डॉलर के मुकाबले रुपये को गिरने से बचाने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने मोर्चा संभाल लिया है। केंद्रीय बैंक के नए कदमों का असर बाजार में दिखने भी लगा है। मंगलवार को शुरुआती कारोबार में रुपया करीब 0.7 फीसदी मजबूत होकर 95.16 प्रति डॉलर तक पहुंच गया। इससे पहले सोमवार को रुपया एक दिन में छह महीने की सबसे बड़ी बढ़त दर्ज कर चुका था। आरबीआई ने डॉलर की मांग घटाने और रुपये पर सट्टेबाजी को रोकने के लिए कई कदम उठाए हैं। केंद्रीय बैंक ने बाजार में सीधे डॉलर भी बेचे, जिससे रुपये को सपोर्ट मिला।
हालांकि, रुपये की यह मजबूती कितने दिन टिकेगी, यह बड़ा सवाल है। साल 2026 की शुरुआत से अब तक भारतीय मुद्रा डॉलर के मुकाबले 7% से ज्यादा कमजोर हो चुकी है। बीते शुक्रवार को रुपया 96.96 प्रति डॉलर तक फिसल गया था। इसके बाद आरबीआई ने वीकेंड में कई नए उपायों का ऐलान किया।
RBI ने कौन से बड़े कदम उठाए?
केंद्रीय बैंक का मकसद डॉलर की मांग कम करना, रुपये पर सट्टेबाजी को महंगा बनाना और बैंकिंग सिस्टम में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी को घटाना है। इसके लिए 4 प्रमुख कदम उठाए गए हैं।
- तेल कंपनियों को सीधे डॉलर देगा RBI
भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है। सरकारी तेल कंपनियों को इसके भुगतान के लिए भारी मात्रा में डॉलर चाहिए। आम तौर पर ये कंपनियां बाजार से डॉलर खरीदती हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव पड़ता है। अब आरबीआई ने तीन बड़ी सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों को सीधे डॉलर उपलब्ध कराने के लिए 12 अक्टूबर से विशेष व्यवस्था शुरू की है। इसके तहत कंपनियां तय बैंकों के माध्यम से केंद्रीय बैंक से डॉलर हासिल कर सकेंगी। इससे डॉलर खरीदने के लिए ओपन मार्केट पर निर्भरता घट सकती है। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस व्यवस्था से हर महीने करीब 9 से 11 अरब डॉलर की मांग ओपन मार्केट से हट सकती है।
- करेंसी बाजार में सट्टेबाजी करना होगा मुश्किल
आरबीआई ने करेंसी डेरिवेटिव बाजार के नियम भी सख्त कर दिए हैं। पहले जरूरत बताए बिना कुछ तरह के सौदे करने की सीमा 10 करोड़ डॉलर थी। अब इसे घटाकर 50 लाख डॉलर कर दिया गया है। इसका मतलब है कि बड़े सौदे करने वाले कारोबारियों और कंपनियों को अपनी वास्तविक विदेशी मुद्रा जरूरत साबित करनी होगी। इससे रुपये में आगे और गिरावट का अनुमान लगाकर बड़े दांव लगाने वालों पर लगाम लग सकती है।
आरबीआई ने रद्द किए गए करेंसी डेरिवेटिव सौदों को दोबारा बुक करने पर भी पाबंदी लगाई है। इसका मकसद कारोबारियों को बार-बार अपनी पोजिशन बदलकर बाजार में सट्टेबाजी करने से रोकना है।
शिनहान बैंक इंडिया के ट्रेजरी प्रमुख कुनाल सोधानी के मुताबिक, 10 अक्टूबर 2026 को घोषित RBI के इन कदमों से बैंकों को अपनी सट्टेबाजी वाली पोजिशन घटानी पड़ सकती है। साथ ही उन्हें विदेशी मुद्रा से जुड़े सौदों और फॉरवर्ड मार्केट में अपनी रणनीति की दोबारा समीक्षा करनी होगी।
- बैंकों के लिए करेंसी हेजिंग महंगी होगी
आरबीआई ने कुछ विदेशी मुद्रा डेरिवेटिव सौदों पर अतिरिक्त रिजर्व रखने का नियम लागू किया है। इसके तहत 20 लाख डॉलर से अधिक के पात्र सौदों पर बैंकों को 20% के बराबर अतिरिक्त रकम रिजर्व में रखनी होगी। उदाहरण के लिए, यदि कोई पात्र सौदा 100 करोड़ रुपये का है, तो बैंक को उसके हिसाब से 20 करोड़ रुपये अतिरिक्त रिजर्व में रखने पड़ सकते हैं। इससे बैंकों के लिए ऐसे सौदों की लागत बढ़ेगी। इसका असर आगे चलकर कंपनियों पर भी पड़ सकता है, क्योंकि बैंक बढ़ी हुई लागत का कुछ हिस्सा अपने ग्राहकों से वसूल सकते हैं।
रिसर्च फर्म एमके ग्लोबल के अनुमान के मुताबिक, इन उपायों से करेंसी हेजिंग की लागत करीब 1.3% से 1.5% तक बढ़ सकती है। इसके अलावा बैंकिंग सिस्टम से करीब 45,000 से 50,000 करोड़ रुपये की नकदी भी कम हो सकती है।
- बैंकों के पास उपलब्ध नकदी पर भी लगाम
आरबीआई ने कैश रिजर्व रेशियो यानी CRR के नियमों में भी बदलाव किया है। 16 अक्टूबर से बैंकों को हर दिन अपनी निर्धारित CRR जरूरत का कम से कम 99% बनाए रखना होगा। अभी तक यह सीमा 90% थी। CRR वह रकम है, जिसे बैंकों को अपनी जमा राशि के एक तय हिस्से के रूप में RBI के पास रखना होता है। इस रकम का इस्तेमाल बैंक सामान्य कर्ज देने के लिए नहीं कर सकते। नए नियमों से बैंकों के पास रोजमर्रा के कामकाज के लिए उपलब्ध नकदी का प्रबंधन मुश्किल हो सकता है। रुपये उधार लेकर डॉलर के मुकाबले रुपये में गिरावट पर दांव लगाने की लागत भी बढ़ सकती है। इसके अलावा आरबीआई ने 13 अक्टूबर को 25,000 करोड़ रुपये के सरकारी बॉन्ड बेचने का ऐलान किया है। बॉन्ड की बिक्री से बैंकिंग सिस्टम की अतिरिक्त नकदी खींचने में मदद मिलेगी।
FCNR योजना से कितनी मदद मिली थी?
आरबीआई ने जून 2026 में विदेश में रहने वाले भारतीयों से डॉलर जुटाने के लिए FCNR जमा योजना शुरू की थी। इस योजना के जरिए करीब 143 अरब डॉलर जुटाए गए, जिससे भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 100 अरब डॉलर की बढ़ोतरी हुई। लेकिन इसका फायदा लंबे समय तक नहीं टिक पाया। कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और विदेशी निवेशकों की निकासी ने रुपये पर फिर दबाव बढ़ा दिया। नोमुरा के अनुमान के मुताबिक, सितंबर की शुरुआत में योजना बंद होने के बाद भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 43 अरब डॉलर घट गया। एमके का कहना है कि एफसीएनआर योजना से आई अतिरिक्त रकम ने रुपये की उपलब्धता बढ़ाई। इससे बाजार में रुपये के मुकाबले डॉलर पर दांव लगाना कुछ कारोबारियों के लिए सस्ता हो गया। इस योजना के तहत जुटाई गई रकम को स्थायी पूंजी भी नहीं माना जा सकता। बैंकों को आगे चलकर जमा रकम और उस पर ब्याज लौटाना होगा।
अभी रुपये पर दबाव क्यों बढ़ा है?
रुपये की कमजोरी के पीछे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय, दोनों तरह के कारण हैं। भारत को कच्चे तेल के आयात के लिए बड़ी मात्रा में डॉलर चाहिए। मिडिल ईस्ट में तनाव के कारण तेल की कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड 105 डॉलर प्रति बैरल पर ट्रेड करता दिखा। तेल महंगा होने का मतलब है कि भारत को उतनी ही मात्रा में तेल खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ सकते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव आता है।
दूसरी ओर, अमेरिका में ऊंची ब्याज दरों और वहां निवेश पर मिलने वाले आकर्षक रिटर्न के कारण विदेशी निवेशकों का रुझान अमेरिकी बाजारों की ओर बढ़ा है। इससे भारत जैसे बाजारों से विदेशी पूंजी निकलने का दबाव बन सकता है। 8 अक्टूबर को भारत और अमेरिका की 10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड के बीच अंतर घटकर करीब 194 आधार अंक रह गया था। यह लगभग 22 साल के निचले स्तर के करीब था। कम अंतर से भारतीय बॉन्ड में निवेश का आकर्षण कुछ निवेशकों के लिए घट सकता है।
कंपनियों और आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
आरबीआई के कदम रुपये को सहारा दे सकते हैं, लेकिन इनका असर कारोबार की लागत पर भी पड़ सकता है। खासकर वे कंपनियां प्रभावित हो सकती हैं, जो मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, कच्चा माल या दूसरे सामान विदेश से मंगाती हैं। आयातकों के लिए डॉलर की कीमत के उतार-चढ़ाव से बचने के लिए हेजिंग करना महंगा हो सकता है। ऐसी स्थिति में कुछ कंपनियां हेजिंग घटा सकती हैं या कम अवधि वाले सौदों का विकल्प चुन सकती हैं।
इससे फिलहाल फॉरवर्ड मार्केट में डॉलर की मांग घट सकती है। लेकिन कंपनियां अगर भविष्य में रुपये की गिरावट से बचाव नहीं करती हैं, तो उन्हें बाद में महंगे डॉलर खरीदने का जोखिम उठाना पड़ सकता है।
आम लोगों के लिए रुपये की कमजोरी का असर विदेश से आने वाले सामान की कीमतों पर पड़ सकता है। इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी और कुछ अन्य आयातित उत्पाद महंगे हो सकते हैं। वहीं, कच्चा तेल महंगा रहने पर पेट्रोलियम उत्पादों और परिवहन लागत के जरिए महंगाई का दबाव भी बढ़ सकता है। दूसरी ओर, अगर आरबीआई रुपये की गिरावट को सीमित करने में सफल रहता है, तो आयातित महंगाई को काबू में रखने में मदद मिल सकती है।


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