लखनऊ के बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान ने अपना 80वां स्थापना दिवस मनाया। इस मौके पर संस्थान की आठ दशकों की वैज्ञानिक यात्रा पर चर्चा हुईं । साथ ही आधुनिक तकनीक और शोध से जुड़े कई अहम कदम उठाए गए। कार्यक्रम में वैज्ञानिकों ने पुराविज्ञान, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और प्राकृतिक आपदाओं से जुड़े शोध की उपयोगिता पर भी चर्चा की। समारोह का मुख्य आकर्षण BRAHMA (बीरबल साहनी रिपोसिटरी फॉर ए.आई – इनेबल्ड फॉसिल हेरिटेज, मॉडलिंग एंड आर्काइव्स) लैब का उद्घाटन रहा। इस लैब में एआई, मशीन लर्निंग और कंप्यूटेशनल तकनीक का इस्तेमाल होगा। इसकी मदद से देश की जीवाश्म विरासत का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा। इससे जीवाश्मों का वैज्ञानिक विश्लेषण और शोध बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। भारी बारिश से जुड़े चेतावनी संकेत पूर्व अतिरिक्त महानिदेशक आईएमडी डॉ. आनंद शर्मा ने 2013 की केदारनाथ आपदा का उदाहरण दिया। उन्होंने समय पर चेतावनी और सुरक्षा उपायों की जरूरत बताई। डॉ. शर्मा ने चारधाम यात्रा और पहाड़ी पर्यटन स्थलों पर भारी बारिश से जुड़े चेतावनी संकेत लगाने का सुझाव दिया। इससे पर्यटकों और यात्रियों को संभावित खतरे की जानकारी पहले मिल सकेगी। डीएसटी सचिव प्रो. उमेश वी. वाघमारे ने बताया कि बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान जनवरी 2027 में 22वीं इंटरनेशनल यूनियन फॉर क्वाटरनरी रिसर्च (INQUA) कांग्रेस की मेजबानी करेगा। यह अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस भारत में पहली बार लखनऊ में होगी। पुराविज्ञान स्मारिका के पांचवें अंक का विमोचन समारोह में जर्नल ऑफ पैलेयो साइंसेज, BRAHMA मिशन-एसओपी और पैलेयो साइंस टुडे के विशेष अंकों का विमोचन किया। इसके साथ ही हिंदी पखवाड़ा 2026 की शुरुआत हुई। पुराविज्ञान स्मारिका के पांचवें अंक का भी विमोचन किया गया। बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो. महेश जी. ठक्कर ने बताया। संस्थान की अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं और वैज्ञानिक डेटा पर्यावरण, मानसून, समुद्र स्तर में बदलाव और प्राकृतिक आपदाओं को समझने में मदद कर रहे हैं। डीएसटी सचिव प्रो. वाघमारे ने जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता, भू-विरासत और खगोलजीवविज्ञान के क्षेत्र में संस्थान के शोध की सराहना की। 80 साल की वैज्ञानिक यात्रा पूरी करने के बाद संस्थान अब 81वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। नए परिसर, अत्याधुनिक राष्ट्रीय संग्रहालय, उन्नत विश्लेषणात्मक सुविधाओं और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए संस्थान संस्थापक प्रो. बीरबल साहनी की वैज्ञानिक विरासत को आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

