अब भी परिजनों के मोह से आगे नहीं बढ़ पा रहीं मायावती, क्यों नहीं बन पाईं बहुजन की नेता?

अब भी परिजनों के मोह से आगे नहीं बढ़ पा रहीं मायावती, क्यों नहीं बन पाईं बहुजन की नेता?

उत्तर प्रदेश में कुछ ही महीनों में विधान सभा चुनाव होने हैं। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया मायावती का कहना है कि वह राज्य में पांचवी बार बसपा की सरकार बनाने के लिए तैयारी में जुटी हैं। लेकिन, चुनाव से पहले उनकी पार्टी में जैसी उथल-पुथल है, उसे देखते हुए लगता है कि मायावती के लिए तैयारी उम्मीद से ज्यादा चुनौतीपूर्ण रहने वाली है। उनके सामने चुनौती पहले से ही गंभीर है, क्योंकि बसपा के पास उत्तर प्रदेश में एक भी विधायक-सांसद नहीं है। 2007 के बाद हुए सभी विधान सभा चुनावों में पार्टी लगातार नीचे ही गिरती गई है।

मायावती थीं एयरपोर्ट पर सीधे प्लेन तक गाड़ी ले जाने वालीं इकलौती पूर्व सीएम

एक समय ऐसा था जब मायावती देश की इकलौती पूर्व सीएम हुआ करती थीं, जिनकी गाड़ी को दिल्ली एयरपोर्ट पर विमान तक जाने की छूट थी। यह सुविधा उनका रुतबा बयान करने के लिए काफी है। तभी वह भारी बहुमत के साथ एक बार फिर पूर्व से मौजूदा सीएम बन गईं थीं। 2007 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में बसपा के 206 विधायक जीते थे। 30 फीसदी से ज्यादा वोट बसपा को मिले थे। उनके पास लोक सभा के 17 सांसद हुआ करते थे। उनकी हैसियत केंद्र की सरकार हिला देने तक की थी।

मायावती जब भारी बहुमत से जीत कर, अपने दम पर सीएम बनीं तो उनका रुतबा कई गुना बढ़ गया था। तब राजनीतिक पंडितों ने उनके और बसपा के बारे में कई बड़ी-बड़ी भविष्यवाणियां की थीं। किसी ने उन्हें 2009 के लोक सभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दावेदार बताया था तो किसी ने कहा था कि वह कांग्रेस से ज्यादा बड़ा खतरा बीजेपी के लिए बनेंगी। लेकिन ये सब बातें तात्कालिक और काल्पनिक साबित हुईं।

मायावती का वो फॉर्मूला जो पहली और आखिरी बार हुआ था हिट

2007 में मायावती जिस ऊंचाई पर पहुंची थीं, वह चरम साबित हुई और उसके बाद से वह लगातार उतार पर ही हैं। 2007 में मायावती ने नया प्रयोग किया था। अपने कोर वोट बैंक के साथ अगड़ी जातियों को भी साधा था। पहले मनुवादी बता कर ब्राह्मणों/अगड़ी जातियों का विरोध करने वाली मायावती ने 2007 में ब्राह्मणों को चुनाव में टिकट दिया। उनकी सोशल इंजीनियरिंग का असर यह रहा कि सपा से मुस्लिम, आरएलडी से जाट और बीजेपी से अगड़ी जाति के वोटर्स टूट कर बसपा के खेमे में गए। कोर दलित मतदाताओं का साथ तो रहा ही। मायावती ने न किसी पार्टी से गठबंधन किया था और न ही मैनिफेस्टो दिया था। फिर भी लगभग हर तीसरा वोट बसपा को ही मिला था। लेकिन, उनका यह प्रयोग काठ की हांडी साबित हुआ, जो चूल्हे पर एक ही बार चढ़ती है।

बहुजन की नेता क्यों नहीं बन सकीं मायावती

मायावती का राजनीति में उभार हुआ तो दलितों को ऐसा लगा था कि उनके बीच की एक महिला नेता बन कर उभरी है और उन्हें एक आवाज मिली है। इसलिए उन्होंने बसपा को वोट दिया। 2007 में नायाब ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के जरिये मायावती ने वोट तो समाज के दूसरे वर्ग का भी ले लिया। लेकिन सारा आभामंडल अपने इर्द-गिर्द ही बुने रखा। उनका यह स्टाइल नया नहीं था, लेकिन 2007 के बाद यह और मजबूत ही होता गया। इसका उन्हें आगे चल कर खामियाजा भुगतना पड़ा। जहां वह अपने कोर वोट बैंक के अलावा सपा के मुस्लिम और भाजपा के अगड़ी जाति के वोटर्स छीनने में कामयाब रही थीं, वहीं आगे चल कर उनके पारंपरिक वोटर भी साथ नहीं रहे।

बहुजन नहीं, अपने जनों की पार्टी बना दी बसपा को

मायावती जब से सीएम बनीं, तब से बसपा पर अकेले की पकड़ बनाए रखीं। कांशीराम के नहीं रहने के बाद तो पार्टी पर एक तरह से उनका सम्पूर्ण एकाधिकार हो गया। पार्टी के ढलान का दौर शुरू होने के बाद भी उनका यही रवैया रहा। जब सवाल उनकी विरासत को आगे ले जाने का उठा, तब भी उन्हें पार्टी का कोई सिपाही नहीं, बल्कि अपने परिवार के लोग ही नजर आए।

10 सितंबर, 2026 को भतीजे आकाश आनंद को पार्टी से निष्कासित करने की जानकारी देते हुए मायावती ने जो ट्वीट किया, उसमें उन्होंने लिखा कि आकाश को पार्टी की सफलता से ज्यादा निजी व पारिवारिक स्वार्थ का मोह है। सच यह है कि खुद मायावती ने ऐसा संकेत बहुत ही कम दिया है कि वह पार्टी को आगे बढ़ाने के लिए व्यक्ति और परिवार से आगे उठ कर काम करने की मिसाल खड़ी कर रही हैं।

अध्यक्ष के तौर पर मायावती खुद पार्टी सुप्रीमो हैं और भाई आनंद कुमार को उपाध्यक्ष बना रखा है। उसी भाई के एक बेटे को संयोजक बना रखा था, जिसे अब पार्टी से हटा दिया है और दूसरे बेटे ईशान आनंद को हाल ही में सेक्टर 1 का इंचार्ज बना कर बड़ी ज़िम्मेदारी दी है। बता दें कि मायावती ने बसपा को दो सेक्टर में बांट रखा है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड को छोड़ कर बाकी राज्यों के लिए यह व्यवस्था है। एक सेक्टर में 10 राज्यों का क्लस्टर रखा गया है। इस लिहाज से संगठन में ईशान का पद काफी महत्व वाला है।

मायावती ने पहले आकाश को राष्ट्रीय संयोजक बना कर आगे बढ़ाया, फिर ईशान को आगे बढ़ाने लगीं। समझा जाता है कि बसपा का मौजूदा घमासान असल में परिवार की अंदरूनी लड़ाई का नतीजा है।

साधारण परिवार की होकर भी असाधारण जीवनशैली

मायावती का जन्म बड़े साधारण परिवार में हुआ था। उनका जन्म 15 जनवरी, 1956 को गाजियाबाद (उत्तर प्रदेश) जिले के बादलपुर में हुआ था। उनके पिता डाक विभाग में कर्मचारी थे। जब वह दो साल की थीं तो उनके पिता परिवार को लेकर दिल्ली के इंद्रपुरी में रहने के लिए आ गए थे। 1977 में मायावती ने शिक्षक की नौकरी कर ली। लेकिन वह इससे संतुष्ट नहीं थीं। वह काफी आगे जाना चाहती थीं। उन्होंने बीजेपी के केंद्रीय नेताओं से संपर्क बढ़ाना शुरू किया। 1977 के आम चुनाव में उन्होंने जनता पार्टी के लिए काम किया। 1980 में उनकी मुलाक़ात कांशीराम से हुई। वहीं से उनके जीवन की दिशा बदल गई।

1984 में 19 अप्रैल को मायावती बसपा की संस्थापक सदस्य बनीं। उन्होंने कांशीराम पर भी अपना जबरदस्त प्रभाव बना लिया था। ऐसा बहुत कम होता था कि मायावती की बात कांशीराम टाल दें।

1984, 1985 और 1987 में हारने के बाद 1989 में मायावती पहली बार बिजनौर से लोक सभा पहुंचीं। 1991 में वह फिर हार गईं। 1992 में बुलंदशहर से उपचुनाव जीत कर फिर लोक सभा पहुंचने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं रहीं। उल्टा बूथ कैप्चर करने के आरोप में गिरफ्तार कर ली गईं। तब 1993 में वह राज्य सभा गईं। 1995 में वह पहली बार मुख्यमंत्री बनीं।

मायावती जिस तरह एक साधारण पृष्ठभूमि से निकली नेता हैं, सार्वजनिक जीवन में उन्होंने इसके उलट आभामंडल बनाया। आम जनता, नेता, कार्यकर्ता से दूरी बना कर रखना, भारी सुरक्षा के साथ चलना, शाही अंदाज में जीना…ये सब उन्हें बहुजन के दिलों से दूर करता गया। उनकी जीवनशैली आज भी बहुत हद तक उसी तर्ज पर कायम है।

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