सावन माह के आगमन के साथ ही चंपारण के गांव-गांव में खेले जाने वाले झारा, झरखी, झरखा और ठकरा जैसे पारंपरिक लोक नृत्य, संगीत व नाट्य अब धीरे-धीरे आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त प्राय हो रहे हैं। भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, आपसी प्रेम और मानसिक शांति के प्रतीक ये मनभावन सुमधुर लोकगीत कभी हर गांव की पहचान हुआ करते थे। हालांकि, इस वर्ष सावन व महावीरी मेले के अवसर पर सिकटा विधानसभा क्षेत्र के बलथर गांव में इस समृद्ध परंपरा को फिर से जीवंत करने की एक सराहनीय पहल देखने को मिल रही है। गांव के युवाओं की टोली ने दो अलग-अलग ग्रुप बनाकर ठकरा व झरखी के आयोजन की कमान संभाली है। एक ग्रुप के अध्यक्ष संजय पटेल ने बताया कि लोकगीतों पर आधारित झरखी व ठकरा हमारी सनातन और पुरातन धरोहर है। बीच के दौर में यह परंपरा लुप्त हो चुकी थी, लेकिन इस साल गांव के युवाओं संदीप गुप्ता, गोलू मिश्रा, जितेंद्र श्रॉफ, रंजीत राही, भूलन पटेल, कुलदीप पटेल, अतुल मिश्रा, अमित पटेल, सुजीत गुप्ता सहित पूरी टीम ने मिलकर इसे फिर से शुरू किया है। हर रात आयोजित होने वाले इन कार्यक्रमों में लोकगीतों के साथ-साथ नाट्य नृत्य और हास्य कला के माध्यम से सामाजिक एकता का संदेश दिया जा रहा है।जिले के वरिष्ठ नागरिक केदार राय, ओमप्रकाश पांडेय, ललन पांडेय, नर्वदा मिश्र, नागेंद्र पांडेय और शंभू यादव ने बताया कि पहले हर महीने के हिसाब से लोक परंपराएं तय थी। फागुन में फगुआ, चैत में चैता, सावन में झरखा-ठकरा और कुआर-कार्तिक में नाटकों का मंचन होता था। इन आयोजनों में उम्र, जाति या मजहब की कोई दीवार नहीं होती थी। लोग भले ही औपचारिक रूप से कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन अपनी लोक संस्कृति, सामाजिक समरसता और स्वास्थ्य-सद्भाव को बनाए रखने में बेहद आगे थे। युवाओं की यह नई पहल निश्चित रूप से हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का काम करेगी। सावन माह के आगमन के साथ ही चंपारण के गांव-गांव में खेले जाने वाले झारा, झरखी, झरखा और ठकरा जैसे पारंपरिक लोक नृत्य, संगीत व नाट्य अब धीरे-धीरे आधुनिकता की चकाचौंध में लुप्त प्राय हो रहे हैं। भारतीय संस्कृति, सामाजिक समरसता, आपसी प्रेम और मानसिक शांति के प्रतीक ये मनभावन सुमधुर लोकगीत कभी हर गांव की पहचान हुआ करते थे। हालांकि, इस वर्ष सावन व महावीरी मेले के अवसर पर सिकटा विधानसभा क्षेत्र के बलथर गांव में इस समृद्ध परंपरा को फिर से जीवंत करने की एक सराहनीय पहल देखने को मिल रही है। गांव के युवाओं की टोली ने दो अलग-अलग ग्रुप बनाकर ठकरा व झरखी के आयोजन की कमान संभाली है। एक ग्रुप के अध्यक्ष संजय पटेल ने बताया कि लोकगीतों पर आधारित झरखी व ठकरा हमारी सनातन और पुरातन धरोहर है। बीच के दौर में यह परंपरा लुप्त हो चुकी थी, लेकिन इस साल गांव के युवाओं संदीप गुप्ता, गोलू मिश्रा, जितेंद्र श्रॉफ, रंजीत राही, भूलन पटेल, कुलदीप पटेल, अतुल मिश्रा, अमित पटेल, सुजीत गुप्ता सहित पूरी टीम ने मिलकर इसे फिर से शुरू किया है। हर रात आयोजित होने वाले इन कार्यक्रमों में लोकगीतों के साथ-साथ नाट्य नृत्य और हास्य कला के माध्यम से सामाजिक एकता का संदेश दिया जा रहा है।जिले के वरिष्ठ नागरिक केदार राय, ओमप्रकाश पांडेय, ललन पांडेय, नर्वदा मिश्र, नागेंद्र पांडेय और शंभू यादव ने बताया कि पहले हर महीने के हिसाब से लोक परंपराएं तय थी। फागुन में फगुआ, चैत में चैता, सावन में झरखा-ठकरा और कुआर-कार्तिक में नाटकों का मंचन होता था। इन आयोजनों में उम्र, जाति या मजहब की कोई दीवार नहीं होती थी। लोग भले ही औपचारिक रूप से कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन अपनी लोक संस्कृति, सामाजिक समरसता और स्वास्थ्य-सद्भाव को बनाए रखने में बेहद आगे थे। युवाओं की यह नई पहल निश्चित रूप से हमारी सांस्कृतिक जड़ों को मजबूत करने का काम करेगी।


