Rajasthan: कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर सकेगी भारतीय वैज्ञानिकों की नई खोज, उदयपुर के सुविवि और IIT गुवाहाटी की रिसर्च

Rajasthan: कैंसर कोशिकाओं को खत्म कर सकेगी भारतीय वैज्ञानिकों की नई खोज, उदयपुर के सुविवि और IIT गुवाहाटी की रिसर्च

MLSU Research On Cancer Treatment: भारतीय वैज्ञानिकों ने फेफड़ों के कैंसर के इलाज के लिए एक नई तकनीक विकसित की है, जिससे बिना बड़े साइड इफेक्ट के कैंसर कोशिकाओं को शरीर के भीतर ही खत्म किया जा सकेगा। मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (उदयपुर), आइआइटी गुवाहाटी और भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने मिलकर बायो-फ्रेंडली नैनो-फेराइट्स तैयार किए हैं, जो कैंसर उपचार में गेम-चेंजर साबित हो सकते हैं।

यह शोध इंटरनेशनल जर्नल ‘जर्नल ऑफ अलॉयज एंड कंपाउंड्स’ में प्रकाशित हुआ है। शोध सुविवि के फिजिक्स विभाग के प्रोफेसर सुधीश कुमार के मार्गदर्शन में किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार रिसर्च अभी शुरुआती ‘इन-विट्रो’ (लैब में सेल्स पर) स्तर पर सफल रही है। आने वाले समय में इसे और बेहतर बनाकर इंसानों के क्लिनिकल ट्रायल के लिए तैयार किया जाएगा।

‘मैग्नेटिक हाइपरथर्मिया’ पर आधारित तकनीक

यह तकनीक ‘मैग्नेटिक हाइपरथर्मिया’ पर आधारित है। इसमें वैज्ञानिकों ने जिंक, मैग्नीशियम, कैल्शियम और आयरन जैसे तत्वों से बेहद सूक्ष्म चुंबकीय कण तैयार किए हैं। इन्हें कैंसर प्रभावित हिस्से तक पहुंचाकर बाहरी चुंबकीय क्षेत्र दिया जाता है, जिससे वहां नियंत्रित गर्मी पैदा होती है।रिसर्च में पाया गया कि 5 से 7 मिनट में तापमान 41 से 45 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचाया जा सकता है, जो कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए पर्याप्त है।

भविष्य में क्या होंगे फायदे

भविष्य में यह तकनीक कैंसर के इलाज के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है। इससे इलाज न केवल अधिक प्रभावी और सुरक्षित होगा, बल्कि मरीजों को लंबी और दर्दनाक प्रक्रियाओं से भी राहत मिल सकती है। शुरुआती प्रयोगों में फेफड़ों के कैंसर की लगभग 55 प्रतिशत कोशिकाओं को नष्ट करने में सफलता मिली है, जो इस शोध को और अधिक महत्वपूर्ण बनाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस तकनीक का असर केवल कैंसरग्रस्त कोशिकाओं तक सीमित पाया गया है, जबकि स्वस्थ कोशिकाओं, जैसे किडनी सेल्स पर किसी प्रकार का दुष्प्रभाव नहीं देखा गया। यदि आगे के क्लिनिकल ट्रायल सफल रहते हैं, तो यह इलाज कीमोथेरेपी जैसी पारंपरिक पद्धतियों की तुलना में अधिक लक्षित, कम दर्दनाक और कम साइड इफेक्ट वाला विकल्प बन सकता है। इसके साथ ही यह तकनीक भविष्य में अन्य प्रकार के कैंसर के इलाज में भी उपयोगी साबित हो सकती है और चिकित्सा क्षेत्र में नई उम्मीदें जगा सकती है।

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