Morbi Ceramic Industry Crisis: अमेरिका-इजरायल-ईरान की जंग का असर पूरी दुनिया पर पड़ रहा है। इस युद्ध की लपटें गुजरात के मोरबी तक पहुंच गई हैं। इस जंग के चलते चार लाख से ज्यादा मजदूरों की जिंदगी ठहर गई है। कोरोना वाला वो मंजर आपको याद होगा, जब लाखों मजदूर भूखे-प्यासे, पैदल अपने घरों की तरफ चल पड़े थे? मोरबी के प्रवासी मजदूरों को डर है कि वही दिन फिर लौट आए हैं। इस बार कसूर न उनका है, न उनकी कंपनी का।
31 साल के विवेक 15 मार्च को सुबह उठे, काम पर गए और शाम तक बेरोजगार हो गए। कारण? हजारों किलोमीटर दूर ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमले। उस हमले ने होर्मुज स्ट्रेट को बंद करा दिया, जहां से भारत का ज्यादातर गैस आयात होता है। प्रोपेन और नेचुरल गैस की किल्लत हुई और मोरबी की सिरेमिक फैक्ट्रियों की भट्टियां एक-एक कर ठंडी पड़ने लगीं। पांच दिन बाद विवेक अपनी पत्नी और तीन बच्चों को लेकर उत्तर प्रदेश में अपने गांव लौट गए। उन्होंने कहा, “हम कुत्तों की तरह नहीं जीना चाहते, जैसे कोविड में जिए थे।”
600 में से 450 कंपनियां बंद
मोरबी सिर्फ एक शहर नहीं, यह भारत के सिरेमिक उद्योग का दिल है। टाइल्स, बाथटब, वॉश बेसिन, टॉयलेट, देश का 80 फीसदी सिरेमिक यहीं से आता है। 600 से ज्यादा कंपनियां, चार लाख से ज्यादा मजदूर और 6 अरब डॉलर का उद्योग। लेकिन आज इनमें से कम से कम 450 कंपनियां बंद पड़ी हैं। मोरबी सिरेमिक मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज अरवाडिया ने बताया कि 15 अप्रैल तक उन्हें उम्मीद थी कि हालात सुधर जाएंगे। लेकिन नहीं सुधरे। आज भी सिर्फ 100 के करीब यूनिट खुली हैं और उनमें से भी ज्यादातर में अभी उत्पादन शुरू नहीं हुआ है। कम से कम 15 दिन और ऐसा ही रहेगा। इस बंदी ने दो लाख मजदूरों को बर्बाद कर दिया है, जिनमें से 50 हजार से ज्यादा अपने गांव-घर लौट चुके हैं।
गैस है, पर इतनी महंगी कि पूछिए मत
मोरबी की करीब 60 फीसदी फैक्ट्रियां प्रोपेन पर चलती हैं, क्योंकि यह नेचुरल गैस से सस्ता पड़ता था। वही प्रोपेन अब मिल नहीं रही। नेचुरल गैस उपलब्ध है, लेकिन नया कनेक्शन 93 रुपए प्रति किलो पर मिल रहा है, जबकि पुराने उपभोक्ताओं को 70 रुपए में। यह फर्क इतना बड़ा है कि तुरंत स्विच करना किसी के लिए भी आसान नहीं।
वॉशबेसिन बनाने वाले कारोबारियों का कहना है कि वे अभी एक महीना इंतजार करेंगे। क्योंकि अगर फैक्ट्री खोली तो सैकड़ों मजदूरों को वापस बुलाना होगा और उनकी जिम्मेदारी लेने से पहले उन्हें खुद पक्का यकीन चाहिए।
घर तो लौटे, पर साथ लाए ‘मोरबी बीमारी’
मोरबी में काम करने वाले कई वर्कर्स को सिलिकोसिस भी है, लेकिन लोग इसे नजरअंदाज कर देते हैं। सिलिकोसिस एक लाइलाज फेफड़ों की बीमारी है जो सिलिका की महीन धूल सांस में जाने से होती है। सिरेमिक फैक्ट्रियों में यह धूल हर जगह होती है।
गुजरात के श्रम अधिकार कार्यकर्ता चिराग चावड़ा ने बताया कि मोरबी में यह बीमारी बड़े पैमाने पर फैली हुई है। जो मजदूर सीधे मशीन पर काम नहीं करते, वो भी इस धूल से बच नहीं पाते, क्योंकि वेंटिलेशन की हालत बेहद खराब है। ज्यादातर कंपनियां सरकारी सुरक्षा नियमों का पालन ही नहीं करतीं। मोरबी के लोगों का कहना है कि हर कंपनी में हर साल कम से कम एक मजदूर सिलिकोसिस से मर जाता है।
मोरबी के हर मजदूर की एक कहानी
मोरबी के हर मजदूर की एक कहानी है। कंपनियां जानबूझकर अपॉइंटमेंट लेटर, सैलरी स्लिप, आईडी कार्ड नहीं देतीं। कोई सबूत नहीं तो कोई दावा नहीं। न पीएफ, न ईएसआई, न कोई मुआवजा। सालों काम करने के बाद भी मजदूर खाली हाथ रह जाते हैं, क्योंकि उनके पास कुछ साबित करने को है ही नहीं।
एक जंग जो मिडिल ईस्ट में लड़ी जा रही है, उसकी कीमत गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार के मजदूर चुका रहे हैं और उन्हें पता भी नहीं कि आगे क्या होगा।


