समस्तीपुर के निजी अस्पताल के डॉक्टर डीके शर्मा पर एक युवक के इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगा है। परिजनों का आरोप है कि इलाज में लापरवाही के कारण युवक का बायां पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। शिकायत मिलने के बाद सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार ने पांच डॉक्टरों की जांच कमेटी गठित की है। कमेटी को 7 दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। पीड़ित युवक बेगूसराय जिले के मंसूरचक थाना क्षेत्र के गोरापुर निवासी दुर्गेश ज्योति हैं। वह बिहार पुलिस में ड्राइवर के पद के लिए लिखित परीक्षा और शारीरिक दक्षता परीक्षा पास कर चुके थे। अब सिर्फ वाहन चलाने का ट्रायल होना बाकी था। हादसे के बाद उसकी नौकरी की उम्मीद भी टूट गई। फिलहाल वह समस्तीपुर के ज्योति अस्पताल में भर्ती हैं। मामले को लेकर मुफस्सिल थाने में भी आवेदन दिया गया है। पीड़ित के परिजनों ने सिविल सर्जन, डीएम समेत वरीय अधिकारियों से शिकायत की है। 4 अगस्त को ट्रक ने मारी थी टक्कर दुर्गेश बनवीरा गांव स्थित फिजिकल ट्रेनिंग सेंटर में बिहार पुलिस में ड्राइवर पद के लिए प्रशिक्षण ले रहा था। 4 अगस्त को वह बाइक से ट्रेनिंग सेंटर से वापस लौट रहा था। इसी दौरान रास्ते में एक ट्रक ने उसकी बाइक में टक्कर मार दी। हादसे में उसके बाएं पैर में गंभीर चोट आई। मौके से गुजर रहे एक टोटो चालक ने उसे उठाकर समस्तीपुर शहर के मोहनपुर रोड स्थित डॉ. डीके शर्मा के निजी अस्पताल में भर्ती कराया। वहां उसका इलाज शुरू हुआ।
एक्स-रे में फ्रैक्चर नहीं आया, डॉक्टर ने दो दिन में छुट्टी की बात कही थी दुर्गेश के अनुसार, अस्पताल पहुंचने के बाद उसका एक्स-रे कराया गया। इसमें पैर में फ्रैक्चर नहीं बताया गया। चोट पैर के निचले हिस्से के मांस में थी। इलाज शुरू करने के बाद डॉक्टर ने दो दिन में अस्पताल से छुट्टी देने की बात कही थी। टांका बाद में आकर कटवाने के लिए कहा गया था। पीड़ित का आरोप है कि तीन दिन बाद उसके पैर की स्थिति बिगड़ने लगी। पैर का रंग काला पड़ने लगा। जांच के बाद डॉक्टर ने इंफेक्शन होने की बात कही और संक्रमित त्वचा को हटाने की जरूरत बताई। परिजनों की सहमति के बिना त्वचा हटाने का आरोप दुर्गेश का आरोप है कि डॉक्टर ने परिजनों की सहमति के बिना पैर की पूरी संक्रमित त्वचा का ऑपरेशन कर उसे हटा दिया। इलाज के दौरान अलग-अलग किस्तों में एक लाख रुपए से अधिक खर्च होने की बात भी परिजनों ने कही है। पीड़ित के अनुसार, डॉक्टर ने बाद में बताया था कि घाव ठीक होने के बाद शरीर के दूसरे हिस्से से मांस लाकर पैर पर लगाया जाएगा। लेकिन स्थिति में सुधार होने के बजाय परेशानी बढ़ती गई। पैर में लगातार जलन होने लगी और धीरे-धीरे संवेदना भी खत्म हो गई।
13 अगस्त की एंजियोग्राफी रिपोर्ट से परिजन घबरा गए दुर्गेश के परिजनों के अनुसार, 13 अगस्त को पैर की एंजियोग्राफी कराई गई। रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें बताया गया कि पैर में संक्रमण गंभीर रूप ले चुका है और हड्डी तक पहुंच गया है। पैर काटने की नौबत आने की बात कही गई। इसके बाद परिजन दुर्गेश को रेफर कराकर पटना के आईजीआईएमएस ले गए। वहां डॉक्टरों ने स्थिति को गंभीर बताते हुए पीएमसीएच जाने की सलाह दी। पीएमसीएच में भीड़ को देखते हुए परिजन उसे पटना के एक निजी अस्पताल ले गए। परिजनों के अनुसार, वहां डॉक्टरों ने कहा कि पैर की स्थिति बेहद गंभीर है और जान बचाने के लिए पैर काटना जरूरी होगा। इसके बाद ऑपरेशन कर दुर्गेश का बायां पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। ‘समय रहते रेफर किया जाता तो पैर बच सकता था’ दुर्गेश के बहनोई पंचानन ठाकुर ने आरोप लगाया कि डॉक्टर को जब पैर की गंभीर स्थिति की जानकारी हो गई थी, तभी उसे बेहतर इलाज के लिए रेफर कर देना चाहिए था। समय रहते रेफर किया जाता तो संभव है कि पैर बच जाता। उन्होंने आरोप लगाया कि एंजियोग्राफी कराने में भी देरी की गई। उनका कहना है कि मरीज को अस्पताल में रोककर रखा गया, जिससे इलाज में देरी हुई। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच और दोषी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
आरोपी डॉक्टर बोले- मरीज की हालत शुरू से गंभीर थी डॉ. डीके शर्मा ने इलाज में लापरवाही के आरोप से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि मरीज की स्थिति शुरू से ही गंभीर थी और उसका उचित उपचार किया जा रहा था। डॉ. शर्मा के अनुसार, परिजनों को पैर की गंभीर स्थिति के बारे में जानकारी दी गई थी। संक्रमित मांस को हटाया गया था और उम्मीद थी कि घाव धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। उनका कहना है कि मरीज और उसके परिजन घबराकर अस्पताल से चले गए। डॉक्टर ने आरोप लगाया कि पटना में अन्य डॉक्टरों ने मरीज को डरा दिया और उसका पैर काट दिया। मेरी गलती नहीं है।
5 डॉक्टरों की कमेटी करेगी जांच सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार ने बताया कि शिकायत और मामले की गंभीरता को देखते हुए पांच डॉक्टरों की जांच कमेटी बनाई गई है। कमेटी में डॉ. विशाल कुमार, डॉ. सतेंद्र कुमार, डॉ. मनीष साह, डॉ. अभाष कुमार और डॉ. श्रवण कुमार शामिल हैं। कमेटी को सात दिनों के अंदर अपनी जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। रिपोर्ट में इलाज के दौरान क्या प्रक्रिया अपनाई गई, कहीं लापरवाही हुई या नहीं और पैर काटने की स्थिति किन परिस्थितियों में बनी, इन बिंदुओं की जांच की जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी। समस्तीपुर के निजी अस्पताल के डॉक्टर डीके शर्मा पर एक युवक के इलाज में लापरवाही बरतने का आरोप लगा है। परिजनों का आरोप है कि इलाज में लापरवाही के कारण युवक का बायां पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। शिकायत मिलने के बाद सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार ने पांच डॉक्टरों की जांच कमेटी गठित की है। कमेटी को 7 दिनों के अंदर अपनी रिपोर्ट सौंपनी है। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। पीड़ित युवक बेगूसराय जिले के मंसूरचक थाना क्षेत्र के गोरापुर निवासी दुर्गेश ज्योति हैं। वह बिहार पुलिस में ड्राइवर के पद के लिए लिखित परीक्षा और शारीरिक दक्षता परीक्षा पास कर चुके थे। अब सिर्फ वाहन चलाने का ट्रायल होना बाकी था। हादसे के बाद उसकी नौकरी की उम्मीद भी टूट गई। फिलहाल वह समस्तीपुर के ज्योति अस्पताल में भर्ती हैं। मामले को लेकर मुफस्सिल थाने में भी आवेदन दिया गया है। पीड़ित के परिजनों ने सिविल सर्जन, डीएम समेत वरीय अधिकारियों से शिकायत की है। 4 अगस्त को ट्रक ने मारी थी टक्कर दुर्गेश बनवीरा गांव स्थित फिजिकल ट्रेनिंग सेंटर में बिहार पुलिस में ड्राइवर पद के लिए प्रशिक्षण ले रहा था। 4 अगस्त को वह बाइक से ट्रेनिंग सेंटर से वापस लौट रहा था। इसी दौरान रास्ते में एक ट्रक ने उसकी बाइक में टक्कर मार दी। हादसे में उसके बाएं पैर में गंभीर चोट आई। मौके से गुजर रहे एक टोटो चालक ने उसे उठाकर समस्तीपुर शहर के मोहनपुर रोड स्थित डॉ. डीके शर्मा के निजी अस्पताल में भर्ती कराया। वहां उसका इलाज शुरू हुआ।
एक्स-रे में फ्रैक्चर नहीं आया, डॉक्टर ने दो दिन में छुट्टी की बात कही थी दुर्गेश के अनुसार, अस्पताल पहुंचने के बाद उसका एक्स-रे कराया गया। इसमें पैर में फ्रैक्चर नहीं बताया गया। चोट पैर के निचले हिस्से के मांस में थी। इलाज शुरू करने के बाद डॉक्टर ने दो दिन में अस्पताल से छुट्टी देने की बात कही थी। टांका बाद में आकर कटवाने के लिए कहा गया था। पीड़ित का आरोप है कि तीन दिन बाद उसके पैर की स्थिति बिगड़ने लगी। पैर का रंग काला पड़ने लगा। जांच के बाद डॉक्टर ने इंफेक्शन होने की बात कही और संक्रमित त्वचा को हटाने की जरूरत बताई। परिजनों की सहमति के बिना त्वचा हटाने का आरोप दुर्गेश का आरोप है कि डॉक्टर ने परिजनों की सहमति के बिना पैर की पूरी संक्रमित त्वचा का ऑपरेशन कर उसे हटा दिया। इलाज के दौरान अलग-अलग किस्तों में एक लाख रुपए से अधिक खर्च होने की बात भी परिजनों ने कही है। पीड़ित के अनुसार, डॉक्टर ने बाद में बताया था कि घाव ठीक होने के बाद शरीर के दूसरे हिस्से से मांस लाकर पैर पर लगाया जाएगा। लेकिन स्थिति में सुधार होने के बजाय परेशानी बढ़ती गई। पैर में लगातार जलन होने लगी और धीरे-धीरे संवेदना भी खत्म हो गई।
13 अगस्त की एंजियोग्राफी रिपोर्ट से परिजन घबरा गए दुर्गेश के परिजनों के अनुसार, 13 अगस्त को पैर की एंजियोग्राफी कराई गई। रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें बताया गया कि पैर में संक्रमण गंभीर रूप ले चुका है और हड्डी तक पहुंच गया है। पैर काटने की नौबत आने की बात कही गई। इसके बाद परिजन दुर्गेश को रेफर कराकर पटना के आईजीआईएमएस ले गए। वहां डॉक्टरों ने स्थिति को गंभीर बताते हुए पीएमसीएच जाने की सलाह दी। पीएमसीएच में भीड़ को देखते हुए परिजन उसे पटना के एक निजी अस्पताल ले गए। परिजनों के अनुसार, वहां डॉक्टरों ने कहा कि पैर की स्थिति बेहद गंभीर है और जान बचाने के लिए पैर काटना जरूरी होगा। इसके बाद ऑपरेशन कर दुर्गेश का बायां पैर घुटने के ऊपर से काटना पड़ा। ‘समय रहते रेफर किया जाता तो पैर बच सकता था’ दुर्गेश के बहनोई पंचानन ठाकुर ने आरोप लगाया कि डॉक्टर को जब पैर की गंभीर स्थिति की जानकारी हो गई थी, तभी उसे बेहतर इलाज के लिए रेफर कर देना चाहिए था। समय रहते रेफर किया जाता तो संभव है कि पैर बच जाता। उन्होंने आरोप लगाया कि एंजियोग्राफी कराने में भी देरी की गई। उनका कहना है कि मरीज को अस्पताल में रोककर रखा गया, जिससे इलाज में देरी हुई। उन्होंने मामले की निष्पक्ष जांच और दोषी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
आरोपी डॉक्टर बोले- मरीज की हालत शुरू से गंभीर थी डॉ. डीके शर्मा ने इलाज में लापरवाही के आरोप से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि मरीज की स्थिति शुरू से ही गंभीर थी और उसका उचित उपचार किया जा रहा था। डॉ. शर्मा के अनुसार, परिजनों को पैर की गंभीर स्थिति के बारे में जानकारी दी गई थी। संक्रमित मांस को हटाया गया था और उम्मीद थी कि घाव धीरे-धीरे ठीक हो जाएगा। उनका कहना है कि मरीज और उसके परिजन घबराकर अस्पताल से चले गए। डॉक्टर ने आरोप लगाया कि पटना में अन्य डॉक्टरों ने मरीज को डरा दिया और उसका पैर काट दिया। मेरी गलती नहीं है।
5 डॉक्टरों की कमेटी करेगी जांच सिविल सर्जन डॉ. राजीव कुमार ने बताया कि शिकायत और मामले की गंभीरता को देखते हुए पांच डॉक्टरों की जांच कमेटी बनाई गई है। कमेटी में डॉ. विशाल कुमार, डॉ. सतेंद्र कुमार, डॉ. मनीष साह, डॉ. अभाष कुमार और डॉ. श्रवण कुमार शामिल हैं। कमेटी को सात दिनों के अंदर अपनी जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया है। रिपोर्ट में इलाज के दौरान क्या प्रक्रिया अपनाई गई, कहीं लापरवाही हुई या नहीं और पैर काटने की स्थिति किन परिस्थितियों में बनी, इन बिंदुओं की जांच की जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।

