भास्कर न्यूज | जालंधर स्किल एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए स्कूलों में एनएसक्यूएफ और हुनर शिक्षा जैसी योजनाओं के तहत नई वोकेशनल स्ट्रीम शुरू की जा रही हैं, लेकिन पहले से चल रही पुरानी वोकेशनल स्ट्रीम धीरे-धीरे बंद होती जा रही हैं। कहीं वोकेशनल लेक्चरर के रिटायर होने तो कहीं प्रमोशन के बाद पद खाली होने से स्ट्रीम पर असर पड़ा है। नई भर्ती नहीं होने के कारण कई स्कूलों में ट्रेड बंद हो चुके हैं और कुछ में एक ही शिक्षक दो-दो जिम्मेदारियां संभाल रहा है। पुराने वोकेशनल शिक्षकों के मुताबिक प्रदेश में पुरानी वोकेशनल शिक्षा की शुरुआत 1976 में हुई थी। इसमें इलेक्ट्रिकल, रेडियो एंड टीवी, इंश्योरेंस एंड बैंकिंग, आईटी, गारमेंट मेकिंग, हॉर्टिकल्चर, फूड एंड प्रिजर्वेशन, लेदर गुड्स सहित कई ट्रेड चलाए जाते रहे हैं। शिक्षकों के अनुसार इस कैडर में 181 पद हैं, जिनमें से केवल 48 भरे हुए हैं, जबकि 133 पद खाली हैं। उनका कहना है कि आखिरी भर्ती 2013 में हुई थी। इसके बाद नई भर्ती नहीं होने से रिटायरमेंट और प्रमोशन के बाद खाली हुए पदों पर नियुक्तियां नहीं हुईं। शिक्षकों के अनुसार एक ट्रेड में दो वोकेशनल लेक्चरर और एक एसएलए (स्किल्ड लैब अटेंडेंट) का प्रावधान रहा है। कई स्कूलों में एसएलए के पद भी खाली हैं। एसएलए की आखिरी भर्ती 1997 में होने की बात शिक्षक बताते हैं। उनका कहना है कि ट्रेड के लिए जरूरी मशीनें और उपकरण भी लंबे समय से इस्तेमाल में हैं और रखरखाव के अभाव में खराब हो रहे हैं। शिक्षकों के मुताबिक कई ट्रेड्स का रॉ मटीरियल भी 1994 के बाद नहीं आया। शिक्षकों का कहना है कि पुरानी वोकेशनल स्ट्रीम में बच्चों को वोकेशनल विषय के साथ जरूरी कोर विषय भी पढ़ाए जाते हैं। उदाहरण के तौर पर गारमेंट मेकिंग में डिजाइन एंड पैटर्न मेकिंग, यूनिट मैनेजमेंट, क्लोदिंग एंड ड्रेस मेकिंग, कमर्शियल क्लोदिंग जैसे विषयों के साथ जनरल फाउंडेशन, अंग्रेजी, पंजाबी और ईवीएस जैसे विषय भी शामिल हैं। उनका कहना है कि यह शिक्षा बच्चों को आगे पढ़ाई और रोजगार दोनों के विकल्प देती है। शिक्षकों का कहना है कि पुरानी वोकेशनल स्ट्रीम को बंद करने के बजाय समय के साथ इसका सिलेबस अपडेट कर नई भर्ती की जानी चाहिए। उनके मुताबिक इससे बच्चों को स्किल के साथ आगे की पढ़ाई और रोजगार के बेहतर विकल्प मिल सकते हैं। डीईओ सेकेंडरी गुरिंदरजीत कौर को कॉल और मैसेज किया गया, लेकिन उनकी ओर से कोई जवाब नहीं मिला। मैकेनिकल सर्विसिंग से जुड़े एक वोकेशनल लेक्चरर ने बताया कि पहले मशीनों के रखरखाव के लिए एसएलए होते थे। उनके जाने के बाद नई भर्ती नहीं हुई। शिक्षक मशीनें चला तो लेते हैं, लेकिन मशीनों के नियमित और तकनीकी रखरखाव के लिए अलग कर्मचारी की जरूरत होती है। एसएलए नहीं होने से यह काम प्रभावित हो रहा है। गारमेंट मेकिंग से जुड़े एक शिक्षक ने बताया कि उनके स्कूल में पहले गारमेंट मेकिंग, निटिंग टेक्नोलॉजी और कमर्शियल आर्ट की तीन स्ट्रीम चलती थीं। रिटायरमेंट और प्रमोशन के बाद इन पदों पर नई नियुक्ति नहीं हुई। कमर्शियल आर्ट के शिक्षक रिटायर हो गए, जबकि निटिंग टेक्नोलॉजी के शिक्षक प्रमोट होकर चले गए। इसके बाद दोनों स्ट्रीम बंद हो गईं। शिक्षक के अनुसार हर स्ट्रीम में दो पद होते हैं। उनके मुताबिक करीब चार साल पहले विषय का सिलेबस अपडेट हुआ था, लेकिन 2011 से स्ट्रीम के लिए कोई ग्रांट नहीं आई। नई तकनीक और उपकरण देखकर बच्चे भी इन स्ट्रीम की ओर आकर्षित होते हैं। उनके स्कूल में गारमेंट मेकिंग की करीब 25 मशीनें ही फिलहाल काम कर रही हैं। खराब मशीनों को स्कूल के फंड से ठीक करवाया जाता है। डिपार्टमेंट से कोई ग्रांट नहीं मिल पा रही।

