Kalibangan : राजस्थान में देश-दुनिया को सभ्यता की सीख देने वाला कालीबंगा हुआ अदृश्य, मायूस लौट रहे पर्यटक

Kalibangan : राजस्थान में देश-दुनिया को सभ्यता की सीख देने वाला कालीबंगा हुआ अदृश्य, मायूस लौट रहे पर्यटक

Kalibangan : दुनिया को सुनियोजित शहर, जल निकासी व्यवस्था और प्राचीन कृषि के प्रमाण देने वाली सिंधु सभ्यता का महत्त्वपूर्ण केंद्र कालीबंगा आज खुद मिट्टी के टीलों में दफन नजर आता है। खुले अवशेष देखने की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले पर्यटकों को यहां सिर्फ पॉलिथीन से ढके टीले दिखाई देते है। वैज्ञानिक संरक्षण के नाम पर आधी सदी से ढके इस पुरास्थल को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं कि जब इतिहास दिखेगा ही नहीं, तो नई पीढ़ी उससे जुड़ कैसे पाएगी।

औजार, तस्वीरें प्रदर्शित

कालीबंगा संग्रहालय पहुंचने पर सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी कलाकृतियां, मिट्टी के बर्तन, औजार और तस्वीरें प्रदर्शित नजर आई। उत्खनन स्थल पर मिट्टी के उभरे हुए टीले दिखाई दिए। पास जाकर देखा तो इनके नीचे काली पॉलीथिन शीट बिछी थी।

इसी दौरान दातारामगढ़ से आए कुछ पर्यटकों ने पूछा ‘वह जगह कहां है, जहां खुदाई हुई थी?’ जब उन्हें बताया गया कि मिट्टी के टीले ही वह स्थल है, तो पर्यटक बाले कि यदि खुदाई वाला हिस्सा संरक्षित तरीके से खुला रखा जाता तो लोग उस सभ्यता को वास्तविक रूप में देख पाते।

सुरक्षित रखने के लिए ढका

इस संबंध में संग्रहालय अधीक्षक सीबी उपाध्याय ने बताया कि तेज गर्मी, बारिश, रेतीले तूफान, जमीन की नमी और प्राकृतिक कटाव के कारण संरचनाएं क्षतिग्रस्त होने लगती हैं। इसी वजह से अवशेषों को पॉलीथिन शीट और मिट्टी से ढक दिया है।

पुरातात्विक पार्क बन सकता है विकल्प

विशेषज्ञों का मानना है कि चयनित हिस्सों को शेड, ग्लास कवर, नियंत्रित वॉक-वे और बैरिकेडिंग के जरिए सुरक्षित रखते हुए पर्यटकों के लिए खोला जा सकता है। दुनिया के कई देशों में ओपन एयर पुरातात्विक पार्क मॉडल पर ऐतिहासिक स्थलों को संरक्षित और प्रदर्शित किया जा रहा है।

कालीबंगा राजस्थान का संभावित हेरिटेज टूरिज्म हब

कालीबंगा केवल पुरास्थल नहीं, बल्कि राजस्थान का संभावित हेरिटेज टूरिज्म हब है। यदि यहां विजिटर फ्रेंडली मॉडल विकसित किया जाए तो देश-विदेश से पर्यटक आकर्षित हो सकते हैं। नई पीढ़ी किताबों से ज्यादा दृश्य अनुभव से जुड़ती है।
प्रवीण भाटिया, शिक्षाविद् एवं इतिहासकार, सूरतगढ़

आधुनिकता की दौड़ में खेतों से गुम होती जा रही हैं छतरियां

वहीं रायसिंहनगर में गांवों की पगडंडियों और खेतों के बीच खड़ी पुरानी छतरियां कभी पुरखों की याद और ग्रामीण संस्कृति की पहचान हुआ करती थीं। यहां हर शाम दीपक जलता था, अगरबत्ती की खुशबू फैलती थी और परिवार के लोग श्रद्धा से अपने पूर्वजों को याद करते थे।

अब समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। ग्रामीण संस्कृति में पूर्वजों की स्मृति में बनाई जाने वाली ये छतरियां परिवार की भावनाओं और संस्कारों की धरोहर मानी जाती थीं। खेतों में जीवनभर मेहनत करने वाले बुजुर्गों के सम्मान में उनके परिजन छतरियां बनवाते थे। मान्यता थी कि पुरखे मृत्यु के बाद भी खेतों और परिवार की रक्षा करते हैं।

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