संगठित तरीके से काम की शुरुआत की। उन्होंने करीब 80 गांवों में महिलाओं के स्वसहायता समूह बनाए और उन्हें सरकारी योजनाओं से जोड़ा। इसका परिणाम यह हुआ कि महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त हुईं और गांवों में सामाजिक अनुशासन बनाए रखने में अग्रणी भूमिका निभाने लगीं।

मानव तस्करी के खिलाफ जमीनी लड़ाई

जशपुर जैसे इलाकों में मानव तस्करी एक बड़ी समस्या रही है। ममता कुजूर ने इस मुद्दे पर भी मजबूती से काम किया। उन्होंने कई बच्चियों को तस्करों के चंगुल से छुड़ाकर सुरक्षित उनके घर पहुंचाया। उनके लगातार प्रयासों से इस क्षेत्र में तस्करी के मामलों में कमी देखने को मिली है।

संस्कृति और अधिकारों की रक्षा

सिर्फ शिक्षा और सशक्तीकरण ही नहीं, ममता ने आदिवासी समाज की संस्कृति और अधिकारों की रक्षा को भी प्राथमिकता दी। उन्होंने ‘जशपुर महिला मंच’ की स्थापना कर लोगों को वन अधिकारों और उनके पारंपरिक अधिकारों के प्रति जागरूक किया। इससे समुदाय में आत्मसम्मान और पहचान की भावना मजबूत हुई।

Tribal Literacy Movement: एक प्रेरणा, जो बदलाव को आगे बढ़ा रही है

ममता कुजूर की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि उस सोच की है जो समाज को भीतर से बदलने का काम करती है। उन्होंने यह साबित कर दिया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो संसाधनों की कमी भी रास्ता नहीं रोक सकती। आज उनका काम न केवल जशपुर बल्कि पूरे प्रदेश के लिए एक प्रेरणा बन चुका है।

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