नालंदा के टीचर डॉ. सौरभ कुमार को पटना में शिक्षक दिवस के मौके पर राज्यस्तरीय शिक्षक पुरस्कार से नवाजा गया है। सौरभ कुमार अस्थावां प्रखंड के बहादुरपुर उत्क्रमित मध्य विद्यालय में पढ़ता हैं। वे स्कूल के पूर्व प्रभारी हेडमास्टर भी हैं। दरअसल, बिहार सरकार की ओर से टीचिंग में इनोवेशन, डिसिप्लिन के क्षेत्र में बेहतर योगदान के लिए कुल 38 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इनमें नालंदा के सौरभ कुमार भी शामिल हैं। सौरभ कुमार को सम्मान दिए जाने के बाद उनके स्कूल के साथी टीचरों का कहना है कि ये उपलब्धि न केवल डॉ. सौरभ के समर्पण की पहचान है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र के शिक्षकों को भी बेहतर कार्य करने की नई प्रेरणा मिलेगी। स्कूल में पढ़ाई के दौरान डॉ. सौरभ की तीन तस्वीरें देखिए प्राइवेट स्कूलों को छोड़ सरकारी स्कूल का रुख कर रहे छात्र डॉ. सौरभ जिस स्कूल में पढ़ाते हैं, उस स्कूल की सबसे बड़ी कामयाबी ये है कि स्कूल में एडमिशन लेने वाले कई बच्चे ऐसे हैं, जो पहले प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे। 7वीं की छात्रा प्रिया कुमारी और स्नेहा कुमारी बताती हैं कि पहले वे जहां पढ़ती थीं, उसके मुकाबले यहां पढ़ाई की व्यवस्था कहीं ज्यादा बेहतर है। वहीं पुलिस अफसर बनने का सपना देखने वाली छात्रा पिंकी कुमारी का कहना है कि यहां पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद और अन्य गतिविधियां भी बेहद शानदार माहौल में और पूरी तरह फ्री कराई जाती हैं। अनुशासन और उपलब्धियों में अव्वल, टाई-बेल्ट में आते हैं बच्चे इस स्कूल में बच्चों की उपस्थिति हमेशा 90 प्रतिशत से अधिक रहती है और सभी छात्र प्रतिदिन टाई, बेल्ट व पहचान पत्र के साथ पूर्ण गणवेश में आते हैं। अस्थावां प्रखंड से यह इकलौता ऐसा स्कूल है जिसके बच्चों ने खेल तरंग और दक्ष कार्यक्रम में 27 प्रखंड स्तरीय पुरस्कार अपने नाम किए हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय खोज प्रतिभा प्रतियोगिता और अमृत महोत्सव के तहत छात्रों ने जिला स्तर पर निबंध व पेंटिंग स्पर्धाओं में भी कई पुरस्कार जीते हैं। स्कूल की इस सफलता में समाज की भी सक्रिय भागीदारी रहती है, जहां हर महीने नियमित अभिभावक बैठक आयोजित कर अभिभावकों के सुझावों को गंभीरता से धरातल पर उतारा जाता है। ‘जब से सौरभ सर आए, स्कूल की तस्वीर ही बदल गई’ ग्रामीण बताते हैं कि साल 2012-13 में जब से डॉ. सौरभ यहां आए हैं, तब से इस खस्ताहाल बिल्डिंग वाले स्कूल की तस्वीर ही बदल गई और उन्होंने अपने स्तर से स्मार्ट क्लासरूम की व्यवस्था करवाई। साल 2003 से स्कूल में पढ़ाने वाली टीचर आभा कुमारी का कहना है कि सौरभ सर अपनी उच्च योग्यता के दम पर कहीं कॉलेज में जा सकते थे, लेकिन उन्होंने इसी ग्रामीण स्कूल को चुना और भीषण गर्मी की छुट्टियों में भी अपनी जेब से पैसे खर्च कर विद्यालय को संवारा। वहीं, स्पेशल टीचर संजीव कुमार सिन्हा बताते हैं कि बतौर हेडमास्टर उन्होंने सभी शिक्षकों को स्कूल के विकास के लिए पूरी स्वतंत्रता दी और वे वास्तव में राष्ट्रीय स्तर के सम्मान के सच्चे हकदार हैं। सरकारी स्कूलों की छवि बदलना ही जीवन का अगला बड़ा लक्ष्य साल 2018 से 2024 तक प्रभारी हेडमास्टर की जिम्मेदारी संभालने वाले डॉ. सौरभ कुमार इस पूरी सफलता का श्रेय अपने विद्यालय परिवार, साथी शिक्षकों और बच्चों की मेहनत को देते हैं। उनके पिता रिटायर्ड ब्लॉक एजुकेशन अफसर रह चुके हैं, जिससे उन्हें घर में ही शिक्षा की सेवा करने की प्रेरणा मिली। डॉ. सौरभ का अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य समाज की उस मानसिकता को जड़ से खत्म करना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। उनका स्पष्ट संदेश है कि ग्रामीण बेझिझक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजें, क्योंकि यहां के बच्चे किसी भी बड़े और नामी निजी स्कूल के बच्चों को कड़ी टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। नालंदा के टीचर डॉ. सौरभ कुमार को पटना में शिक्षक दिवस के मौके पर राज्यस्तरीय शिक्षक पुरस्कार से नवाजा गया है। सौरभ कुमार अस्थावां प्रखंड के बहादुरपुर उत्क्रमित मध्य विद्यालय में पढ़ता हैं। वे स्कूल के पूर्व प्रभारी हेडमास्टर भी हैं। दरअसल, बिहार सरकार की ओर से टीचिंग में इनोवेशन, डिसिप्लिन के क्षेत्र में बेहतर योगदान के लिए कुल 38 शिक्षकों को सम्मानित किया गया। इनमें नालंदा के सौरभ कुमार भी शामिल हैं। सौरभ कुमार को सम्मान दिए जाने के बाद उनके स्कूल के साथी टीचरों का कहना है कि ये उपलब्धि न केवल डॉ. सौरभ के समर्पण की पहचान है, बल्कि इससे पूरे क्षेत्र के शिक्षकों को भी बेहतर कार्य करने की नई प्रेरणा मिलेगी। स्कूल में पढ़ाई के दौरान डॉ. सौरभ की तीन तस्वीरें देखिए प्राइवेट स्कूलों को छोड़ सरकारी स्कूल का रुख कर रहे छात्र डॉ. सौरभ जिस स्कूल में पढ़ाते हैं, उस स्कूल की सबसे बड़ी कामयाबी ये है कि स्कूल में एडमिशन लेने वाले कई बच्चे ऐसे हैं, जो पहले प्राइवेट स्कूल में पढ़ते थे। 7वीं की छात्रा प्रिया कुमारी और स्नेहा कुमारी बताती हैं कि पहले वे जहां पढ़ती थीं, उसके मुकाबले यहां पढ़ाई की व्यवस्था कहीं ज्यादा बेहतर है। वहीं पुलिस अफसर बनने का सपना देखने वाली छात्रा पिंकी कुमारी का कहना है कि यहां पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद और अन्य गतिविधियां भी बेहद शानदार माहौल में और पूरी तरह फ्री कराई जाती हैं। अनुशासन और उपलब्धियों में अव्वल, टाई-बेल्ट में आते हैं बच्चे इस स्कूल में बच्चों की उपस्थिति हमेशा 90 प्रतिशत से अधिक रहती है और सभी छात्र प्रतिदिन टाई, बेल्ट व पहचान पत्र के साथ पूर्ण गणवेश में आते हैं। अस्थावां प्रखंड से यह इकलौता ऐसा स्कूल है जिसके बच्चों ने खेल तरंग और दक्ष कार्यक्रम में 27 प्रखंड स्तरीय पुरस्कार अपने नाम किए हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय खोज प्रतिभा प्रतियोगिता और अमृत महोत्सव के तहत छात्रों ने जिला स्तर पर निबंध व पेंटिंग स्पर्धाओं में भी कई पुरस्कार जीते हैं। स्कूल की इस सफलता में समाज की भी सक्रिय भागीदारी रहती है, जहां हर महीने नियमित अभिभावक बैठक आयोजित कर अभिभावकों के सुझावों को गंभीरता से धरातल पर उतारा जाता है। ‘जब से सौरभ सर आए, स्कूल की तस्वीर ही बदल गई’ ग्रामीण बताते हैं कि साल 2012-13 में जब से डॉ. सौरभ यहां आए हैं, तब से इस खस्ताहाल बिल्डिंग वाले स्कूल की तस्वीर ही बदल गई और उन्होंने अपने स्तर से स्मार्ट क्लासरूम की व्यवस्था करवाई। साल 2003 से स्कूल में पढ़ाने वाली टीचर आभा कुमारी का कहना है कि सौरभ सर अपनी उच्च योग्यता के दम पर कहीं कॉलेज में जा सकते थे, लेकिन उन्होंने इसी ग्रामीण स्कूल को चुना और भीषण गर्मी की छुट्टियों में भी अपनी जेब से पैसे खर्च कर विद्यालय को संवारा। वहीं, स्पेशल टीचर संजीव कुमार सिन्हा बताते हैं कि बतौर हेडमास्टर उन्होंने सभी शिक्षकों को स्कूल के विकास के लिए पूरी स्वतंत्रता दी और वे वास्तव में राष्ट्रीय स्तर के सम्मान के सच्चे हकदार हैं। सरकारी स्कूलों की छवि बदलना ही जीवन का अगला बड़ा लक्ष्य साल 2018 से 2024 तक प्रभारी हेडमास्टर की जिम्मेदारी संभालने वाले डॉ. सौरभ कुमार इस पूरी सफलता का श्रेय अपने विद्यालय परिवार, साथी शिक्षकों और बच्चों की मेहनत को देते हैं। उनके पिता रिटायर्ड ब्लॉक एजुकेशन अफसर रह चुके हैं, जिससे उन्हें घर में ही शिक्षा की सेवा करने की प्रेरणा मिली। डॉ. सौरभ का अगला और सबसे बड़ा लक्ष्य समाज की उस मानसिकता को जड़ से खत्म करना है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है। उनका स्पष्ट संदेश है कि ग्रामीण बेझिझक अपने बच्चों को सरकारी स्कूल भेजें, क्योंकि यहां के बच्चे किसी भी बड़े और नामी निजी स्कूल के बच्चों को कड़ी टक्कर देने के लिए पूरी तरह तैयार हैं।

