जैसलमेर. पश्चिमी राजस्थान में पड़ रही भीषण गर्मी ने बिजली व्यवस्था की असल स्थिति उजागर कर दी है। जून की रिकॉर्ड गर्मी में जब तापमान 43 से 44 डिग्री सेल्सियस के बीच दर्ज हो रहा है, तब कूलिंग डिमांड अचानक बढ़ने से पूरा बिजली वितरण तंत्र दबाव में आ गया है।
नतीजा यह है कि शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार ट्रिपिंग, लो वोल्टेज और अनियमित कटौती आम बात बन गई है। रात के समय स्थिति और गंभीर हो जाती है, जब घरेलू खपत अपने चरम पर होती है। कई इलाकों में बार-बार बिजली गुल होने से लोगों की नींद प्रभावित हो रही है। उमस भरी गर्मी में कूलर और पंखे बंद होने से घरों के अंदर का वातावरण और अधिक असहनीय हो जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या केवल मौसम नहीं बल्कि पुराना नेटवर्क और सीमित अपग्रेडेशन भी है। कई इलाकों में 15–20 साल पुराने ट्रांसफार्मर अब बढ़ते लोड को संभालने में असमर्थ साबित हो रहे हैं। जैसलमेर का बिजली तंत्र इस समय दबाव और क्षमता के असंतुलन के बीच जूझ रहा है, जहां तत्काल तकनीकी सुधार ही राहत का एकमात्र रास्ता दिखता है।
ग्राउंड स्थिति
-ओवरलोड फीडर लगातार ट्रिप कर रहे
-पुराने केबल और लाइनें हीटिंग से प्रभावित
-शहरी विस्तार के अनुरूप ग्रिड अपग्रेड धीमा
मेंटेनेंस रिस्पॉन्स टाइम औसतन 3–5 घंटे
रात में बार-बार बिजली जाना अब रोज की बात हो गई है। बच्चे गर्मी से सो नहीं पाते। कूलर बंद होते ही घर का माहौल दमघोंटू हो जाता है। शिकायत करने पर भी तुरंत समाधान नहीं मिलता। ऐसा लगता है जैसे पूरा सिस्टम अनदेखी कर रहा हो
-रमेश कुमार, स्थानीय निवासी
दिन हो या रात, बिजली का भरोसा नहीं रहा। रसोई का काम भी प्रभावित हो रहा है। पानी की मोटर तक ठीक से नहीं चलती। छोटे बच्चे गर्मी से परेशान रहते हैं। सबसे ज्यादा दिक्कत रात की कटौती से होती है, नींद पूरी नहीं हो पाती।
– सुनीता देवी, गृहिणी
विशेषज्ञ विश्लेषण: सिस्टम डिज़ाइन पर दबाव
मौजूदा स्थिति ‘पीक लोड और पुरानी क्षमता के असंतुलन का परिणाम है। जब खपत अनुमान से ज्यादा बढ़ती है, तो ग्रिड स्थिरता प्रभावित होती है। स्मार्ट लोड मैनेजमेंट और फीडर अपग्रेड अब जरूरी हो गया है।
क्षेत्रवार लोड बैलेंसिंग, रियल टाइम मॉनिटरिंग और ट्रांसफार्मर अपग्रेडेशन को प्राथमिकता दी जाए, अन्यथा हर गर्मी में स्थिति और गंभीर हो सकती है। सिस्टम रिस्पॉन्स और भविष्य की चुनौती
शिकायत केंद्रों पर कॉल लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन समाधान समय लंबा होने से असंतोष भी बढ़ रहा है। फील्ड लेवल पर संसाधन सीमित होने की बात सामने आ रही है।
– विकास राठी, ऊर्जा विश्लेषक


