मुजफ्फरपुर के कृषि वैज्ञानिक डॉ. गोपालजी त्रिवेदी को मरणोपरांत पद्मश्री:राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बेटे रमन त्रिवेदी को सौंपा सम्मान, टिकाऊ कृषि पद्धतियों को दी नई दिशा

मुजफ्फरपुर के कृषि वैज्ञानिक और शिक्षाविद् गोपालजी त्रिवेदी को मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। सोमवार को नई दिल्ली राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनके बेटे डॉ. रमन त्रिवेदी को प्रदान किया। डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का 12 मई को अकास्मिक निधन हो गया था। कृषि और किसानों के हित में किए गए उनके उल्लेखनीय कार्यों को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान के लिए चयनित किया था। उनके निधन के बाद यह सम्मान मरणोपरांत उनके परिवार को सौंपा गया। गोपालजी त्रिवेदी के सम्मान की 2 तस्वीरें देखिए किसानी में इनोवेशन, किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडल के लिए पहचान रखते थे गोपालजी मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड स्थित मतलुपुर गांव निवासी डॉ. त्रिवेदी कृषि क्षेत्र में अपने इनोवेशन और किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडल के लिए देशभर में पहचान रखते थे। उन्होंने विशेष रूप से मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची के पुराने बागानों को बचाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए “पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट” तकनीक विकसित की थी। साल 2003 में शुरू की गई इस तकनीक के तहत 40 से 50 वर्ष पुराने और कम उत्पादन देने वाले लीची पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई कर उन्हें दोबारा फलदार बनाया जाता था। इस तकनीक से हजारों लीची किसानों को फायदा मिला और पुराने बागानों को नई जिंदगी मिली। मखाना, सिंघाड़ा और मत्स्य आधारित खेती मॉडल को भी बढ़ावा दिया था डॉ. त्रिवेदी ने जलजमाव वाले क्षेत्रों में मखाना, सिंघाड़ा और मत्स्य आधारित समेकित खेती मॉडल को भी बढ़ावा दिया। उनके प्रयास से किसानों ने परती और जलजमाव वाली जमीन को भी खेती योग्य बनाकर उत्पादन बढ़ाया। उनके “बाबा परियोजना” मॉडल को कृषि क्षेत्र में एक अनूठे प्रयोग के रूप में पहचान मिली। वे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति भी रहे। कृषि विस्तार, तकनीकी आधारित खेती और किसानों की आय बढ़ाने के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे गांव में रहकर खेती करते रहे और किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देते रहे। लीची उत्पादक संघ के गठन में भी उनकी अहम भूमिका रही थी। मुजफ्फरपुर के कृषि वैज्ञानिक और शिक्षाविद् गोपालजी त्रिवेदी को मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया है। सोमवार को नई दिल्ली राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनके बेटे डॉ. रमन त्रिवेदी को प्रदान किया। डॉ. गोपालजी त्रिवेदी का 12 मई को अकास्मिक निधन हो गया था। कृषि और किसानों के हित में किए गए उनके उल्लेखनीय कार्यों को देखते हुए केंद्र सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान के लिए चयनित किया था। उनके निधन के बाद यह सम्मान मरणोपरांत उनके परिवार को सौंपा गया। गोपालजी त्रिवेदी के सम्मान की 2 तस्वीरें देखिए किसानी में इनोवेशन, किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडल के लिए पहचान रखते थे गोपालजी मुजफ्फरपुर जिले के गायघाट प्रखंड स्थित मतलुपुर गांव निवासी डॉ. त्रिवेदी कृषि क्षेत्र में अपने इनोवेशन और किसानों की आय बढ़ाने वाले मॉडल के लिए देशभर में पहचान रखते थे। उन्होंने विशेष रूप से मुजफ्फरपुर की प्रसिद्ध शाही लीची के पुराने बागानों को बचाने और उत्पादन बढ़ाने के लिए “पुनर्जीवन कैनोपी मैनेजमेंट” तकनीक विकसित की थी। साल 2003 में शुरू की गई इस तकनीक के तहत 40 से 50 वर्ष पुराने और कम उत्पादन देने वाले लीची पेड़ों की वैज्ञानिक तरीके से कटाई-छंटाई कर उन्हें दोबारा फलदार बनाया जाता था। इस तकनीक से हजारों लीची किसानों को फायदा मिला और पुराने बागानों को नई जिंदगी मिली। मखाना, सिंघाड़ा और मत्स्य आधारित खेती मॉडल को भी बढ़ावा दिया था डॉ. त्रिवेदी ने जलजमाव वाले क्षेत्रों में मखाना, सिंघाड़ा और मत्स्य आधारित समेकित खेती मॉडल को भी बढ़ावा दिया। उनके प्रयास से किसानों ने परती और जलजमाव वाली जमीन को भी खेती योग्य बनाकर उत्पादन बढ़ाया। उनके “बाबा परियोजना” मॉडल को कृषि क्षेत्र में एक अनूठे प्रयोग के रूप में पहचान मिली। वे डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद सेंट्रल एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति भी रहे। कृषि विस्तार, तकनीकी आधारित खेती और किसानों की आय बढ़ाने के क्षेत्र में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सेवानिवृत्ति के बाद भी वे गांव में रहकर खेती करते रहे और किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों की जानकारी देते रहे। लीची उत्पादक संघ के गठन में भी उनकी अहम भूमिका रही थी।  

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