किसानों के सच्चे हितैषी हैं ‘कैटल इग्रेट’ पक्षी:​बिहारशरीफ बना ‘मवेशी बगुले’ का आशियाना, इको सिस्टम के लिए शुभ संकेत

किसानों के सच्चे हितैषी हैं ‘कैटल इग्रेट’ पक्षी:​बिहारशरीफ बना ‘मवेशी बगुले’ का आशियाना, इको सिस्टम के लिए शुभ संकेत

बिहारशरीफ नगर निगम क्षेत्र में एक खास मेहमान ने अपना आशियाना बनाया हुआ है, जो शहरवासियों के लिए कौतूहल और आकर्षण का केंद्र है। ये मेहमान कोई और नहीं, बल्कि किसानों के हितैषी माने जाने वाले ‘मवेशी बगुला’ (कैटल इग्रेट) हैं। भारी संख्या में पेड़ों पर इनके झुंड और घोंसले प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं। श्वेत बगुला परिवार का यह सदस्य मुख्य रूप से खेतों, घास के मैदानों और आर्द्रभूमि में मवेशियों के साथ झुंड में देखा जाता है। जब मवेशी घास चरते हैं, तो छिपे हुए कीड़े-मकोड़े, टिड्डे और झींगुर बाहर निकल आते हैं, जिन्हें यह बगुला अपना निवाला बनाता है। इसके अलावा, यह मवेशियों के शरीर पर बैठे टिक (किलनी) और मक्खियों को भी खा जाता है। इससे बगुले को भोजन मिल जाता है और मवेशियों को परजीवियों से छुटकारा, जो प्रकृति में आपसी तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण है। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाने के कारण इन्हें किसानों का सच्चा मित्र कहा जाता है। कैसी होती है पहचान? लगभग 50 सेंटीमीटर लंबे इस पक्षी के पंख दूधिया सफेद होते हैं और चोंच पीली होती है। हालांकि, अप्रैल-मई के प्रजनन काल के दौरान इनकी चोंच का रंग बदलकर नारंगी-लाल हो जाता है। ये पक्षी बेहद सामाजिक होते हैं और हमेशा झुंड में रहना पसंद करते हैं। प्रजनन के समय ये ऊंचे और सुरक्षित पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं और एक बार में दो से चार अंडे देते हैं। दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाने वाले इन पक्षियों की संख्या में पशुपालन के विस्तार के साथ वृद्धि देखी गई है। बदलती जीवनशैली और प्राकृतिक आपदाएं बनीं चुनौती पक्षियों के संरक्षण पर काम करने वाले विशेषज्ञ राजीव रंजन पाण्डेय बताते हैं कि इंसानों की बदलती जीवनशैली ने इस प्रजाति को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। आज के समय में इन पक्षियों के सामने सुरक्षा, भोजन और सुरक्षित आवास की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। इसके अलावा, बदलते मौसम और अचानक आने वाले आंधी-तूफान के कारण इनके घोंसलों और नवजात बच्चों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। जागरूकता की है सख्त जरूरत बिहारशरीफ में इन पक्षियों का बसेरा पर्यावरण के लिहाज से एक बेहद सुखद संकेत है। चूंकि पक्षी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग हैं और मवेशी बगुला सीधे तौर पर कृषि और किसानों को लाभ पहुंचाते हैं, इसलिए इनके संरक्षण के लिए आम लोगों में जागरूकता की सख्त जरूरत है। अगर समय रहते इन्हें सुरक्षित माहौल नहीं दिया गया, तो किसानों के इस मददगार पक्षी के अस्तित्व पर संकट गहरा सकता है। बिहारशरीफ नगर निगम क्षेत्र में एक खास मेहमान ने अपना आशियाना बनाया हुआ है, जो शहरवासियों के लिए कौतूहल और आकर्षण का केंद्र है। ये मेहमान कोई और नहीं, बल्कि किसानों के हितैषी माने जाने वाले ‘मवेशी बगुला’ (कैटल इग्रेट) हैं। भारी संख्या में पेड़ों पर इनके झुंड और घोंसले प्राकृतिक सुंदरता में चार चांद लगा रहे हैं। श्वेत बगुला परिवार का यह सदस्य मुख्य रूप से खेतों, घास के मैदानों और आर्द्रभूमि में मवेशियों के साथ झुंड में देखा जाता है। जब मवेशी घास चरते हैं, तो छिपे हुए कीड़े-मकोड़े, टिड्डे और झींगुर बाहर निकल आते हैं, जिन्हें यह बगुला अपना निवाला बनाता है। इसके अलावा, यह मवेशियों के शरीर पर बैठे टिक (किलनी) और मक्खियों को भी खा जाता है। इससे बगुले को भोजन मिल जाता है और मवेशियों को परजीवियों से छुटकारा, जो प्रकृति में आपसी तालमेल का एक बेहतरीन उदाहरण है। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़ों को खाने के कारण इन्हें किसानों का सच्चा मित्र कहा जाता है। कैसी होती है पहचान? लगभग 50 सेंटीमीटर लंबे इस पक्षी के पंख दूधिया सफेद होते हैं और चोंच पीली होती है। हालांकि, अप्रैल-मई के प्रजनन काल के दौरान इनकी चोंच का रंग बदलकर नारंगी-लाल हो जाता है। ये पक्षी बेहद सामाजिक होते हैं और हमेशा झुंड में रहना पसंद करते हैं। प्रजनन के समय ये ऊंचे और सुरक्षित पेड़ों पर अपना घोंसला बनाते हैं और एक बार में दो से चार अंडे देते हैं। दुनिया के लगभग सभी महाद्वीपों में पाए जाने वाले इन पक्षियों की संख्या में पशुपालन के विस्तार के साथ वृद्धि देखी गई है। बदलती जीवनशैली और प्राकृतिक आपदाएं बनीं चुनौती पक्षियों के संरक्षण पर काम करने वाले विशेषज्ञ राजीव रंजन पाण्डेय बताते हैं कि इंसानों की बदलती जीवनशैली ने इस प्रजाति को भी काफी हद तक प्रभावित किया है। आज के समय में इन पक्षियों के सामने सुरक्षा, भोजन और सुरक्षित आवास की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई है। इसके अलावा, बदलते मौसम और अचानक आने वाले आंधी-तूफान के कारण इनके घोंसलों और नवजात बच्चों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। जागरूकता की है सख्त जरूरत बिहारशरीफ में इन पक्षियों का बसेरा पर्यावरण के लिहाज से एक बेहद सुखद संकेत है। चूंकि पक्षी हमारे पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग हैं और मवेशी बगुला सीधे तौर पर कृषि और किसानों को लाभ पहुंचाते हैं, इसलिए इनके संरक्षण के लिए आम लोगों में जागरूकता की सख्त जरूरत है। अगर समय रहते इन्हें सुरक्षित माहौल नहीं दिया गया, तो किसानों के इस मददगार पक्षी के अस्तित्व पर संकट गहरा सकता है।  

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *