संपादकीय: बढ़ते तापमान के खतरों से मुकाबले की तैयारी जरूरी

संपादकीय: बढ़ते तापमान के खतरों से मुकाबले की तैयारी जरूरी

करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले आया विनाशकारी मेगा अल नीनो फिर चर्चा में है। वैज्ञानिकों के ताजा विश्लेषण बताते हैं कि प्रशांत महासागर के सतही तापमान में असामान्य वृद्धि हो रही है। यदि ये हालात मेगा अल नीनो में बदलते हैं, तो 2026-27 में दुनिया को रेकॉर्ड तोड़ गर्मी, कमजोर मानसून और चरम मौसमी घटनाओं का सामना करना पड़ सकता है। अल नीनो कोई नई घटना नहीं है, लेकिन मेगा रूप में इसकी तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है। इसका सीधा असर मानसून पर पड़ता है, जिससे वर्षा का वितरण असंतुलित हो जाता है। कहीं सूखा तो कहीं बाढ़ की स्थिति बन सकती है। इसका व्यापक प्रभाव कृषि, जल संसाधन व खाद्य सुरक्षा तीनों पर पड़ता है।

भारत जैसे मानसून पर निर्भरता वाले देश के लिए यह चेतावनी किसी अलार्म से कम नहीं है। पहले ही जल संकट से जूझ रहे कई क्षेत्रों में हालात और बिगड़ सकते हैं। ऐसे में यह केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक संकट का भी संकेत है। निश्चित रूप से, पहले से ही जलवायु परिवर्तन का दबाव झेल रही दुनिया के लिए यह दोहरी चुनौती है। उत्तर भारत में गर्मी ने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं।

राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में लू का असर है। यह केवल मौसमी उतार-चढ़ाव नहीं, बल्कि आने वाले संकट की झलक है। आने वाले महीनों में हीट वेव अधिक तीव्र और लंबी होंगी। ऐसे हालात में सरकारों को हीट एक्शन प्लान पर काम शुरू कर देना चाहिए। शहरों में कूलिंग सेंटर, पीने के पानी की पर्याप्त व्यवस्था, अस्पतालों में आपात तैयारियां और समय पर चेतावनी प्रणाली जैसे बुनियादी कदम तुरंत उठाने चाहिए। डेटा-आधारित निर्णय, मौसम पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाना और स्थानीय स्तर पर निगरानी तंत्र इस संकट से निपटने में मददगार साबित हो सकते हैं। आपदा प्रबंधन एजेंसियों, नगर निकायों और स्वास्थ्य विभाग के बीच बेहतर समन्वय भी समय की मांग है। इसके साथ ही, शहरी नियोजन में हरित क्षेत्र बढ़ाना, कंक्रीट के फैलाव को नियंत्रित करना और जल संरक्षण को प्राथमिकता देना दीर्घकालिक समाधान का हिस्सा होना चाहिए। हालांकि, केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। नागरिकों की भूमिका भी उतनी ही अहम है। अत्यधिक गर्मी में अनावश्यक बाहर निकलने से बचना, पर्याप्त पानी पीना और बुजुर्गों व बच्चों का विशेष ध्यान रखने जैसे छोटे-छोटे कदम बड़े संकट को टाल सकते हैं।

सामाजिक स्तर पर जागरूकता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना विकसित करना आवश्यक है। मेगा अल नीनो की आशंका हमें यह याद दिलाती है कि जलवायु संकट अब भविष्य की नहीं, वर्तमान की हकीकत है। सवाल यह नहीं कि खतरा आएगा या नहीं, बल्कि यह है कि हम उसके लिए कितने तैयार हैं। यदि समय रहते ठोस कदम उठाए जाएं, तो इस संभावित तबाही के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

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