इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने दुराचार के एक मामले में 11 साल से जेल में बंद एक अभियुक्त को उसकी अपील पर सुनवाई के बाद बरी कर दिया है। न्यायालय ने पुलिस जांच में गंभीर कमियां पाईं और कहा कि साक्ष्य के अभाव में अभियुक्त को दोषी ठहराना उचित नहीं है। यह फैसला न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति बृजराज सिंह की खंडपीठ ने निर्मल कुमार की अपील स्वीकार करते हुए सुनाया। यह मामला अयोध्या जनपद के मवई थाने से संबंधित है और वर्ष 2010 का है। वादी ने आरोप लगाया था कि उसकी 14 वर्षीय मानसिक दिव्यांग बेटी के साथ दुराचार हुआ था। घटना के तीन दिन बाद पीड़िता की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद, पीड़िता के पिता ने दुराचार के साथ-साथ हत्या का आरोप लगाते हुए प्राथमिकी (FIR) दर्ज कराई थी। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2018 में अपीलकर्ता को दुराचार के आरोप में दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। हालांकि, मृत्यु के कारण की पुष्टि न होने के कारण उसे हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को खारिज करते हुए कहा कि फॉरेंसिक रिपोर्ट में मानव वीर्य के नमूने तो मिले थे, लेकिन यह साबित नहीं हो सका कि वे नमूने आरोपी के थे। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि डीएनए टेस्ट या कोई अन्य ठोस जांच नहीं कराई गई थी, जिसे एक गंभीर त्रुटि माना गया। न्यायालय ने यह भी कहा कि ऐसे गंभीर आरोपों में केवल संदेह या आशंका के आधार पर किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं है। साक्ष्य के अभाव के कारण मामले में दोषसिद्धि को सुरक्षित नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है।


