विजय गर्ग, (आर्थिक विशेषज्ञ एवं कर प्रणाली के जानकार)
भारत जैसे लोकतांत्रिक और लोक-कल्याणकारी देश में बैंकिंग व्यवस्था केवल आर्थिक लेन-देन का माध्यम नहीं, बल्कि आम नागरिक के विश्वास, सुरक्षा और भविष्य की योजना का महत्त्वपूर्ण आधार है। एक किसान, छोटा दुकानदार, वेतनभोगी कर्मचारी या मध्यमवर्गीय परिवार अपनी गाढ़ी कमाई बैंक में इसलिए जमा करता है, क्योंकि उसे भरोसा होता है कि यह संस्था उसके धन की सुरक्षा के साथ आवश्यकता पडऩे पर निष्पक्ष और पारदर्शी वित्तीय सहयोग भी उपलब्ध कराएगी। यह भरोसा दशकों की संस्थागत विश्वसनीयता, मजबूत नियामकीय ढांचे और बैंकिंग के सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित रहा है। किंतु आज यही भरोसा धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
प्रश्न यह नहीं है कि बैंकिंग व्यवस्था विफल हो गई है, बल्कि यह है कि क्या वह अपने मूल चरित्र से भटक रही है? बैंक और ग्राहक का संबंध केवल लेनदार और देनदार का नहीं, बल्कि विश्वास पर आधारित साझेदारी का है। जब कोई व्यक्ति बैंक में पैसा जमा करता है, तो वह अपने भविष्य की सुरक्षा भी उस संस्था के हाथों में सौंप देता है। इसलिए बैंकिंग व्यवस्था से सदैव नैतिकता, पारदर्शिता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती रही है। हालांकि आज नैतिकता और व्यावसायिकता के बीच संतुलन डगमगाता दिखाई देता है। बैंक अब केवल जमा और ऋण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निवेश, बीमा और अन्य वित्तीय उत्पादों की बिक्री में भी सक्रिय हैं। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब लाभ कमाने की दौड़ में ग्राहक हित और पारदर्शिता पीछे छूटने लगते हैं। तकनीक ने जहां पारदर्शिता बढ़ाई है, वहीं छिपे हुए शुल्कों और जटिल शर्तों के कारण ग्राहकों पर अदृश्य आर्थिक बोझ भी बढ़ा है। अनेक ग्राहकों के खातों से बिना स्पष्ट जानकारी या सहमति के राशि काट ली जाती है। यह कटौती सेवा शुल्क, पेनल्टी या ऋण से जुड़े अन्य शुल्कों के रूप में होती है। सबसे चिंताजनक स्थिति तब होती है, जब ऋण संबंधी शुल्कों को लोन खाते में दिखाने के बजाय सीधे बचत खाते से काट लिया जाता है। इससे ग्राहक अपनी वास्तविक देनदारी को स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाता और पारदर्शिता समाप्त हो जाती है।
यह केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि उस सोच का परिणाम है जिसमें ग्राहक को भागीदार के बजाय राजस्व का स्रोत मान लिया जाता है। भारत में बैंकिंग व्यवस्था एक सुदृढ़ नियामकीय ढांचे के तहत संचालित होती है। भारतीय रिजर्व बैंक समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी करता है तथा विभिन्न संस्थाएं इनके पालन की निगरानी करती हैं।हाल के वर्षों में ब्याज गणना को वास्तविक भुगतान तिथि से जोडऩे, पैनल ब्याज के स्थान पर निश्चित शुल्क लागू करने तथा ग्राहकों को स्पष्ट जानकारी देना अनिवार्य करने जैसे कई सुधार किए गए हैं। निस्संदेह, ये कदम सही दिशा में हैं, लेकिन वास्तविक चुनौती इनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। यदि संस्थानों के भीतर नैतिकता कमजोर हो, तो नियम केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं। बैंक और ग्राहक के बीच सबसे बड़ी खाई जानकारी की है। बैंक जटिल कानूनी भाषा और तकनीकी शब्दों का प्रयोग करते हैं, जबकि अधिकांश ग्राहक इन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाते। कई बार ग्राहक को यह भी पता नहीं चलता कि उसने किन शर्तों पर सहमति दी है और किस आधार पर उससे शुल्क वसूला जा रहा है। यह स्थिति केवल वित्तीय नहीं, बल्कि नैतिक समस्या भी है।
जब नियामकीय तंत्र की सीमाएं सामने आती हैं, तब न्यायपालिका हस्तक्षेप करती है। अदालतों ने स्पष्ट किया है कि अत्यधिक ब्याज दरें, छिपे हुए शुल्क और अनुचित व्यवहार ग्राहकों के अधिकारों का उल्लंघन हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने ‘फेयर प्रैक्टिस कोड फॉर लेंडर्स’ सहित कई महत्त्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। वहीं सर्वोच्च न्यायालय ने भी अवैध चक्र वृद्धि दंड वसूली को अनुचित व्यापार व्यवहार माना है। ‘स्मॉल स्केल इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में न्यायालय ने कहा कि मोरेटोरियम अवधि के दौरान ‘ब्याज पर ब्याज’ वसूलना स्वीकार्य नहीं है। साथ ही, किसी एक किस्त के विलंब पर केवल एक बार दंडात्मक शुल्क लगाया जा सकता है और उसे मूलधन में जोड़कर अतिरिक्त ब्याज वसूलना अवैध है। इस पूरी बहस में ग्राहक की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। लंबे समय तक ग्राहक बैंकिंग प्रक्रियाओं को लेकर निष्क्रिय रहे हैं। अब उन्हें अपने खातों की नियमित निगरानी करनी होगी और किसी भी अनियमितता के विरुद्ध आवाज उठानी होगी। एक समय था जब बैंकिंग को सेवा क्षेत्र के रूप में देखा जाता था, लेकिन आज यह प्रतिस्पर्धी व्यवसाय बन चुका है। इससे दक्षता बढ़ी है, पर सेवा भावना के क्षरण का खतरा भी पैदा हुआ है।
जब बैंक केवल लाभ को प्राथमिकता देते हैं, तो ग्राहक हित पीछे छूटने लगता है और भरोसा कमजोर पड़ता है। यह मुद्दा केवल बैंक और ग्राहक के बीच का विवाद नहीं, बल्कि वित्तीय संप्रभुता का प्रश्न है। यदि ग्राहक अपने ही धन पर पूर्ण नियंत्रण और पारदर्शिता महसूस नहीं करता, तो यह प्रणालीगत कमजोरी का संकेत है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए बैंकों में जवाबदेही, नियामकीय सख्ती और ग्राहकों की जागरूकता- तीनों आवश्यक हैं। वित्तीय साक्षरता को भी बढ़ावा देना होगा। दरअसल, बैंकिंग व्यवस्था की सबसे बड़ी पूंजी उसका मुनाफा नहीं, बल्कि विश्वास है। ग्राहकों के साथ पारदर्शी और न्यायसंगत व्यवहार केवल कानूनी आवश्यकता नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व भी है क्योंकि बैंकिंग केवल पैसे का लेन-देन नहीं, बल्कि भरोसे का अनुबंध है। यदि अनुबंध टूटता है तो उसका प्रभाव पूरे आर्थिक तंत्र पर पड़ता है।


