Nagaur patrika news…बदलती खेती में भी नहीं टूटा बाजरे का दबदबा, जौ सबसे पीछे छूटा

Nagaur patrika news…बदलती खेती में भी नहीं टूटा बाजरे का दबदबा, जौ सबसे पीछे छूटा

चना-सरसों आगे बढ़े तो कपास और मोठ लगातार सिमटे

नागौर. जिंसों के कारोबार में जीरा एवं मूंग का वर्चस्व होने के बाद भी जिले में सबसे ज्यादा रकबा आज भी बाजरे का है। कृषि विभाग के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 में बाजरे का रकबा 1 लाख 56 हजार 644 हेक्टेयर था। इसके बाद अलग-अलग वर्षों में उतार-चढ़ाव आया, लेकिन यह फसल लगातार सबसे बड़े क्षेत्र में बोई जाती रही। वर्ष 2025-26 में भी इसका यानि की बाजरा का रकबा करीब 1 लाख 50 हजार 100 हेक्टेयर होने से साफ रहा है कि अभी भी यह बुवाई में पहले नंबर की फसल बनी हुई है।
नागौर जिले में पिछले पांच साल में खेती का मिजाज काफी बदला है। किसानों का रुझान अब धीरे-धीरे पारंपरिक फसलों से हटकर नकदी और कम जोखिम वाली फसलों की तरफ बढ़ा है। जीरा, इसबगोल, चना और सरसों जैसी फसलों ने तेजी पकड़ी, लेकिन इन बदलावों के बीच भी बाजरा जिले की सबसे बड़ी फसल बना रहा। वहीं जौ का रकबा लगातार सबसे नीचे बना रहा, जो जिले की बदलती खेती की तस्वीर भी दिखा रहा है। जिले में सबसे कम रकबा जौ का दर्ज किया गया। वर्ष 2020-21 में केवल 762 हेक्टेयर क्षेत्र में जौ बोया गया था। इसके बाद कुछ बढ़ोतरी जरूर हुई, लेकिन पांच साल बाद भी यह दूसरी फसलों की तुलना में बेहद पीछे रहा। वर्ष 2025-26 में इसका रकबा करीब 3 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा। कई क्षेत्रों में अब जौ की खेती सीमित किसानों तक ही सिमटती दिखाई दे रही है।
चना ने सबसे तेज बढ़ाया दायरा
पांच साल के कृषि आंकड़ों में सबसे बड़ा बदलाव चने के रकबे में देखने को मिला। वर्ष 2020-21 में जिले में चना केवल 23 हजार 767 हेक्टेयर क्षेत्र में बोया गया था, लेकिन वर्ष 2025-26 में इसका रकबा बढकऱ करीब 50 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया। यानी पांच साल में चने का क्षेत्र लगभग दोगुना हो गया। इसी तरह सरसों का रकबा भी करीब 35 हजार हेक्टेयर से बढकऱ 60 हजार हेक्टेयर तक पहुंचा, जबकि इसबगोल का रकबा भी 28 हजार हेक्टेयर से बढकऱ करीब 43 हजार हेक्टेयर तक पहुंच गया। कम पानी में बेहतर उत्पादन और बाजार में अच्छे दाम इन फसलों की बढ़ोतरी का बड़ा कारण माने जा रहे हैं।
कपास और मोठ लगातार खोते गए जमीन
जहां कुछ फसलों का दायरा बढ़ा, वहीं कपास और मोठ जैसी फसलों का रकबा कम होता गया। वर्ष 2020-21 में कपास का रकबा करीब 56 हजार 143 हेक्टेयर था। यह 2025-26 में घटकर करीब 37 हजार 250 हेक्टेयर रह गया। इसी तरह मोठ का क्षेत्र भी करीब 50 हजार हेक्टेयर से घटकर लगभग 33 हजार हेक्टेयर तक सिमट गया। कृषि विशेषज्ञ भंवरलाल शर्मा के अनुसार मौसम की अनिश्चितता, लागत बढऩा और उत्पादन जोखिम इन फसलों के कमजोर होने की बड़ी वजह रहे।

पिछले सालों में इन फसलों की स्थिति पर एक नजर
सबसे ज्यादा रकबा : बाजरा
2020-21 : 1,56,644 हेक्टेयर
2025-26 : 1,50,100 हेक्टेयर

सबसे कम रकबा : जौ
2020-21 : 762 हेक्टेयर
2025-26 : करीब 3,000 हेक्टेयर

सबसे तेजी से बढ़ा रकबा : चना
2020-21 : 23,767 हेक्टेयर
2025-26 : करीब 50,000 हेक्टेयर

क्या कहते हैं अधिकारी……
मसाला फसलों की बढ़ती स्पर्धा के बीच भी बाजरा का रुतबा कायम है। जिले की खेती में बाजरा रकबा पर आज भी कोई विशेष असर नहीं पड़ा है। इसका कारण है कि मुख्य खाद्य पदार्थों में आज भी बाजरा की महत्ता बनी हुई है।
मोहन दादरवाल, कार्यवाहक संयुक्त निदेशक, कृषि विभाग

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