Education: नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने देश के शिक्षा सिस्टम में सुधार के लिए एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम उठाया है। उन्होंने देश के सभी विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के कुलपतियों को सख्त निर्देश दिए हैं कि वे अपने परिसरों से राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र और कर्मचारी संघों को तत्काल प्रभाव से हटा दें। सोमवार को अपने कार्यालय में कुलपतियों के साथ हुई एक विशेष बैठक में प्रधानमंत्री ने यह फैसला सुनाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस निर्णय को लागू करने में कोई भी कानून बाधा नहीं बनेगा।
शिक्षण संस्थान और अस्पताल हैं ‘पवित्र स्थान’
करीब तीन घंटे तक चली इस मैराथन बैठक में पीएम शाह ने बेहद कड़े शब्दों में कहा कि शिक्षण संस्थानों के अंदर किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने स्कूल, कॉलेज और अस्पतालों को “पवित्र स्थान” करार दिया। उनका मानना है कि इन जगहों पर किसी भी राजनीतिक पार्टी का झंडा, उनका प्रभाव या कोई भी संगठनात्मक ढांचा नहीं होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने यह भी सुझाव दिया कि जिन लोगों को राजनीति का शौक है या जो इसमें रुचि रखते हैं, उन्हें अपनी पेशेवर नौकरी छोड़ कर पूरी तरह से (फुल-टाइम) राजनीति में ही आना चाहिए।
कुलपतियों ने उठाई सुरक्षा की चिंता
इस चर्चा के दौरान नेपाल संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर डॉ. धनेश्वर नेपाल ने एक गंभीर मुद्दा उठाया। उन्होंने बताया कि जब भी छात्र संगठनों के ढांचे को हटाने या खत्म करने की कोशिश की जाती है, तो उन्हें धमकियों और हमलों का सामना करना पड़ता है। इससे सुरक्षा को लेकर बड़ा खतरा पैदा हो जाता है।
सरकार देगी पूरी सुरक्षा, बेखौफ काम करें कुलपति
कुलपतियों की चिंताओं का जवाब देते हुए प्रधानमंत्री शाह ने उन्हें आश्वस्त किया। उन्होंने निर्देश दिया कि कैंपस से राजनीतिक संरचनाओं को हटाते समय यदि सुरक्षा से जुड़ी कोई भी समस्या उत्पन्न होती है, तो तुरंत शिक्षा मंत्रालय या प्रधानमंत्री सचिवालय को सूचित किया जाए। पीएम ने भरोसा दिलाया कि सरकार हर जरूरी सुरक्षा मुहैया कराने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और पुलिस प्रशासन अपनी जिम्मेदारी मुस्तैदी से निभाएगा। इसके अलावा, पीएम शाह ने विश्वविद्यालयों को यह भी निर्देश दिया कि वे अपना अकादमिक कैलेंडर सख्ती से लागू करें और परीक्षा होने के एक महीने के भीतर ही परिणाम घोषित करें।
क्या है ‘जेन-जेड’ का असर ?
शिक्षा मंत्री सस्मित पोखरेल ने बताया कि मंत्रालय पहले ही राजनीतिक दलों के ढांचे खत्म करने के निर्देश दे चुका है और वर्तमान कानून इसमें कोई रुकावट नहीं डालते। वहीं, त्रिभुवन विश्वविद्यालय के कुलपति ने एक दिलचस्प बात रखी। उन्होंने कहा कि हालिया चुनावों और नेपाल में हुए “जेन-जेड” आंदोलन के बाद से छात्र और कर्मचारी संगठन अपने आप ही काफी हद तक निष्क्रिय हो गए हैं। हालांकि, मध्य-पश्चिम, पूर्वांचल और सुदूरपश्चिम जैसे कुछ विश्वविद्यालयों के कुलपतियों ने माना कि उनके परिसरों में आज भी राजनीतिक तनाव का माहौल रहता है। फिर भी, सभी ने उम्मीद जताई है कि सख्त प्रशासन और सरकार के इस आदेश के बाद शैक्षणिक क्षेत्र में राजनीतिक दखलंदाजी हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।
शिक्षाविदों ने पीएम बालेन्द्र शाह के इस फैसले का स्वागत किया
आम छात्रों, अभिभावकों और शिक्षाविदों ने पीएम बालेन्द्र शाह के इस फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इससे कैम्पस में पढ़ाई का माहौल सुधरेगा। वहीं, दूसरी ओर राजनीतिक दलों से जुड़े पुराने छात्र नेता इस फैसले से नाराज हैं और इसे अपने अधिकारों का हनन बता रहे हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती इस आदेश के जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन की है। यह देखना अहम होगा कि क्या नेपाल पुलिस और प्रशासन मिलकर इन छात्र संघों के विरोध को शांतिपूर्ण तरीके से संभाल पाते हैं और क्या वास्तव में नेपाल के विश्वविद्यालय एक महीने के भीतर परीक्षा परिणाम घोषित करने का लक्ष्य हासिल कर सकेंगे।
नेपाल की राजनीति में आ रहे बदलाव का प्रतीक है ‘जेन-जेड’
यह फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि नेपाल की राजनीति में आ रहे ‘जेन-जेड’बदलाव का प्रतीक है। युवा अब पारंपरिक नारेबाजी वाली राजनीति से ऊब चुके हैं और वे रोजगार, समय पर परीक्षा और पारदर्शी शिक्षा प्रणाली की मांग कर रहे हैं। बालेन्द्र शाह का यह कदम युवाओं की इसी नब्ज को पकड़ने की एक कोशिश है। ( इनपुट : ANI)


