MP High Court: मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने भरण-पोषण मामले में बेटियों की पढ़ाई के लिए निचली अदालत द्वारा राशि तय नहीं किए जाने को लेकर नाराजगी जाहिर करते हुए टिप्पणी की कि महिला सशक्तीकरण केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, उसे वास्तविक रूप से लागू किया जाना आवश्यक है। जस्टिस गजेंद्र सिंह की कोर्ट ने पिता को दो बेटियों की उच्च शिक्षा के लिए 46 लाख 26200 रुपए देने का आदेश जारी किया। मेडिकल व इंजीनियरिंग शिक्षा में लगने वाली ये राशि पिता को चार माह में अदा करनी होगी। समय पर भुगतान न करने पर इस राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी लगेगा।
यह था पूरा मामला
मंदसौर में नर्सिंग कॉलेज चलाने वाली सोसायटी के अध्यक्ष की पत्नी और दो बेटियों ने भरण-पोषण को लेकर मंदसौर कोर्ट में केस लगाया था। कोर्ट ने पत्नी को 6 हजार और बेटियों को 3-3 हजार रुपए प्रतिमाह देने का आदेश दिया था। इसके खिलाफ पत्नी ने 1 लाख और बेटियों के लिए भी 1-1 लाख रुपए गुजारा भत्ता देने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। बताया था कि एक बेटी को किर्गिज स्टेट मेडिकल अकादमी में डॉक्टर के कोर्स में प्रवेश मिला है, जिसका अनुमानित खर्च लगभग 26.69 लाख रुपए है।
वहीं दूसरी बेटी को मणिपाल यूनिवर्सिटी, जयपुर में बीटेक में प्रवेश मिला, जिसका खर्च लगभग 19.56 लाख है। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि परिवार न्यायालय ने बेटियों की उच्च शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण खर्चों पर पर्याप्त विचार नहीं किया। पिता के पास पर्याप्त आर्थिक साधन हैं और वह खर्च वहन करने में सक्षम हैं। अदालत ने यह भी कहा कि आयकर रिटर्न वास्तविक आय को पूरी तरह प्रतिबिंबित नहीं करते, इसलिए परिस्थितियों के आधार पर वास्तविक आय का आकलन किया जाना चाहिए।
पिता का दायित्व है उच्च शिक्षा दिलाए
हाईकोर्ट ने आदेश में साफ कहा कि महिला सशक्तीकरण कागजों पर नहीं रह सकता, इसे व्यवहार में लागू करना भी आवश्यक है। पिता के पास पर्याप्त आय होने के बावजूद बेटियों को शिक्षा से वंचित नहीं किया जा सकता। एक पिता का दायित्व है कि वह बेटियों को उच्च शिक्षा के अवसर उपलब्ध कराए, विशेषकर तब जब वे मेडिकल और इंजीनियरिंग जैसे महंगे कोर्स कर रही हों। वह एक शैक्षणिक संस्थान व अन्य व्यवसायिक गतिविधियों से जुड़ा है और उसके पास वाहन और बैंक खाते भी हैं।


