Uttar Pradesh Culture: उत्तर प्रदेश की सदियों पुरानी साहित्यिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को डिजिटल रूप में संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की जा रही है। ज्ञान भारतम मिशन के तहत प्रदेश के छह प्रमुख संस्थानों में हजारों दुर्लभ पांडुलिपियों की स्कैनिंग कर उन्हें डिजिटल रिकॉर्ड में बदला जा रहा है। सितंबर 2026 तक इन संस्थानों में कुल 15,890 पांडुलिपियों से जुड़े 7,56,392 पन्नों की स्कैनिंग पूरी की जा चुकी है। इनमें से 14,594 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार किया गया है, जबकि 14,208 रिकॉर्ड डिजिटल रूप से अपलोड किए जा चुके हैं।
इस अभियान का उद्देश्य केवल प्राचीन दस्तावेजों को सुरक्षित रखना ही नहीं, बल्कि उनमें समाहित ज्ञान, साहित्य, इतिहास और परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना भी है। संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह के मुताबिक, डिजिटल संरक्षण से विरासत को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के साथ शोध और अध्ययन के नए रास्ते खुलेंगे।
छह संस्थानों में चल रहा है डिजिटल संरक्षण का काम
ज्ञान भारतम मिशन के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के छह प्रमुख संस्थानों में पांडुलिपियों की पहचान, स्कैनिंग, मेटाडाटा तैयार करने और डिजिटल रिकॉर्ड अपलोड करने का काम किया जा रहा है। इनमें गीता प्रेस गोरखपुर, नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन, राजकीय पांडुलिपि पुस्तकालय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और वृंदावन शोध संस्थान, मथुरा शामिल हैं। इन संस्थानों में विभिन्न विषयों और परंपराओं से संबंधित पांडुलिपियां संरक्षित हैं। इनमें साहित्य, धर्म, दर्शन, भाषा और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़ी सामग्री शामिल हो सकती है। पुराने दस्तावेज समय के साथ कागज की गुणवत्ता, नमी, तापमान और रखरखाव की परिस्थितियों के कारण क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। ऐसे में उनका डिजिटल स्वरूप तैयार करना संरक्षण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जाता है।

वृंदावन शोध संस्थान में सबसे अधिक पन्नों की स्कैनिंग
मथुरा स्थित वृंदावन शोध संस्थान में अब तक 3,161 पांडुलिपियों से जुड़े 1,93,256 पन्नों की स्कैनिंग की जा चुकी है। यहां 2,998 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार किया गया है और 2,846 रिकॉर्ड अपलोड किए जा चुके हैं। पन्नों की संख्या के लिहाज से छह संस्थानों में यह सबसे बड़ा आंकड़ा है। वृंदावन की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा को देखते हुए यहां संरक्षित पांडुलिपियां शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बन सकती हैं। इनका डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने से मूल दस्तावेजों को बार-बार संभालने की आवश्यकता कम हो सकती है और उपलब्ध डिजिटल प्रतियों के माध्यम से अध्ययन को सुविधाजनक बनाया जा सकता है।
हिंदी साहित्य सम्मेलन में 1.26 लाख से अधिक पन्ने डिजिटल
हिंदी भाषा और साहित्य के संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हिंदी साहित्य सम्मेलन में 2,400 पांडुलिपियों से संबंधित 1,26,878 पन्नों की स्कैनिंग पूरी हो चुकी है। यहां 2,090 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार किया गया है, जबकि 2,023 रिकॉर्ड अपलोड किए जा चुके हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास, भाषा के विकास और साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन में पुरानी पांडुलिपियों का विशेष महत्व होता है। डिजिटल रूप में इनके संरक्षण से शोधार्थियों को दुर्लभ सामग्री की पहचान करने और उससे संबंधित विवरण तक पहुंचने में सुविधा मिल सकती है। साथ ही, पुरानी साहित्यिक धरोहर को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने में भी मदद मिलेगी।
राजकीय पांडुलिपि पुस्तकालय में 1.52 लाख पन्नों की स्कैनिंग
राजकीय पांडुलिपि पुस्तकालय में 1,623 पांडुलिपियों से जुड़े 1,52,519 पन्नों को डिजिटल स्वरूप में स्कैन किया गया है। यहां 1,472 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार किया गया है और 1,410 रिकॉर्ड अपलोड किए जा चुके हैं।

इतनी बड़ी संख्या में पन्नों का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करना संरक्षण प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इससे पांडुलिपियों की पहचान, उनकी उपलब्धता और उनसे संबंधित जानकारी को व्यवस्थित रखने में सहायता मिलती है। हालांकि, डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने और किसी दस्तावेज के आम लोगों या शोधकर्ताओं के लिए ऑनलाइन उपलब्ध होने में अंतर हो सकता है। इसलिए इन दस्तावेजों की सार्वजनिक उपलब्धता संबंधित संस्थानों की व्यवस्था और अनुमति पर निर्भर करेगी।
संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में संस्कृत विरासत का संरक्षण
वाराणसी स्थित संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में 1,192 पांडुलिपियों से जुड़े 90,300 पन्नों की स्कैनिंग पूरी की गई है। यहां 759 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार करने के साथ 759 रिकॉर्ड अपलोड भी किए जा चुके हैं। संस्कृत साहित्य, दर्शन और भारतीय ज्ञान परंपरा के अध्ययन में प्राचीन पांडुलिपियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इन दस्तावेजों के डिजिटल संरक्षण से भविष्य में शोधकर्ताओं को उपलब्ध सामग्री का व्यवस्थित विवरण मिल सकता है। इसके साथ ही, पुराने ग्रंथों और दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग भी बढ़ेगा।
नागरी प्रचारिणी सभा में सबसे अधिक पांडुलिपियों की स्कैनिंग
नागरी प्रचारिणी सभा में 6,720 पांडुलिपियों से संबंधित 61,175 पन्नों की स्कैनिंग की जा चुकी है। यहां 6,680 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार हुआ है और 6,600 रिकॉर्ड डिजिटल रूप से अपलोड किए गए हैं। पांडुलिपियों की संख्या के लिहाज से यह छह संस्थानों में सबसे बड़ा आंकड़ा है। नागरी प्रचारिणी सभा हिंदी भाषा, साहित्य और उससे जुड़ी ऐतिहासिक सामग्री के संरक्षण के लिए जानी जाती है। यहां मौजूद दस्तावेजों को डिजिटल रूप में दर्ज करने से दुर्लभ सामग्री की पहचान और सूची तैयार करने में मदद मिलती है। यह प्रक्रिया भविष्य में साहित्यिक इतिहास और भाषा संबंधी शोध के लिए उपयोगी साबित हो सकती है।
गीता प्रेस गोरखपुर में 1.32 लाख पन्नों का डिजिटल रिकॉर्ड
गीता प्रेस गोरखपुर में 794 पांडुलिपियों से जुड़े 1,32,264 पन्नों की स्कैनिंग पूरी की गई है। यहां 595 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार किया गया है और 570 रिकॉर्ड अपलोड किए जा चुके हैं। धार्मिक साहित्य के प्रकाशन और संरक्षण के क्षेत्र में गीता प्रेस की महत्वपूर्ण पहचान रही है। यहां पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण धार्मिक और साहित्यिक सामग्री को सुरक्षित रखने के प्रयासों का हिस्सा है। डिजिटल प्रतियां तैयार होने से मूल दस्तावेजों को बार-बार इस्तेमाल करने की जरूरत कम हो सकती है, जिससे उनके संरक्षण में सहायता मिल सकती है।
मेटाडाटा से आसान होगी पांडुलिपियों की पहचान
पांडुलिपियों को स्कैन करने के साथ उनका मेटाडाटा तैयार करना भी इस मिशन का अहम हिस्सा है। मेटाडाटा में किसी दस्तावेज की पहचान और उससे संबंधित विवरण व्यवस्थित रूप से दर्ज किए जाते हैं। इससे पांडुलिपियों की सूची तैयार करने, उनके रिकॉर्ड को व्यवस्थित रखने और जरूरत के अनुसार सामग्री खोजने में मदद मिलती है। सितंबर 2026 तक 14,594 पांडुलिपियों का मेटाडाटा तैयार होना और 14,208 रिकॉर्ड अपलोड किया जाना इस प्रक्रिया में हुई प्रगति को दर्शाता है। हालांकि, स्कैनिंग, मेटाडाटा तैयार करने और रिकॉर्ड अपलोड करने के आंकड़े अलग-अलग हैं। इसलिए डिजिटल संरक्षण के अगले चरण में शेष रिकॉर्ड को पूरा करना और सामग्री की उपयोगिता के अनुसार उसकी उपलब्धता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण होगा।

जयवीर सिंह बोले-विरासत संरक्षण से खुलेंगे शोध के नए रास्ते
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह ने कहा कि ज्ञान भारतम मिशन के तहत चल रहा अभियान प्रदेश की साहित्यिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा से जुड़ी पुरानी सामग्री को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। उनके अनुसार, पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण होने से दुर्लभ सामग्री को समय के साथ खराब होने से बचाने में मदद मिलेगी। मंत्री ने यह भी कहा कि व्यवस्थित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने से शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और साहित्य एवं इतिहास से जुड़े लोगों के लिए सामग्री तक पहुंच आसान हो सकेगी। गीता प्रेस, नागरी प्रचारिणी सभा, हिंदी साहित्य सम्मेलन, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय और वृंदावन शोध संस्थान जैसे संस्थानों की भागीदारी से आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान की विरासत को सुरक्षित रखने का अवसर मिलेगा।
डिजिटल विरासत से भविष्य की पीढ़ियों को मिलेगा लाभ
ज्ञान भारतम मिशन के तहत उत्तर प्रदेश में चल रहा यह अभियान प्राचीन पांडुलिपियों को सुरक्षित रखने और उनके विवरण को डिजिटल स्वरूप में व्यवस्थित करने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास है। 15,890 पांडुलिपियों से जुड़े 7,56,392 पन्नों की स्कैनिंग इस काम के व्यापक स्तर को दर्शाती है। आने वाले समय में इस पहल का लाभ तभी और अधिक बढ़ सकेगा, जब डिजिटल रिकॉर्ड का संरक्षण, गुणवत्ता की जांच और शोधकर्ताओं के लिए नियमानुसार उपलब्धता सुनिश्चित की जाएगी। इससे दुर्लभ साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं पर शोध को प्रोत्साहन मिल सकता है। उत्तर प्रदेश के छह संस्थानों में चल रही यह प्रक्रिया आधुनिक तकनीक और ऐतिहासिक धरोहर के बीच एक महत्वपूर्ण सेतु तैयार कर रही है।

