‘दो साल की मेहनत का रिजल्ट आज इतने बड़े सम्मान के साथ मिला है। वाइस चांसलर, राज्यपाल, मुख्य अतिथि, अपने प्रोफेसर्स, बैचमैट्स के बीच गोल्ड मेडल मिलना गर्व महसूस करा रहा है। नालंदा यूनिवर्सिटी का कैंपस इतना अच्छा है, इतने ही अच्छे यहां के प्रोफेसर्स और स्टाफ हैं। बैचमेट्स और कैंपस के फ्रेंडली होने की वजह से पता ही नहीं चला कि दो साल कब और कैसे गुजर गए। मुझे कभी महसूस नहीं हुआ कि मैं अपने घर से दूर हूं।’ नालंदा यूनिवर्सिटी के तीसरे दीक्षांत समारोह में गोल्ड मेडल से सम्मानित होने वाली शैलजा झा ने ये बातें कही। शैलजा झा ने वर्ल्ड लिटरेचर में टॉप किया है, जिसकी वजह से उन्हें आज गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। शैलजा के साथ-साथ 6 अन्य छात्राओं और एक छात्र को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद देश-विदेश के 219 छात्र-छात्राओं को उनकी डिग्रियां और मेडल सौंपे गए। 20 से अधिक देशों के विद्यार्थियों की मौजूदगी वाले इस कैंपस में पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों ने इसे वैश्विक स्तर का एक शानदार एक्सपोजर बताया। समारोह के बाद छात्रों ने अपनी सफलता का श्रेय यहां के शांत शैक्षणिक माहौल, समर्पित फैकल्टी और कुलपति (वीसी) के कुशल नेतृत्व को दिया। इन 8 स्टूडेंट्स को मिला गोल्ड मेडल आकांक्षा बसुमातरी
कप्पाला स्वप्ना शालेम
कोठारी खुशी नरेंद्र
श्राबंती चक्रवर्ती
शैलजा झा
तियासा जेना
अनुष्का पद्मनाभ आंट्रोलिकर
जगताप प्रशांत जगन्नाथ आर्कियोलॉजी टॉपर बोली- राजगीर पुरातत्व के लिहाज से खजाना है दीक्षांत समारोह में पुरातत्व (आर्कियोलॉजी) और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के छात्रों ने मगध साम्राज्य और राजगीर के ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के बारे में बातचीत की। आर्कियोलॉजी टॉपर पियाशा जना ने कहा कि राजगीर पुरातत्व के लिहाज से एक खजाना है। यहां कई ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं और खुदाई का काम अभी भी जारी है। मैं भविष्य में शोध के लिए यहां दोबारा आना चाहूंगी। इंटरनेशनल रिलेशंस टॉपर अनुष्का ने कहा कि इतनी बड़ी हस्तियों के सामने सम्मानित होना गौरवपूर्ण है। मगध की इस ऐतिहासिक भूमि पर अंतर्राष्ट्रीय संबंध और शांति अध्ययन (पीस स्टडीज) की पढ़ाई करना हमारे लिए एक बेहतरीन अवसर रहा। बुद्धिस्ट स्टडीज की गोल्ड मेडलिस्ट छात्रा ने कहा कि राजगीर भगवान बुद्ध का प्रिय निवास (रिट्रीट सेंटर) रहा है। बुद्ध की इस धरती पर बौद्ध अध्ययन की लोकप्रियता अब भारतीयों के साथ-साथ विदेशियों में भी तेजी से बढ़ रही है। बंगाल की छात्रा बोली- ‘नेट जीरो’ कैंपस से सीखी सस्टेनेबिलिटी पर्यावरण और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) की पढ़ाई करने वाले छात्रों ने नालंदा विश्वविद्यालय के ईको-फ्रेंडली मॉडल को सराहा। पश्चिम बंगाल की छात्रा श्रबंती ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय खुद एक ‘नेट जीरो’ (Net Zero) कैंपस है। क्लाइमेट साइंस और प्रकृति के संरक्षण के लिए जो व्यावहारिक सीख हमें यहां मिली है, वह मेरी फाउंडेशन को मजबूत करेगी और मैं इसे पूरी दुनिया में लागू करना चाहती हूं। वहीं इकोलॉजी की छात्रा कपिला स्वप्ना ने भी नए छात्रों को नालंदा के इस अनूठे माहौल का अनुभव लेने के लिए आमंत्रित किया। भारतीय संस्कृति और वैश्विक सभ्यता का अद्भुत संगम पारंपरिक परिधान में नजर आए हिंदू स्टडीज के छात्र प्रशांत जगताप ने विश्वविद्यालय की बहुसांस्कृतिक पहचान पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नालंदा एक इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी है। लगभग 20 देशों के छात्रों के साथ पढ़ने से जो ग्लोबल एक्सपोजर और विभिन्न सभ्यताओं को समझने का मौका मिलता है, वह भारत में अद्वितीय है। उन्होंने अपने पहनावे पर गर्व जताते हुए इसे भारत की प्राचीन संस्कृति का प्रतीक बताया। बिजली, पानी, ऑक्सीजन के मामले में आत्मनिर्भर है नालंदा यूनिवर्सिटी नालंदा यूनिवर्सिटी दुनिया का सबसे बड़ा नेट जीरो कैंपस है। ये यूनिवर्सिटी पंचामृत सूत्र पर आधारित है। यहां 100 एकड़ में तालाब बने हुए हैं। वहीं 150 एकड़ में पौधे लगाए गए हैं। कार्बन एमिशन मामले में ये सरप्लस है। नालंदा यूनिवर्सिटी में 4 तालाबों का समूह है, जिसे कमल सागर नाम दिया गया है। कमल सागर में संरक्षित हो रहे पानी की वजह से आसपास के गांव में भूगर्भ जल स्तर में भी सुधार आया है। कैंपस के अंदर पर्याप्त छाया और सूक्ष्म जलवायु सुधार की व्यवस्था भी बनाई गई है। इमारतें ऐसी बनाई गई है जो गर्मी के मौसम में ठंडा और सर्दी के दिनों में गर्म रह सके। इसके लिए डेसिकेंट इवेपोरेटिव तकनीक का उपयोग किया गया है। थर्मल प्रतिरोध को बढ़ाने के लिए मोटी कैविटी की दीवारों का उपयोग पकाई हुई मिट्टी के ईटों के बजाय कंप्रेस्ड स्टेबलाइज अर्थ ब्लॉकस से किया गया है। ये यूनिवर्सिटी बाहरी वातावरण पर डिपेंड नहीं है। बिजली, पानी, ऑक्सीजन के मामले में आत्मनिर्भर है। कचरा प्रबंधन के लिए भी अपशिष्ट उपचार प्रणाली अपनाई गई है। नालंदा यूनिवर्सिटी 455 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें कुल 221 संरचनाएं हैं। तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 19 सितंबर 2014 को इसके निर्माण की नींव रखी गई थी। करीब 10 साल बाद इसका उद्घाटन जून 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। साल 427 में कुमार गुप्त ने की थी स्थापना प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना साल 427 में सम्राट कुमारगुप्त द्वारा की गई थी। 12वीं शताब्दी के अंत तक 800 से अधिक सालों तक यह संचालित होता रहा। बीच-बीच में आक्रमणकारियों का दंश भी झेलना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन विश्वविद्यालय में 2000 शिक्षक और 10000 छात्र रहते थे। 1199 में बख्तियार खिलजी द्वारा विश्वविद्यालय को जला दिया गया था। अब 815 साल बाद नालंदा फिर से एक नया इतिहास रचने जा रहा है। ‘दो साल की मेहनत का रिजल्ट आज इतने बड़े सम्मान के साथ मिला है। वाइस चांसलर, राज्यपाल, मुख्य अतिथि, अपने प्रोफेसर्स, बैचमैट्स के बीच गोल्ड मेडल मिलना गर्व महसूस करा रहा है। नालंदा यूनिवर्सिटी का कैंपस इतना अच्छा है, इतने ही अच्छे यहां के प्रोफेसर्स और स्टाफ हैं। बैचमेट्स और कैंपस के फ्रेंडली होने की वजह से पता ही नहीं चला कि दो साल कब और कैसे गुजर गए। मुझे कभी महसूस नहीं हुआ कि मैं अपने घर से दूर हूं।’ नालंदा यूनिवर्सिटी के तीसरे दीक्षांत समारोह में गोल्ड मेडल से सम्मानित होने वाली शैलजा झा ने ये बातें कही। शैलजा झा ने वर्ल्ड लिटरेचर में टॉप किया है, जिसकी वजह से उन्हें आज गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। शैलजा के साथ-साथ 6 अन्य छात्राओं और एक छात्र को गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया। दो साल की कड़ी मेहनत के बाद देश-विदेश के 219 छात्र-छात्राओं को उनकी डिग्रियां और मेडल सौंपे गए। 20 से अधिक देशों के विद्यार्थियों की मौजूदगी वाले इस कैंपस में पढ़ाई पूरी करने वाले छात्रों ने इसे वैश्विक स्तर का एक शानदार एक्सपोजर बताया। समारोह के बाद छात्रों ने अपनी सफलता का श्रेय यहां के शांत शैक्षणिक माहौल, समर्पित फैकल्टी और कुलपति (वीसी) के कुशल नेतृत्व को दिया। इन 8 स्टूडेंट्स को मिला गोल्ड मेडल आकांक्षा बसुमातरी
कप्पाला स्वप्ना शालेम
कोठारी खुशी नरेंद्र
श्राबंती चक्रवर्ती
शैलजा झा
तियासा जेना
अनुष्का पद्मनाभ आंट्रोलिकर
जगताप प्रशांत जगन्नाथ आर्कियोलॉजी टॉपर बोली- राजगीर पुरातत्व के लिहाज से खजाना है दीक्षांत समारोह में पुरातत्व (आर्कियोलॉजी) और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के छात्रों ने मगध साम्राज्य और राजगीर के ऐतिहासिक व पुरातात्विक महत्व के बारे में बातचीत की। आर्कियोलॉजी टॉपर पियाशा जना ने कहा कि राजगीर पुरातत्व के लिहाज से एक खजाना है। यहां कई ऐतिहासिक साक्ष्य मिले हैं और खुदाई का काम अभी भी जारी है। मैं भविष्य में शोध के लिए यहां दोबारा आना चाहूंगी। इंटरनेशनल रिलेशंस टॉपर अनुष्का ने कहा कि इतनी बड़ी हस्तियों के सामने सम्मानित होना गौरवपूर्ण है। मगध की इस ऐतिहासिक भूमि पर अंतर्राष्ट्रीय संबंध और शांति अध्ययन (पीस स्टडीज) की पढ़ाई करना हमारे लिए एक बेहतरीन अवसर रहा। बुद्धिस्ट स्टडीज की गोल्ड मेडलिस्ट छात्रा ने कहा कि राजगीर भगवान बुद्ध का प्रिय निवास (रिट्रीट सेंटर) रहा है। बुद्ध की इस धरती पर बौद्ध अध्ययन की लोकप्रियता अब भारतीयों के साथ-साथ विदेशियों में भी तेजी से बढ़ रही है। बंगाल की छात्रा बोली- ‘नेट जीरो’ कैंपस से सीखी सस्टेनेबिलिटी पर्यावरण और सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) की पढ़ाई करने वाले छात्रों ने नालंदा विश्वविद्यालय के ईको-फ्रेंडली मॉडल को सराहा। पश्चिम बंगाल की छात्रा श्रबंती ने बताया कि नालंदा विश्वविद्यालय खुद एक ‘नेट जीरो’ (Net Zero) कैंपस है। क्लाइमेट साइंस और प्रकृति के संरक्षण के लिए जो व्यावहारिक सीख हमें यहां मिली है, वह मेरी फाउंडेशन को मजबूत करेगी और मैं इसे पूरी दुनिया में लागू करना चाहती हूं। वहीं इकोलॉजी की छात्रा कपिला स्वप्ना ने भी नए छात्रों को नालंदा के इस अनूठे माहौल का अनुभव लेने के लिए आमंत्रित किया। भारतीय संस्कृति और वैश्विक सभ्यता का अद्भुत संगम पारंपरिक परिधान में नजर आए हिंदू स्टडीज के छात्र प्रशांत जगताप ने विश्वविद्यालय की बहुसांस्कृतिक पहचान पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि नालंदा एक इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी है। लगभग 20 देशों के छात्रों के साथ पढ़ने से जो ग्लोबल एक्सपोजर और विभिन्न सभ्यताओं को समझने का मौका मिलता है, वह भारत में अद्वितीय है। उन्होंने अपने पहनावे पर गर्व जताते हुए इसे भारत की प्राचीन संस्कृति का प्रतीक बताया। बिजली, पानी, ऑक्सीजन के मामले में आत्मनिर्भर है नालंदा यूनिवर्सिटी नालंदा यूनिवर्सिटी दुनिया का सबसे बड़ा नेट जीरो कैंपस है। ये यूनिवर्सिटी पंचामृत सूत्र पर आधारित है। यहां 100 एकड़ में तालाब बने हुए हैं। वहीं 150 एकड़ में पौधे लगाए गए हैं। कार्बन एमिशन मामले में ये सरप्लस है। नालंदा यूनिवर्सिटी में 4 तालाबों का समूह है, जिसे कमल सागर नाम दिया गया है। कमल सागर में संरक्षित हो रहे पानी की वजह से आसपास के गांव में भूगर्भ जल स्तर में भी सुधार आया है। कैंपस के अंदर पर्याप्त छाया और सूक्ष्म जलवायु सुधार की व्यवस्था भी बनाई गई है। इमारतें ऐसी बनाई गई है जो गर्मी के मौसम में ठंडा और सर्दी के दिनों में गर्म रह सके। इसके लिए डेसिकेंट इवेपोरेटिव तकनीक का उपयोग किया गया है। थर्मल प्रतिरोध को बढ़ाने के लिए मोटी कैविटी की दीवारों का उपयोग पकाई हुई मिट्टी के ईटों के बजाय कंप्रेस्ड स्टेबलाइज अर्थ ब्लॉकस से किया गया है। ये यूनिवर्सिटी बाहरी वातावरण पर डिपेंड नहीं है। बिजली, पानी, ऑक्सीजन के मामले में आत्मनिर्भर है। कचरा प्रबंधन के लिए भी अपशिष्ट उपचार प्रणाली अपनाई गई है। नालंदा यूनिवर्सिटी 455 एकड़ में फैला हुआ है। इसमें कुल 221 संरचनाएं हैं। तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने 19 सितंबर 2014 को इसके निर्माण की नींव रखी गई थी। करीब 10 साल बाद इसका उद्घाटन जून 2024 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया था। साल 427 में कुमार गुप्त ने की थी स्थापना प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना साल 427 में सम्राट कुमारगुप्त द्वारा की गई थी। 12वीं शताब्दी के अंत तक 800 से अधिक सालों तक यह संचालित होता रहा। बीच-बीच में आक्रमणकारियों का दंश भी झेलना पड़ा। ऐसा माना जाता है कि प्राचीन विश्वविद्यालय में 2000 शिक्षक और 10000 छात्र रहते थे। 1199 में बख्तियार खिलजी द्वारा विश्वविद्यालय को जला दिया गया था। अब 815 साल बाद नालंदा फिर से एक नया इतिहास रचने जा रहा है।


