बरेली। दो रोज़ा उर्स-ए-ताजुश्शरिया का समापन सज्जादानशीन काज़ी-ए-हिन्दुस्तान मुफ्ती मोहम्मद असजद रज़ा खां कादरी की खुसूसी दुआ के साथ हुआ। दरगाह ताजुश्शरिया और दरगाह आला हजरत पर दो दिनों तक अकीदतमंदों का सैलाब उमड़ा और देश-विदेश से आए लाखों जायरीनों ने हाजिरी देकर फातिहा व दुआ में हिस्सा लिया।
उर्स की शुरुआत दरगाह ताजुश्शरिया पर फजर की नमाज के बाद कुरानखानी और नात-ओ-मनकबत की महफिल से हुई। सुबह कुल शरीफ की रस्म अदा की गई। मदरसा जामियातुर रज़ा में मुख्य कार्यक्रम आयोजित हुआ, जहां कारी रिज़वान ने तिलावत-ए-कुरान से कार्यक्रम की शुरुआत की और देशभर के नातख्वानों ने अपनी प्रस्तुतियां दीं। उलेमा-ए-किराम ने अपने खिताब में ताजुश्शरिया की जिंदगी और उनकी खिदमतों पर रोशनी डाली। मुफ्ती शाहजाद आलम मिस्बाही ने कहा कि बच्चों को दीनी और दुनियावी तालीम देना वक्त की सबसे बड़ी जरूरत है। उन्होंने खास तौर पर बच्चियों की शिक्षा पर जोर देते हुए मोबाइल से दूरी बनाए रखने की नसीहत दी।
दुनिया भर से पहुंचे उलेमा और जायरीन
उर्स में देश-विदेश से आए उलेमा-ए-इकराम और सज्जादानशीनों ने शिरकत की। बगदाद, साउथ अफ्रीका समेत कई देशों से आए मेहमानों ने ताजुश्शरिया की शख्सियत और उनकी इल्मी खिदमतों को याद किया। असर और मगरिब की नमाज में बड़ी संख्या में लोगों ने शिरकत की। शाम को कुल शरीफ की रस्म अदा की गई, जिसके बाद मुफ्ती असजद मियां ने देश में अमन-ओ-अमान और फिलिस्तीन के मुसलमानों की हिफाजत के लिए खुसूसी दुआ की। इसी के साथ दो रोज़ा उर्स का समापन हो गया।
ऑनलाइन भी जुड़े लाखों अकीदतमंद
जो जायरीन बरेली शरीफ नहीं पहुंच सके, उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से उर्स में शिरकत की। सोशल मीडिया और यूट्यूब पर लाइव प्रसारण के जरिए देश-विदेश में लाखों लोगों ने उर्स की बरकत हासिल की। जमात रज़ा-ए-मुस्तफा की विभिन्न शाखाओं के वॉलिंटियर्स ने जायरीनों की खिदमत में अहम भूमिका निभाई। लंगर, पानी, शरबत, ट्रैफिक और अन्य व्यवस्थाओं में उनका सराहनीय सहयोग रहा।


