child labour in school: रतलाम के बजरंग नगर स्थित एक सरकारी स्कूल से सामने आया एक वायरल वीडियो इन दिनों शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। वीडियो में जो दिख रहा है, वह किसी एक दिन की लापरवाही नहीं, बल्कि एक ऐसे सिस्टम की झलक है, जहां स्कूलों का मूल उद्देश्य पढ़ाई धीरे-धीरे पीछे छूटता नजर आ रहा है। वीडियो में स्कूल के दरवाजे पर ताला लगा हुआ है, जबकि बच्चे स्कूल परिसर के बजाय इधर-उधर काम करते दिखाई दे रहे हैं। आरोप है कि यहां शिक्षक बच्चों से मिड-डे मील अपने घर मंगवाते हैं, उनसे पानी भरवाते हैं, बर्तन धुलवाते हैं और कई बार स्कूल समय में भी पढ़ाई नहीं होती।
मामले में जांच की बात सामने आई है, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई नई या एक दिन की घटना नहीं है। उनका दावा है कि लंबे समय से स्कूल में यही व्यवस्था चल रही है, लेकिन हर बार मामला सामने आने के बाद कुछ समय के लिए हलचल होती है और फिर सबकुछ पहले जैसा हो जाता है।
रतलाम का यह मामला भले ही इस समय चर्चा में है, लेकिन यह समस्या केवल एक जिले तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों से हर साल ऐसी घटनाएं सामने आती रही हैं, जो सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत को उजागर करती हैं।
सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले वीडियो और तस्वीरों में अक्सर बच्चे झाड़ू पोछा करते, पानी भरते, स्कूल परिसर की सफाई करते या मिड-डे मील से जुड़े काम करते नजर आते हैं। कुछ मामलों में तो बच्चों को खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हुए भी देखा गया है, जैसे ऊंची टंकियों की सफाई करना या भारी सामान उठाना। यह घटनाएं अलग-अलग जिलों की जरूर होती हैं, लेकिन इनकी प्रकृति लगभग एक जैसी होती है और यही बात इस पूरे मुद्दे को और ज्यादा गंभीर बना देती है।
हर साल सामने आती हैं ऐसी तस्वीरें
हर साल किसी न किसी जिले से ऐसी तस्वीरें सामने आती हैं। कुछ दिनों तक यह खबरें सुर्खियों में रहती हैं, मीडिया में बहस होती है, प्रशासन जांच के आदेश देता है और कुछ मामलों में जिम्मेदारों पर कार्रवाई भी होती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या इससे स्थिति में कोई स्थायी बदलाव आता है?
ज्यादातर मामलों में जवाब ‘नहीं’ होता है। वीडियो वायरल होने के बाद कुछ दिनों तक सख्ती दिखाई देती है, लेकिन धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है और फिर वही स्थिति दोबारा देखने को मिलती है। इस चक्र में सबसे ज्यादा नुकसान उन बच्चों का होता है, जिनके लिए स्कूल शिक्षा का केंद्र होना चाहिए, लेकिन वह काम करने की जगह बन जाता है।

लेकिन जब स्कूलों में ही बच्चों से सफाई, बर्तन धोने या अन्य काम करवाए जाते हैं, तो यह सीधे-सीधे इस कानून का उल्लंघन है। यह न केवल बच्चों के अधिकारों का हनन है, बल्कि उनके मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है।
ये वीडियो जो चर्चा में रहे
पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने इस समस्या की गंभीरता को उजागर किया है…
एमपी में
– रीवा: बच्चों से स्कूल के टॉयलेट साफ करवाने का मामला सामने आया था। वीडियो वायरल होने के बाद जांच और कार्रवाई की गई।
– शिवपुरी: छात्रों को स्कूल की पानी की टंकी साफ करते हुए देखा गया, जहां उनकी सुरक्षा भी खतरे में थी।
-2025 में नशेड़ी शिक्षकों के वीडियो लगातार चर्चा में बने रहे
-2026 में रतलाम के बजरंग नगर स्थित एक सरकारी स्कूल वीडियो पर विवाद भी वायरल है
यूपी में
मिर्जापुर : बच्चों से मिड-डे मील के बर्तन धुलवाने का वीडियो सामने आया।
हरदोई : बच्चियों से शिक्षक की मालिश करवाने का मामला सामने आया, जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया।
तो अब 2026 में भी यूपी के ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें बच्चे शिक्षकों के काम का रहे हैं। कानपुर और यूपी के एक गांव सीकरी के एक सरकारी स्कूल में पानी की टंकी की सफाई करते बच्चे दिखे, तो एक स्कूल में ईंटे उठाते हुए भी नजर आए
ऐसे नए वीडियो भी सोशल मीडिया पर लगातार वायरल होते रहे हैं। सभी मामलों में प्रशासन ने तत्काल कार्रवाई का दावा किया, लेकिन यह घटनाएं रुकने का नाम नहीं ले रहीं।
क्यों बार वायरल होते हैं सरकारी स्कूलों के ऐसे वीडियो
इस तरह की घटनाओं के बार-बार सामने आने का सबसे बड़ा कारण है, जवाबदेही की कमी। जब तक किसी मामले का वीडियो वायरल नहीं होता, तब तक अक्सर प्रशासन को इसकी जानकारी ही नहीं होती या फिर वह अनदेखी करता रहता है। और जब मामला सामने आता भी है, तो कार्रवाई अधिकतर औपचारिक ही रहती है।

क्या स्कूलों की नियमित निगरानी हो रही है? क्या अधिकारियों की जिम्मेदारी तय है? क्या शिकायतों पर समय पर कार्रवाई होती है? ये सवाल अब सिर्फ रतलाम के नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के सामने खड़े हैं।
बच्चों पर पड़ता है गहरा असर
मनोचिकिस्त्सक डॉ नरेंद्र सिंह राजपूत कहते हैं, स्कूल केवल किताबों और पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है। ऐसे में जब बच्चों को स्कूल में ही श्रम करने के लिए मजबूर किया जाता है, तो इसका असर उनके आत्मसम्मान और मानसिक स्थिति पर पड़ता है।
डॉ. राजपूत कहते हैं कि बचपन में मिले ऐसे अनुभव लंबे समय तक उनके मन में रहते हैं। इससे न केवल उनकी पढ़ाई प्रभावित होती है, बल्कि वे शिक्षा के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण भी विकसित कर सकते हैं। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि ऐसे अनुभवों के कारण बच्चे स्कूल छोड़ देते हैं या उनके अभिभावक उन्हें सरकारी स्कूलों में भेजने से कतराने लगते हैं।
समाज और सिस्टम के लिए चेतावनी
रतलाम का यह मामला केवल एक खबर नहीं है, बल्कि एक चेतावनी है, सिस्टम और समाज दोनों के लिए। अगर आज भी इन घटनाओं को ‘छोटी बात’ मानकर नजरअंदाज किया जाता रहा, तो आने वाले समय में यह अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य स्थिति बन जाएगी। उस स्थिति में सरकारी स्कूलों से निकलने वाले बच्चे शिक्षा से ज्यादा समझौते सीखेंगे और यह किसी भी समाज के लिए बेहद खतरनाक संकेत है।

फिर से करेंगे जांच
बच्ची से सफाई का वीडियो मिला था और जांच की थी तो बताया था वो स्कूल की बाई की बेटी है। यह ध्यान से नहीं देखा, वो स्कूल यूनिफार्म में थी। स्कूल खुलने पर फिर से जांच कर लेंगे। मध्याह्न भोजन की किसी ने शिकायत नहीं की है।
– विवेक नागर, बीआरसी, शिक्षा विभाग


