डॉ. तंवर के अनुसार मिर्गी से पीड़ित बच्चों की देखभाल में केवल दौरे नियंत्रित करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके व्यवहार, भावनाओं और मानसिक-सामाजिक विकास पर भी ध्यान देना जरूरी है। अभिभावकों और शिक्षकों को समझना होगा कि मिर्गी कोई कलंक नहीं है और न ही यह बच्चे की क्षमताओं को निर्धारित करती है। ऐसे बच्चों को दया नहीं, बल्कि सहयोग, सम्मान, समझ और समान अवसरों की जरूरत है। }बच्चे से बात करें: बच्चा लगातार चिड़चिड़ा रहे या पहले से ज्यादा गुस्सा करे, तो उससे बात कर परेशानी समझने की कोशिश करें। }अकेले रहने पर ध्यान दें: बच्चा दूसरों से दूरी बनाने लगे तो इसे नजरअंदाज न करें। }पढ़ाई में परेशानी समझें: बच्चे का पढ़ाई में ध्यान नहीं लग रहा हो, तो इसके कारणों पर ध्यान दें। }चिकित्सक से चर्चा करें: व्यवहार में बदलाव दिखने पर डॉक्टर से पूरी जानकारी साझा करें। }डांटने की बजाय सहयोग करें: बच्चे को शरारती या कमजोर कहने के बजाय उसकी परेशानी समझें। }परिवार और स्कूल का सहयोग लें: परिवार का स्नेह, स्कूल में सहयोग, चिकित्सकीय सलाह व जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक सहायता बच्चे के आत्मविश्वास और जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है। शोध के अनुसार, मिर्गी से पीड़ित 52.5% बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं मिलीं। स्वस्थ बच्चों में यह आंकड़ा 14.4% रहा। बच्चों के व्यवहार की जानकारी जुटाने के लिए अभिभावकों को 10 बिंदुओं वाली चेकलिस्ट दी गई। इसमें उन्हें घर पर बच्चों के व्यवहार से जुड़े सवालों के जवाब देने थे। प्राप्त जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए। डॉ. तंवर के अनुसार जिन बच्चों के दौरे ठीक से नियंत्रित नहीं थे, उनमें व्यवहार संबंधी समस्याओं का संबंध अधिक देखने को मिला। ऐसे बच्चों को दया की बजाय सम्मान, समझ और समान अवसर देने की जरूरत है। हालांकि 170 बच्चों के अध्ययन शोध में सामने आए प्रतिशत को सभी मिर्गी पीड़ित बच्चों पर लागू नहीं किया जा सकता। पुष्कर में आयोजित राजस्थान पीडियाट्रिक एसोसिएशन की राजपेडिकॉन गोल्डन जुबली और नॉर्दर्न जोन पेडिकॉन कॉन्फ्रेंस में डॉ. तंवर ने शोध के निष्कर्ष साझा किए। डॉ. तंवर ने बताया िक उन्होंने अपने शोध में 6 से 14 साल की उम्र के 80 मिर्गी पीड़ित और 90 स्वस्थ बच्चों सहित कुल 170 बच्चों को शामिल किया। इनमें व्यवहार, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहने की प्रवृत्ति और पढ़ाई में ध्यान लगाने जैसी स्थितियों का अध्ययन किया गया। शोध के अनुसार, मिर्गी से पीड़ित 52.5% बच्चों में व्यवहार संबंधी समस्याएं मिलीं। स्वस्थ बच्चों में यह आंकड़ा 14.4% रहा। बच्चों के व्यवहार की जानकारी जुटाने के लिए अभिभावकों को 10 बिंदुओं वाली चेकलिस्ट दी गई। इसमें उन्हें घर पर बच्चों के व्यवहार से जुड़े सवालों के जवाब देने थे। प्राप्त जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए। अजमेर | मिर्गी का असर बच्चों की केवल शारीरिक सेहत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके व्यवहार और मानसिक-सामाजिक विकास पर भी पड़ सकता है। बीकानेर के सरदार पटेल मेडिकल कॉलेज की पीडियाट्रिक यूनिट के एचओडी डॉ. जीएस तंवर के शोध में यह बात सामने आई है। पुष्कर में आयोजित राजस्थान पीडियाट्रिक एसोसिएशन की राजपेडिकॉन गोल्डन जुबली और नॉर्दर्न जोन पेडिकॉन कॉन्फ्रेंस में डॉ. तंवर ने शोध के निष्कर्ष साझा किए। डॉ. तंवर ने बताया िक उन्होंने अपने शोध में 6 से 14 साल की उम्र के 80 मिर्गी पीड़ित और 90 स्वस्थ बच्चों सहित कुल 170 बच्चों को शामिल किया। इनमें व्यवहार, चिड़चिड़ापन, गुस्सा, अकेले रहने की प्रवृत्ति और पढ़ाई में ध्यान लगाने जैसी स्थितियों का अध्ययन किया गया।

