India Internet Shutdown Explainer : भारत में पहली बार इंटरनेट बैन 26 जनवरी 2012 को कश्मीर में लगाया गया था। इसके बाद से इंटरनेट बैन का यह सिलसिला राजस्थान और अन्य राज्यों में लगातार बढ़ता गया। डिजिटल एडवोकेसी ग्रुप ‘एक्सेस नाउ’ (Access Now) के डेटा और उनकी रिपोर्ट “द रिटर्न ऑफ ऑथॉरिटेरियनिज्म” (The Return of the Authoritarianism) के अनुसार, साल 2021 में भारत में कम से कम 106 बार इंटरनेट शटडाउन किया गया था।
इस आंकड़े के साथ भारत लगातार 6 वर्षों तक विश्व स्तर पर सबसे अधिक इंटरनेट बैन लगाने वाला देश बना रहा। इसी वजह से भारत को दुनिया की “ग्लोबल इंटरनेट शटडाउन कैपिटल” (Global Internet Shutdown Capital) भी कहा जाता है।
‘एक्सेस नाउ’ के मुताबिक, साल 2025 में कुल 52 देशों में इंटरनेट शटडाउन देखने को मिला।

इंटरनेट शटडाउन: जम्मू-कश्मीर “जैसा” बनता राजस्थान
जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से एक बेहद संवेदनशील क्षेत्र है। इसके बावजूद पिछले कुछ सालों में राजस्थान, जम्मू-कश्मीर को पीछे छोड़कर इंटरनेट बैन के मामले में शीर्ष राज्यों में शामिल हो गया है।
‘इंटरनेटशटडाउन डॉट इन’ (Internetshutdowns.in) के अनुसार, जम्मू और कश्मीर इंटरनेट शटडाउन से सबसे ज्यादा प्रभावित केंद्र शासित प्रदेश रहा है, जहां 2012 से अब तक 411 बार इंटरनेट बंद किया जा चुका है। साल 2021 में हुए शटडाउन में से 85 अकेले जम्मू-कश्मीर में लागू किए गए थे।
लेकिन अगर पूर्ण राज्यों की बात करें, तो राजस्थान सबसे अधिक प्रभावित राज्य है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) के वकील कृष्णेश बापट के अनुसार, पिछले 3 वर्षों में राजस्थान में भारत के किसी भी अन्य राज्य (यहां तक कि जम्मू-कश्मीर) की तुलना में भी अधिक बार इंटरनेट बैन देखा गया है। हाल के समय में यहां 88 बार इंटरनेट बंद किया गया, और यदि जून 2026 के मामले को जोड़ दिया जाए तो राजस्थान का यह आंकड़ा 89 तक पहुंच जाता है।
इस आंकड़े के हिसाब से राजस्थान इस मामले में जम्मू कश्मीर जैसा है।

राजस्थान में इंटरनेट शटडाउन के प्रमुख मामले:
- जून 2026 (जयपुर): सोमवार, 08 जून 2026 को जयपुर में प्रशासन ने 24 घंटे के लिए इंटरनेट बंद कर दिया। इसका उद्देश्य जगतपुरा क्षेत्र में लगने वाले भारी ट्रैफिक जाम से आम जनता को स्थायी मुक्ति दिलाना था, ताकि जयपुर विकास प्राधिकरण (JDA) सड़क सीमा के भीतर बने 5 प्रमुख धार्मिक ढांचों को योजनाबद्ध और शांतिपूर्ण तरीके से हटा सके।
- जुलाई 2022 (उदयपुर): दर्जी कन्हैया लाल की हत्या के बाद फैले सांप्रदायिक तनाव के कारण यहां 6 दिनों तक इंटरनेट बंद रहा।
- 10 जून 2022 (आमेर): विधायकों को धमकी मिलने के कारण इंटरनेट बंद किया गया।
- मई 2022 (भीलवाड़ा और जोधपुर): 5 और 11 मई को भीलवाड़ा में हत्या व हमलों के बाद उपजा तनाव, और 3 मई को जोधपुर में ईद पर हुई सांप्रदायिक झड़पों के कारण।
- 4 अप्रैल 2022 (करौली): सांप्रदायिक झड़पों के कारण।
- 16 मार्च 2022 (झुंझुनू): एक धार्मिक जुलूस को शांतिपूर्ण ढंग से निकालने के लिए 12 घंटे का बैन लगाया गया था।
- अन्य राज्यों में इंटरनेट शटडाउन की स्थिति;
जम्मू और कश्मीर– 411 बार (2012 से अब तक)
राजस्थान– 89 बार
उत्तर प्रदेश– 29 से 30 बार
पश्चिम बंगाल– 12 से 16 बार
महाराष्ट्र और हरियाणा– 13 बार
बिहार– 12 बार - केरल, गोवा, आंध्र प्रदेश में ना के बराबर (कोई रिकॉर्ड नहीं) इंटरनेट बैन से सबसे कम प्रभावित (दक्षिणी राज्य)
नोट: भारत के उत्तरी राज्यों में इंटरनेट बैन होना एक आम बात बन चुकी है, जबकि दक्षिणी और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों (जैसे केरल, गोवा, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम और मिजोरम) में इंटरनेट बंद होने का रिकॉर्ड ना के बराबर है।
इंटरनेट शटडाउन से होने वाले नुकसान
इंटरनेट बंद होने से केवल सोशल मीडिया रील्स देखने या मैसेज भेजने में ही दिक्कत नहीं आती, बल्कि यह हमारी अर्थव्यवस्था को भी गंभीर रूप से चोट पहुंचाता है।
‘स्टैटिस्टा’ के आंकड़ों के अनुसार, साल 2019 में भारत में 4,000 घंटे से अधिक का इंटरनेट ब्लैकआउट रहा, जिससे 1.3 बिलियन अमेरिकी डॉलर (USD) का भारी नुकसान हुआ। इस नुकसान के कारण भारत दुनिया में तीसरा सबसे अधिक आर्थिक क्षति झेलने वाला देश बन गया था।
वैश्विक हिस्सेदारी: साल 2020 की रिपोर्टों के मुताबिक, इंटरनेट बैन के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को हुए कुल नुकसान का 70% से अधिक हिस्सा अकेले भारत के शटडाउन के कारण था।
भारत यह नुकसान क्यों उठा रहा है?
अब सवाल यह उठता है कि इतने भारी आर्थिक नुकसान के बाद भी प्रशासन ऐसे फैसले क्यों लेता है? दरअसल, इंटरनेट के माध्यम से सूचनाएं सबसे तेज फैलती हैं और इसी वजह से अफवाहों के भी तेजी से प्रसारित होने का खतरा रहता है। ऐसे में किसी भी अनहोनी या हिंसा को रोकने के लिए प्रशासन अस्थायी तौर पर (12 से 24 घंटे या उससे अधिक) इंटरनेट बैन का फैसला लेता है। सरकारी आदेशों में स्पष्ट रूप से लिखा होता है – “भड़काऊ सामग्री और कानून-व्यवस्था को बिगड़ने से रोकने के लिए इंटरनेट बैन किया जा रहा है।”
आर्थिक नुकसान क्यों होता है, समझिए
भारत में डिजिटलाइजेशन और हाई-स्पीड इंटरनेट के विस्तार के बाद वर्क फ्रॉम होम से लेकर गिग वर्कर्स (कैब और ऑटो ड्राइवर, ई-कॉमर्स डिलीवरी, डिजिटल मार्केटर और एसईओ (SEO) स्पेशलिस्ट, कंटेंट क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर, ऑनलाइन ट्यूटर) की नौकरियों की संख्या में भारी उछाल आया है। ये ऐसी नौकरियां हैं जो इंटरनेट के बिना हो नहीं सकतीं।
नैसकॉम और बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG) की संयुक्त रिसर्च के अनुसार, भारत में वर्तमान में लगभग 1.5 करोड़ (15 मिलियन) से अधिक फ्रीलांसर और गिग वर्कर्स हैं, जो पूरी तरह इंटरनेट के माध्यम से अपनी सेवाएं देते हैं। दुनिया के हर 4 फ्रीलांसरों में से 1 भारत से है। वैश्विक फ्रीलांसिंग मार्केट में भारत की हिस्सेदारी 20% से अधिक है। आगामी वर्षों में भारत में यह संख्या बढ़कर 2.3 करोड़ से अधिक होने की उम्मीद है।
भारत में 80 लाख (8 मिलियन) से अधिक लोग ऐसे हैं जो कंटेंट क्रिएशन (यूट्यूब, पॉडकास्ट, ब्लॉगिंग) को एक पार्ट-टाइम या फुल-टाइम करियर के रूप में अपना चुके हैं। इनमें से लगभग 2.5 लाख क्रिएटर इससे नियमित रूप से अच्छी कमाई कर रहे हैं।
भारत सरकार के नीति आयोग द्वारा जारी ‘India’s Booming Gig and Platform Economy’ रिपोर्ट के अनुसार, साल 2029-30 तक भारत में यह वर्कफोर्स तेजी से बढ़कर 2.35 करोड़ (23.5 मिलियन) होने का अनुमान लगाया गया है। ऐसे में अगर इंटरनेट बैन के मामले बढ़ते हैं जो इससे सीधे तौर पर इन्हें नुकसान पहुंच सकता है।
सुप्रीम कोर्ट और इंटरनेट बैन
जनवरी 2020 में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने “अनुराधा भसीन बनाम भारत संघ” मामले में एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अदालत ने कहा था कि इंटरनेट के माध्यम से सूचना प्राप्त करना भारतीय संविधान के तहत एक मौलिक अधिकार (Fundamental Right) है। अदालत ने साफ किया था कि इंटरनेट बैन का इस्तेमाल मनमाने ढंग से नहीं किया जा सकता; इसका उपयोग केवल सार्वजनिक आपातकाल या सुरक्षा को गंभीर खतरे के मामलों में ही सीमित अवधि के लिए किया जाना चाहिए।
इंटरनेट बैन: नुकसान बनाम फायदा
निष्कर्ष के तौर पर, जहां प्रशासन इसे आपातकालीन स्थिति में हिंसा और अफवाहों को रोकने का एक जरूरी कदम मानता है, वहीं दूसरी ओर नीतिगत विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट इसे नागरिकों के अधिकारों का हनन और देश के आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा झटका मानते हैं।


