जौनपुर में ‘श्री द्वारिकाधीश लोक संस्थान’ पिछले 40 वर्षों से अवधी लोक संस्कृति और गीतों के संरक्षण में जुटा है। बक्शा विकास खंड के चुरावनपुर स्थित यह संस्थान न केवल स्थानीय स्तर पर लोकगीतों को जीवित रखे हुए है, बल्कि इन्हें फिजी और सूरीनाम जैसे देशों में बसे भारतीय परिवारों तक भी पहुंचा रहा है। इस संस्थान की नींव चार दशक पहले चिकित्सक डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र ने रखी थी। उनका मुख्य उद्देश्य गांव की मिट्टी से जुड़ी चौताल, उलारा, डेढ़ ताल, बेलवइया, फगुआ, चहका, धमार और चैता जैसी लोक विधाओं को सहेजना था। स्व. वंशराज सिंह, स्व. बैजनाथ सिंह और स्व. पंचदेव सिंह ने इन विधाओं को पोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। पूर्वांचल विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और संस्थान के अध्यक्ष प्रो. मनोज मिश्र बताते हैं कि बड़ी संख्या में पूर्वांचल के गिरमिटिया श्रमिक फिजी और सूरीनाम में बसे हैं। इन परिवारों में आज भी भारतीय संस्कृति गहरी जड़ें जमाए हुए है। वहां के लोग इंटरनेट के माध्यम से संस्थान के इन गीतों से जुड़े हुए हैं। आज प्रो. मनोज मिश्र और उनकी टीम डॉ. राजेंद्र प्रसाद मिश्र के पदचिह्नों पर चलते हुए इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रही है। वर्तमान में विलुप्त हो रहे इन गीतों के प्रचार-प्रसार और संरक्षण में सुजियामऊ निवासी भैवा उर्फ श्रीपति उपाध्याय, डॉ. मनोज मिश्र, पंडित रामसकल दूबे, त्रिवेणी पाठक, कैलाश शुक्ल, प्रज्ञाचक्षु बाबू बजरंगी सिंह, बड़कऊ उपाध्याय, राम नवल शुक्ल और सत्यनाथ पांडेय जैसे लोग महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। प्रोफेसर मनोज मिश्र का कहना है कि आज होली के नाम पर जो अश्लील गीतों का प्रचलन है, उन्हें परिवार के साथ नहीं सुना जा सकता। इसके विपरीत, पारंपरिक होली गीतों में मधुरता, रस, अलंकार और प्रकृति के साथ सहज सामंजस्य का बोध होता है। ये गीत प्रकृति, समाज और पशु-पक्षियों का चित्रण करते हैं, जो हमें विलुप्त हो रहे प्राकृतिक जीवों के प्रति ध्यान आकर्षित करने में मदद करते हैं। फागुनी गीतों में बनन में कोयल कागा बोलय छतन पे बोलई है मोरव” व ‘घरवन वन में गौरैयो गौरैया चहचहानी च हो रामा पिया नहीं आए।इसके अलावा ‘सखियां सहेलियां भईली लरिकैया पिया नहीं आए और चमेली व बेला फूलों पर बने गीत अलंकरण की शोभा बढ़ाते थे। उन्होंने कहा कि संस्थान का प्रयास है कि यह परंपरा विलुप्त न होने पाए। यूट्यूब के जरिए वैश्विक पहचान
संस्थाम ने आधुनिक तकनीक का सहारा लेते हुए दुर्लभ लोक गीतों के वीडियो यूट्यूब पर उपलब्ध कराए हैं। इससे भारत ही नहीं, बल्कि (फिजी, सूरीनाम) में बसे भारतीय भी इन गीतों के माध्यम से अपनी जड़ो से जुड़े हुए हैं।


