आरक्षित सीटों पर धर्म परिवर्तन करने वाले उम्मीदवार क्यों? हाईकोर्ट ने चुनाव अयोग को भेजा नोटिस

मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने चुनाव आयोग (Election Commission) को एक याचिका की सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया है। इस याचिका में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों पर केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म मानने वाले उम्मीदवारों को ही चुनाव लड़ने की अनुमति देने की मांग की गई थी। मुख्य न्यायाधीश SA धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने इस मामले में चुनाव आयोग को नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं।

कोर्ट में हिंदू पक्ष कत्छी के संस्थापक अध्यक्ष अर्जुन संपत की याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट ने चुनाव आयोग को नोटिस भेजने का आदेश दिया है। इस केस की अगली सुनवाई 9 अप्रैल को होगी। अर्जुन संपत ने याचिका में कहा था कि संविधान के 1950 के आदेश के अनुसार, केवल हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति ही अनुसूचित जाति के सदस्य माने जा सकते हैं। जबकि कई राजनीतिक दलों ने तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनावों के लिए ऐसी आरक्षित सीटों पर उन लोगों को उम्मीदवार बनाया है, जो धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और अब ईसाई धर्म को मानते हैं।

उम्मीदवारों के धर्म-जाति प्रमाण पत्रों के जांच की मांग

अर्जुन संपत ने जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 का हवाला देकर कहा- चुनाव अधिकारियों का कर्तव्य है कि वे नामांकन के समय उम्मीदवारों के धर्म और जाति प्रमाण पत्रों की गहराई से जांच करें। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि एक चुनाव अधिकारी व्यवहारिक रूप से यह कैसे सुनिश्चित कर सकता है कि कोई उम्मीदवार किस धर्म का पालन कर रहा है? कोर्ट ने कहा कि अधिकारी आमतौर पर उम्मीदवार द्वारा दिए गए आवेदन और प्रमाण पत्र के आधार पर ही जांच करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी के पास धर्म परिवर्तन से जुड़े ठोस सबूत हैं तो उन्हें पेश करना होगा। चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि उसने 2008 में ही इस संबंध में अधिकारियों को जरूरी निर्देश जारी कर दिए थे। फिलहाल, हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को कोई भी अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया है। कोर्ट ने कहा है कि अगले 48 घंटों में कुछ भी नहीं बदलने वाला है। यह मामला सीधे तौर पर उस कानूनी प्रावधान से जुड़ा है, जिसमें धर्म परिवर्तन के बाद आरक्षण के लाभ समाप्त हो जाते हैं।

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