इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गाजीपुर के एक हत्या मामले में एक आरोपी की सजा बरकरार रखी है तो दूसरे के खिलाफ पुख्ता सबूत नहीं होने के कारण संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति सिद्धार्थ और न्यायमूर्ति विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने वर्ष 2002 में दायर दो आपराधिक अपीलों का निस्तारण करते हुए एक अभियुक्त राम नगीना यादव को बरी कर दिया, जबकि दूसरे अभियुक्त वीरेंद्र यादव की उम्रकैद की सजा को बरकरार रखा। जानिये क्या है पूरा मामला 5 अगस्त 1998 की शाम करीब 7:30 बजे गाजीपुर जिले के जखनिया बाजार से लौट रहे त्रिभुवन राजभर की हत्या कर दी गई थी। शिकायतकर्ता दूधनाथ राजभर के भतीजे त्रिभुवन अपने साथियों धनई और शंभू के साथ गांव लौट रहे थे, तभी कवाला जखनिया के दक्षिण में झाड़ियों में छिपे आरोपियों ने उन्हें घेर लिया और देशी पिस्तौल से गोली मारकर हत्या कर दी। सत्र न्यायालय, गाजीपुर ने वर्ष 2002 में सभी आरोपियों को धारा 302/149 तथा 147 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अदालत ने पाया कि राम नगीना यादव के विरुद्ध केवल उकसाने की भूमिका बताई गई थी और अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि मृतक उनके विद्यालय के खिलाफ शिकायतें करता था। इसके अलावा, एक प्रत्यक्षदर्शी गवाह ने जांच अधिकारी के सामने राम नगीना यादव की उकसावे वाली भूमिका का कोई उल्लेख नहीं किया था और यह भूमिका पहली बार अदालत में ही बताई गई। इन परिस्थितियों में अदालत ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। वहीं वीरेंद्र यादव के मामले में अदालत ने पाया कि प्रत्यक्षदर्शी गवाहों के बयान और पोस्टमार्टम रिपोर्ट दोनों ने अभियोजन पक्ष के मामले की पुष्टि की। अतः उनकी सजा बरकरार रखी गई और जमानत रद्द कर तत्काल आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया गया। उल्लेखनीय है कि इस मामले से जुड़ी दो अन्य अपीलें श्याम नारायण यादव और रण नारायण उर्फ नारायण यादव की मृत्यु के कारण पहले ही 27 अप्रैल 2026 को अपील खारिज की जा चुकी थीं।


