पटना | राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था दोहरे संकट से जूझ रही है। एक ओर शहर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधुनिक मशीनें और बेड होने के बावजूद मरीजों को 24 घंटे इमरजेंसी सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं, वहीं दूसरी ओर करोड़ों की जीवनरक्षक दवाएं असुरक्षित तरीके से रखे जाने के कारण बर्बादी की कगार पर हैं। कहते हैं जिम्मेदार : राजेंद्रनगर अस्पताल के प्रभारी डॉ. विनय ठाकुर ने कहा कि जून तक 24 घंटे इमरजेंसी सेवा शुरू करने का प्रस्ताव भेजा गया है। सिविल सर्जन डॉ. योगेंद्र प्रसाद मंडल ने कहा कि सभी सीएचसी में इमरजेंसी सेवा अनिवार्य है। कमियां दूर कर अगले माह तक सेवाएं बहाल होंगी।
गाइडलाइन बनाम हकीकत नियम : यूपीएचसी-सीएचसी में स्टेबलाइजेशन और बेसिक इमरजेंसी अनिवार्य। हकीकत : अधिकतर केंद्रों पर दोपहर बाद डॉक्टर और स्टाफ नदारद रहते हैं। औषधि भंडार : दवाओं का रखरखाव नहीं, जो फ्रिज में होनी चाहिए, वो बोरे में पटना के जिला औषधि भंडार की स्थिति भयावह है। यहां 450 प्रकार की दवाइयां सीढ़ियों, गलियारों और नमी वाले कमरों में डंप हैं। सबसे ज्यादा खतरा तापमान-संवेदनशील दवाओं (इंसुलिन और इंजेक्शन) को है, जिन्हें 2-8 डिग्री में रखना चाहिए, लेकिन वहां केवल दो फ्रिज हैं। दवाएं पुराने क्वार्टरों और गलियारों में रखी हैं, जहां बारिश का पानी घुसने का डर है। 70 संस्थानों की दवा सप्लाई का जिम्मा महज 2 फार्मासिस्टों पर है, जबकि जरूरत 10-12 विशेषज्ञों की है। नमी और गर्मी के कारण एंटीबायोटिक्स और इंसुलिन बेअसर हो रहे हैं।
असुरक्षित भंडारण के खतरे तापमान नियंत्रित न होने से दवाओं की क्षमता खत्म हो जाती है। अव्यवस्था के कारण एक्सपायर्ड दवाओं के वितरण का खतरा। मानक बनाम हकीकत | मानक : आधुनिक कोल्ड चेन, फायर सेफ्टी, रैक सिस्टम और पर्याप्त फार्मासिस्ट। हकीकत : सीढ़ियों पर रखे कार्टन, नमी वाले कमरे और संसाधनों का घोर अभाव। पटना के राजेंद्रनगर, दीघा मुशहरी और राजापुर पुल जैसे इलाकों में करोड़ों की लागत से बने स्वास्थ्य केंद्र केवल डे-केयर बनकर रह गए हैं। गाइडलाइन के मुताबिक इन केंद्रों पर 24 घंटे प्राथमिक इमरजेंसी, ऑक्सीजन और नेबुलाइजेशन की सुविधा होनी चाहिए, लेकिन दोपहर बाद यहां सन्नाटा पसर जाता है। राजेंद्रनगर सीएचसी में 30 बेड, आधुनिक ओटी और लेबर रूम है, लेकिन ओटी असिस्टेंट न होने से ऑपरेशन ठप है। एक्स-रे टेक्नीशियन न होने से मशीन डेढ़ साल से बंद है, जिससे मरीजों को निजी सेंटरों में 500 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर इलाज न मिलने से पीएमसीएच और एनएमसीएच जैसे मेडिकल कॉलेजों में भीड़ बेकाबू हो रही है। पटना | राजधानी की स्वास्थ्य व्यवस्था दोहरे संकट से जूझ रही है। एक ओर शहर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों और शहरी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में आधुनिक मशीनें और बेड होने के बावजूद मरीजों को 24 घंटे इमरजेंसी सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं, वहीं दूसरी ओर करोड़ों की जीवनरक्षक दवाएं असुरक्षित तरीके से रखे जाने के कारण बर्बादी की कगार पर हैं। कहते हैं जिम्मेदार : राजेंद्रनगर अस्पताल के प्रभारी डॉ. विनय ठाकुर ने कहा कि जून तक 24 घंटे इमरजेंसी सेवा शुरू करने का प्रस्ताव भेजा गया है। सिविल सर्जन डॉ. योगेंद्र प्रसाद मंडल ने कहा कि सभी सीएचसी में इमरजेंसी सेवा अनिवार्य है। कमियां दूर कर अगले माह तक सेवाएं बहाल होंगी।
गाइडलाइन बनाम हकीकत नियम : यूपीएचसी-सीएचसी में स्टेबलाइजेशन और बेसिक इमरजेंसी अनिवार्य। हकीकत : अधिकतर केंद्रों पर दोपहर बाद डॉक्टर और स्टाफ नदारद रहते हैं। औषधि भंडार : दवाओं का रखरखाव नहीं, जो फ्रिज में होनी चाहिए, वो बोरे में पटना के जिला औषधि भंडार की स्थिति भयावह है। यहां 450 प्रकार की दवाइयां सीढ़ियों, गलियारों और नमी वाले कमरों में डंप हैं। सबसे ज्यादा खतरा तापमान-संवेदनशील दवाओं (इंसुलिन और इंजेक्शन) को है, जिन्हें 2-8 डिग्री में रखना चाहिए, लेकिन वहां केवल दो फ्रिज हैं। दवाएं पुराने क्वार्टरों और गलियारों में रखी हैं, जहां बारिश का पानी घुसने का डर है। 70 संस्थानों की दवा सप्लाई का जिम्मा महज 2 फार्मासिस्टों पर है, जबकि जरूरत 10-12 विशेषज्ञों की है। नमी और गर्मी के कारण एंटीबायोटिक्स और इंसुलिन बेअसर हो रहे हैं।
असुरक्षित भंडारण के खतरे तापमान नियंत्रित न होने से दवाओं की क्षमता खत्म हो जाती है। अव्यवस्था के कारण एक्सपायर्ड दवाओं के वितरण का खतरा। मानक बनाम हकीकत | मानक : आधुनिक कोल्ड चेन, फायर सेफ्टी, रैक सिस्टम और पर्याप्त फार्मासिस्ट। हकीकत : सीढ़ियों पर रखे कार्टन, नमी वाले कमरे और संसाधनों का घोर अभाव। पटना के राजेंद्रनगर, दीघा मुशहरी और राजापुर पुल जैसे इलाकों में करोड़ों की लागत से बने स्वास्थ्य केंद्र केवल डे-केयर बनकर रह गए हैं। गाइडलाइन के मुताबिक इन केंद्रों पर 24 घंटे प्राथमिक इमरजेंसी, ऑक्सीजन और नेबुलाइजेशन की सुविधा होनी चाहिए, लेकिन दोपहर बाद यहां सन्नाटा पसर जाता है। राजेंद्रनगर सीएचसी में 30 बेड, आधुनिक ओटी और लेबर रूम है, लेकिन ओटी असिस्टेंट न होने से ऑपरेशन ठप है। एक्स-रे टेक्नीशियन न होने से मशीन डेढ़ साल से बंद है, जिससे मरीजों को निजी सेंटरों में 500 रुपए तक खर्च करने पड़ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर इलाज न मिलने से पीएमसीएच और एनएमसीएच जैसे मेडिकल कॉलेजों में भीड़ बेकाबू हो रही है।


