सुरक्षा, कूटनीति और नैरेटिव की परीक्षा

सुरक्षा, कूटनीति और नैरेटिव की परीक्षा

के. एस. तोमर, वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक – पहलगाम हमला उस पुराने और खतरनाक पैटर्न की याद दिलाता है, जिसका सामना भारत दशकों से करता आया है- पाकिस्तान के सुरक्षा ढांचे की ओर से पोषित सीमा-पार आतंकवाद। कूटनीतिक प्रयासों, युद्धविराम समझौतों व अंतरराष्ट्रीय आश्वासनों के बावजूद आतंक की बुनियादी संरचना जस की तस बनी हुई है। यह हमला जम्मू-कश्मीर में स्थिरता को बाधित करने, अंतरराष्ट्रीय ध्यान फिर से आकर्षित करने और सामान्य स्थिति के भारत के दावे को चुनौती देने की एक सुनियोजित कोशिश था। उरी-पुलवामा जैसी घटनाओं की तरह यह भी उसी निरंतरता का हिस्सा है, जहां हिंसा को रणनीतिक संकेत के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। भारत की प्राथमिकता आतंकवाद-रोधी ढांचे को और मजबूत करना होनी चाहिए। बेहतर खुफिया समन्वय, आधुनिक तकनीकी निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता इसकी बुनियाद हैं। हालांकि, प्रतिक्रिया केवल तात्कालिक प्रतिशोध तक सीमित नहीं रह सकती। एक दीर्घकालिक प्रतिरोधक रणनीति जरूरी है, जिसमें प्रत्यक्ष-परोक्ष दोनों उपाय शामिल हों।

कूटनीतिक मोर्चे पर भारत को वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने के प्रयासों को और तेज करना होगा। फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स जैसे मंचों पर मिली सफलता को आगे बढ़ाते हुए, भारत को अपने साझेदार देशों के साथ सक्रिय संवाद बनाए रखना चाहिए। यह स्पष्ट करना जरूरी है कि आतंकवाद के शिकार और उसके प्रायोजक के बीच कोई समानता नहीं हो सकती। पाकिस्तान की गैर-राज्य तत्वों पर निर्भरता उसकी सामरिक असमानता से उत्पन्न होती है। पारंपरिक सैन्य शक्ति में भारत का मुकाबला न कर पाने के कारण उसने लगातार प्रॉक्सी संगठनों का सहारा लिया है। पहलगाम की घटना यह दिखाती है कि यह नीति अब भी अपरिवर्तित है। इसका उद्देश्य केवल तत्काल नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि दीर्घकालिक मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव बनाए रखना है। क्षेत्र को अस्थिर रखकर इस्लामाबाद कश्मीर मुद्दे में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना चाहता है और भारत के एकीकरण के प्रयासों को कमजोर करना चाहता है। एक चिंताजनक पहलू यह है कि ट्रंप जैसे नेता पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व, विशेषकर जनरल असीम मुनीर, को संभावित मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश करते हैं। ऐसे प्रयास उस देश को वैधता प्रदान करते हैं, जिस पर लंबे समय से आतंकवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। यह न केवल भारत की स्थिति को कमजोर करता है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक सहमति को भी प्रभावित करता है।

चीन की भूमिका इस पूरे परिदृश्य को और जटिल बनाती है। पाकिस्तान के साथ उसका गहराता सैन्य और आर्थिक सहयोग क्षेत्रीय समीकरणों को बदल रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से लेकर उन्नत हथियारों की आपूर्ति तक, बीजिंग का समर्थन पाकिस्तान की क्षमताओं को मजबूत करता है। चीन के साथ संबंधों को संभालने के लिए भारत को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। रणनीतिक प्रतिस्पर्धा अपनी जगह है, लेकिन संवाद के रास्ते खुले रखना भी उतना ही जरूरी है। यह संदेश देना होगा कि पाकिस्तान के अस्थिरकारी कदमों को समर्थन देने के परिणाम द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेंगे। पहलगाम हमला यह स्पष्ट करता है कि आतंकवाद की चुनौती न केवल बनी हुई है, बल्कि लगातार बदल भी रही है। यह अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेपों की सीमाओं और बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों को भी उजागर करता है। भारत के लिए आगे का रास्ता संतुलन में है- सुरक्षा में दृढ़ता, कूटनीति में सक्रियता व नैरेटिव में स्पष्टता। तभी वह ऐसी त्रासदियों पर सिर्फ प्रतिक्रिया देने के बजाय स्थिर क्षेत्रीय व्यवस्था की दिशा में निर्णायक भूमिका निभा सकेगा।

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