हर साल पहली तिमाही के बाद से ही ऑफिसों में अप्रैजल को लेकर एम्पलॉइज के बीच फुसफुसाहट शुरू हो ही जाती है। कोई HR के चक्कर काट रहा होता है, कोई मैनेजर से ‘कॉफी मीटिंग’ का वक्त मांग रहा होता है। सबको समझ आ रहा होता है कि अप्रेजल का सीजन है, इसलिए सैलरी, पर्क्स आदि पर खुलकर बातें भी होती है।
पर इस साल सिर्फ यह नहीं देखना कि इंक्रीमेंट कितना मिला। असली सवाल यह है कि CTC बढ़ने के बाद भी महीने के अंत में बैंक अकाउंट में पैसा ज्यादा आएगा या कम, ये जानना ज्यादा जरूरी है। नए लेबर कोड और बदले हुए इनकम टैक्स नियमों ने मिलकर इनहैंड सैलरी का पूरा गणित बदल दिया है।
बेसिक सैलरी का ‘खेल’ समझिए
अभी तक कंपनियां बेसिक सैलरी का कैलकुलेशन कुछ इस तरह से करती थीं। CTC में तरह-तरह के भत्ते जोड़कर बेसिक सैलरी को कुल तनख्वाह का सिर्फ 30 से 40 फीसदी रखती थीं। इससे उनका फायदा था क्योंकि EPF और ग्रेच्युटी बेसिक पर कटती है। बेसिक कम तो कंपनी का खर्च कम।
पर अब नए लेबर कोड ने इस खेल पर रोक लगा रहे हैं। अब EPF, ग्रेच्युटी और ESIC की गणना CTC के कम से कम 50 फीसदी हिस्से पर करनी होगी। यानी बेसिक कम से कम आधी सैलरी होनी चाहिए। नए कानून में अब इसकी परिभाषा ही बदल गई है। कंपनियां अब अलग-अलग भत्तों की आड़ में बेसिक को कम नहीं रख सकतीं।
तो क्या हाथ में आने वाला पैसा घटेगा?
सीधा जवाब है, हां। इसे एक उदाहरण से समझाते हैं। मान लीजिए आपकी CTC 12 लाख रुपये सालाना है। अभी बेसिक 3.6 लाख है तो EPF उसी पर कटता है। नए नियम के बाद बेसिक 6 लाख होगी तो EPF ज्यादा कटेगा। CTC वही रही लेकिन हाथ में आने वाला पैसा कम हो जाएगा। पर सरकार ने ये नियम आपके फायदे के लिए बनाया है, लंबे समय में यह आपके लिए फायदेमंद है क्योंकि रिटायरमेंट फंड बड़ा बनेगा, ग्रेच्युटी ज्यादा मिलेगी। लेकिन आज की EMI और घर का खर्च चलाने वालों के लिए यह राहत की बात नहीं लगती। मगर एक रास्ता यह है कि अगर कंपनी अनुमति दे तो EPF योगदान को 15,000 रुपये की वैधानिक सीमा पर रोक सकते हैं। इससे हर महीने सिर्फ 1,800 रुपये EPF में जाएंगे और बाकी पैसा हाथ में रहेगा।
कंपनियां खुद उलझन में हैं
अभी ज्यादातर बड़ी कंपनियां इंतजार कर रही हैं। एचआर और अकाउंट डिपार्टमेंट अंदर ही अंदर हिसाब लगा रहा है, योजनाएं बन रही हैं, लेकिन सैलरी स्ट्रक्चर में अभी बड़े बदलाव नहीं हुए हैं। वजह यह है कि राज्यों को अपने नियम अलग से बनाने हैं। हर राज्य तय करेगा कि वेज सीलिंग क्या होगी, छोटे उद्योगों को क्या छूट मिलेगी, विवाद कैसे सुलझेंगे। राज्य कानून की मूल भावना नहीं बदल सकते, लेकिन प्रक्रियागत नियम उनके हाथ में हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट मनीष मल्होत्रा कहते हैं कि कई नियोक्ता इसीलिए अभी बदलाव टाल रहे हैं ताकि जब पूरी तस्वीर साफ हो तब एक बार में सब ठीक कर सकें।
इनकम टैक्स में भी नई उलझन
अप्रैल 2026 से नए इनकम टैक्स नियम भी लागू हो गए हैं। बजट 2025 में नई टैक्स व्यवस्था को पहले से मजबूत किया गया था, ज्यादातर लोग उसी तरफ जा रहे थे। लेकिन अब पुराने रिजीम में कुछ छूटें बढ़ाकर उसे दोबारा आकर्षक बनाने की कोशिश हुई है।बच्चों की स्कूल फीस और हॉस्टल खर्च पर टैक्स छूट बढ़ाई गई है, यह पुराने रिजीम में मिलती है। दफ्तर में मिलने वाले खाने के भत्ते पर 200 रुपये प्रति मील तक की छूट अब दोनों रिजीम में मिलेगी। यानी अगर आपके दो बच्चे हैं और कंपनी खाने का भत्ता देती है तो एक बार फिर से हिसाब लगाना जरूरी है कि नया रिजीम फायदेमंद है या पुराना।
अप्रेजल मीटिंग में जाने से पहले यह करें
पहला काम यह करें कि दोनों टैक्स रिजीम में अपना टैक्स निकालें। किसी भी टैक्स कैलकुलेटर पर यह आसानी से हो जाता है। दूसरा, यह समझें कि नए लेबर कोड लागू होने के बाद आपकी नेट सैलरी पर क्या असर पड़ेगा। एचआर से सीधे पूछें कि कंपनी बेसिक को CTC के 50 फीसदी तक ले जाने की योजना कब तक बना रही है।
तीसरा, सिर्फ CTC बढ़ाने की मांग मत करें। यह भी तय करें कि सैलरी का ढांचा कैसा हो। कौन से भत्ते रखें, EPF कितना हो, यह सब मिलकर तय होता है कि महीने के अंत में बैंक में कितना आएगा।
बड़ी तस्वीर
पिछले कई दशकों में भारतीय कंपनियों ने सैलरी स्ट्रक्चर को जानबूझकर जटिल बनाया। HRA, LTA, मेडिकल, स्पेशल अलाउंस जैसे दर्जनों भत्ते जोड़े गए ताकि कागज पर CTC बड़ी दिखे और असल में देना कम पड़े। नए लेबर कोड इस पूरी व्यवस्था को धीरे-धीरे बदलने की कोशिश हैं। लेकिन बदलाव रातोरात नहीं होता। अभी कंपनियां इंतजार में हैं, राज्य सरकारें नियम बना रही हैं और कर्मचारी अनजान हैं। जो लोग इस बदलाव को समझकर अपनी अप्रेजल डिस्कशन में जाएंगे, वे न सिर्फ बेहतर सौदा करेंगे बल्कि आने वाले सालों में भी फायदे में रहेंगे।


