किसानों को केवल परंपरागत फसलों और कच्चे कृषि उत्पादों की बिक्री तक सीमित रखने के बजाय औषधीय पौधों की पेस्टिसाइड-फ्री खेती, प्रसंस्करण, वैल्यू एडिशन, स्टार्टअप और सीधे निर्यात से जोड़ने की दिशा में जयपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू हुआ। ‘फार्म टू फॉर्च्यून-कमर्शियल कल्टीवेशन ऑफ मेडिसिनल प्लांट्स’ विषय पर आयोजित कार्यक्रम में किसानों को खेत से लेकर अंतरराष्ट्रीय बाजार तक औषधीय उत्पादों की पूरी वैल्यू चेन विकसित करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कार्यक्रम 12 और 13 सितंबर को वैदिक औषधीय पादप केंद्र, सनराइज ऑर्गेनिक पार्क, पिंजरापोल गौशाला परिसर, टोंक रोड, सांगानेर में आयोजित किया जा रहा है। इसका आयोजन इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड एग्रीकल्चर स्किल डेवलपमेंट एंड रिसर्च, हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी, ऑर्गेनिक फार्मर प्रोड्यूसर एसोसिएशन ऑफ इंडिया और अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद के संयुक्त तत्वावधान में किया गया है। पेस्टिसाइड-फ्री खेती बनेगी नई आर्थिक ताकत प्रशिक्षण का मुख्य फोकस औषधीय पौधों की पेस्टिसाइड-फ्री और अवशेष-नियंत्रित खेती पर है। विशेषज्ञों के अनुसार औषधीय पौधों से पाउडर, कैप्सूल, एक्सट्रैक्ट, हर्बल सप्लीमेंट, आयुर्वेदिक सामग्री और कॉस्मेटिक उत्पाद तैयार किए जाते हैं। ऐसे में कीटनाशक अवशेषों का नियंत्रण उत्पाद की गुणवत्ता, उपभोक्ता सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वीकार्यता के लिए महत्वपूर्ण है। प्रशिक्षण में बताया जा रहा है कि पेस्टिसाइड-फ्री खेती केवल रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल बंद करने तक सीमित नहीं है। इसके लिए खेत का चयन, मिट्टी और पानी की जांच, सुरक्षित बीज एवं रोपण सामग्री, जैविक पोषण, प्राकृतिक कीट प्रबंधन, पड़ोसी खेतों से संभावित प्रदूषण की रोकथाम, फसल की ट्रेसबिलिटी, सुरक्षित कटाई-सुखाई, भंडारण और मान्यताप्राप्त प्रयोगशाला में अवशेष परीक्षण जैसी वैज्ञानिक प्रक्रियाओं को अपनाना जरूरी है। किसान, उपभोक्ता से लेकर गांव तक को फायदा पेस्टिसाइड-फ्री उत्पादन से किसानों को बेहतर गुणवत्ता वाले उत्पाद, बाजार तक पहुंच और मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने के अवसर मिल सकते हैं। वहीं उपभोक्ताओं को सुरक्षित और जांचे हुए औषधीय उत्पाद उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। निर्यातकों के लिए अंतरराष्ट्रीय खरीदारों की अवशेष सीमा और गुणवत्ता संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करना आसान होगा। आयुर्वेदिक और हर्बल उद्योग को मानकीकृत एवं ट्रेस करने योग्य कच्चा माल मिलेगा। इसके साथ ही पाउडर, कैप्सूल, एक्सट्रैक्ट, हर्बल चाय, हेल्थ सप्लीमेंट और कॉस्मेटिक उत्पादों से जुड़े स्टार्टअप और एमएसएमई गांवों में स्थापित किए जा सकेंगे। इससे स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परीक्षण और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। गौशालाओं की भी बढ़ेगी आत्मनिर्भरता औषधीय पौधों की पेस्टिसाइड-फ्री खेती में गोबर, गोमूत्र और अन्य गौ-आधारित जैविक कृषि इनपुट की मांग बढ़ने की संभावना है। इससे गौशालाओं के लिए आय के नए अवसर पैदा करने और उन्हें अधिक आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में मदद मिल सकती है। वहीं प्राकृतिक एवं जैविक कृषि पद्धतियों से मिट्टी की जैविक सक्रियता, जल गुणवत्ता, लाभकारी कीटों और जैव विविधता के संरक्षण को भी बढ़ावा देने पर जोर दिया जा रहा है। किसान का बेटा बनाए अपना ब्रांड, सीधे करे निर्यात कार्यक्रम का केंद्रीय संदेश है कि किसान परिवार की अगली पीढ़ी केवल गेहूं, चना, सरसों, ज्वार, बाजरा और मक्का जैसी फसलों का कच्चा उत्पादन बेचने तक सीमित न रहे। किसान औषधीय वनस्पतियों की वैज्ञानिक खेती करे, गांव में ही उनका प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन करे, अपना ब्रांड तैयार करे और उत्पाद को देश-विदेश के बाजार तक पहुंचाए। उदाहरण के तौर पर अश्वगंधा की खेती करने वाला किसान केवल उसकी जड़ बेचने के बजाय पाउडर, कैप्सूल अथवा मानकीकृत उत्पाद तैयार कर सकता है। इसी तरह मोरिंगा, शतावरी, काली हल्दी, एलोवेरा, सफेद मूसली, सर्पगंधा, कालमेघ, तुलसी, गिलोय, मुलेठी, ब्राह्मी, मंडूकपर्णी, लेमनग्रास, सिट्रोनेला, पामारोजा, खस, स्टीविया, आंवला और नीम जैसी वनस्पतियों की खेती से लेकर प्रसंस्करण और विपणन तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करने पर जोर दिया गया। “एमएसएमई गांव से चलेगी, उद्योग गांव में लगेगा” कार्यक्रम की मुख्य वक्ता एवं हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता ने कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए किसान को केवल उत्पादक नहीं, बल्कि उद्यमी और निर्यातक बनाने की जरूरत है। उनका संदेश है कि “एमएसएमई गांव से चलेगी, उद्योग गांव में लगेगा।” उन्होंने औषधीय पौधों की खेती को स्थानीय प्रसंस्करण इकाइयों, उत्पाद निर्माण, ब्रांडिंग और निर्यात से जोड़ने पर जोर दिया, ताकि गांव में ही रोजगार और आय के नए स्रोत विकसित किए जा सकें। वैज्ञानिक जांच और ट्रेसबिलिटी पर जोर प्रशिक्षण में यह भी स्पष्ट किया जा रहा है कि किसी उत्पाद को पेस्टिसाइड-फ्री बताने के लिए केवल दावा पर्याप्त नहीं है। इसके लिए वैज्ञानिक रिकॉर्ड, खेत की ट्रेसबिलिटी और मान्यताप्राप्त प्रयोगशाला की जांच रिपोर्ट जैसे प्रमाण जरूरी हैं। कार्यक्रम में प्रतिभागियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की गुणवत्ता आवश्यकताओं, अवशेष नियंत्रण और ऐसी उत्पादन व्यवस्था विकसित करने की जानकारी दी जा रही है, जिससे भारतीय औषधीय उत्पाद वैश्विक बाजार में गुणवत्ता के मानकों पर खरे उतर सकें।

