दालमंडी की कोयला-जद्दन बाई के कोठे थे क्रांतिकारियों की शरणगाह:होती थी गुप्त बैठकें, अंग्रेजों को कोठा सर्च करने की नहीं होती थी हिम्मत

दालमंडी की कोयला-जद्दन बाई के कोठे थे क्रांतिकारियों की शरणगाह:होती थी गुप्त बैठकें, अंग्रेजों को कोठा सर्च करने की नहीं होती थी हिम्मत

‘दालमंडी में 200 से अधिक कोठे हुआ करते थे। लेकिन ये कोठे मुस्लिम मुसाफिर खाने से लेकर चौक थाने तक ही थे। स्वतंत्रता संग्राम में इन कोठों ने भी बड़ी भूमिका निभाई थी। अक्सर क्रांतिकारी किसी घटना के बाद काशी पहुंचते थे और यहां रहने वाली कोयला बाई और जद्दन बाई के कोठों पर शरण लेते थे। अंग्रेज पुलिस उन्हें ढूंढ नहीं पाती थी।इसलिए जद्दन बाई को स्वंत्रतता संग्राम सेनानी का तमगा भी मिला था।’ ये कहना है दालमंडी के रहने वाले 85 साल के बुजुर्ग हाजी मोहम्मद सफी खान का; सफी ने बताया – कोठे पर सिर्फ क्रांतिकारियों का जमावड़ा नहीं बल्कि नेताओं का भी अड्डा हुआ करता था। जहां वो अपनी आन्दोलनों की रूप रेखा बनाते थे। जिसमें कमलापति त्रिपाठी, सम्पूर्णानंद, काशी के पहले सांसद रघुनाथ सिंह, यहां के विधायक सभी आते थे और बैठकें करते थे। कोठों पर भी बैठकें गुप्त रूप से हुआ करती थीं। दालमंडी में अब सब अतीत है क्योंकि यहां चौड़ीकरण का काम चल रहा है। 181 मकान यहां चिह्नित हुए और अभी तक 179 मकान तोड़े जा चुके हैं। ऐसे में दालमंडी का इतिहास जमीदोज हो चुका है। इस इतिहास को और आजादी के दौरान किस तरह से वाराणसी के दालमंडी के कोठे क्रांतिकारियों की मदद करते थे। इन्हे जानने के लिए टीम दैनिक भास्कर वाराणसी के इस संकरे बाजार में पहुंची जिसका स्वरुप बदल चुका है। यहां आजादी के 80वें वर्ष में दैनिक भास्कर ने दालमंडी में बात की जीवन का 86 बसंत देख चुके हाजी मोहम्मद सफी खान, नन्हे खां और शकील अहमद से; साथ ही दालमंडी पर कई खबरें कर चुके काशी के पूर्व वरिष्ठ पत्रकार राजेश गुप्ता से।पढ़िए रिपोर्ट… सबसे पहले देखिये तीन तस्वीरों में कैसे बदल गयी काशी की दालमंडी की तस्वीर … अब जानिए वयोवृद्ध हाजी मोहम्मद सफी खान ने आजादी के पहले दालमंडी में क्या देखा और आजादी के दिन क्या माहौल था दालमंडी का ? शाम में सजती थीं कोठों पर महफिलें, नीचे दुकानें दालमंडी में नीचे सब दुकानदारी थी। ऊपर कोठे थे तवायफों के; नीचे बाजार चलता था और शाम होते ही दालमंडी गुलजार हो जाती थी। इसमें कई तवायफों की कोठा था। जहां शाम में रईस लोग आते थे। अच्छी-अच्छी कलाकार यहां थीं जिनका इंडिया लेवल पर नाम है। नारियल बाजार में थीं कोयला बेगम। रानी पुष्पलता थीं जो कव्वाल थीं। पहले गाना गाती थीं फिर कव्वाली गाने लगी। कई तवायफें ऐसी थीं जो गलत काम नहीं करती थीं। जद्दन बाई के कोठे पर बनती थी रणनीति सफी खान बताते हैं – आजादी के पहले से ही ये कोठे गुप्त बैठकों के लिए मुफीद थे। काशी के कद्द्वार नेता कमलापति त्रिपाठी, डॉ सम्पूर्णानंद, काशी नरेश जैसी हस्तियां यहां आजादी को लेकर होने वाले आंदोलनों की चर्चा करते और उसकी रूपरेखा तैयार करते। इसमें बनारस के पहले एमपी रहे रघुनाथ सिंह और विधायक गिरधारी लाल भी शामिल रहते थे और कई सारे नेता यहां आते थे। ये लोग इसके अलावा चित्रा सिनेमा के अंदर स्थित मदन महराज की पान की दुकान के चबूतरे पर भी बैठकी करते थे। मुस्लिम मुसाफिर खाने के बाद नहीं थीं तवायफें सफी खान ने बताया – चौक थाने से लेकर हाकिम काजिम साहब के मकान तक तवायफों की रिहाइश वाराणसी की दालमंडी में थी। इसके उधर तवायफें नहीं थीं। इस तरफ कई इलाकों में गलियों में तवायफों की रिहाइश होती थी। जो साल 1971-72 में खत्म हुआ। पुलिस की सर्च में नहीं मिलते थे क्रांतिकारी सफी खान बताते हैं – आजादी के मतवाले और इन कोठों का गहरा संबंध था क्योंकि उन दिनों अंग्रेज क्रांतिकारियों को चिह्नित कर उन्हें जेल में डाल रहे थे। ऐसे में आस-पास के क्रांतिकारी इन कोठों में शरण लेते थे। पुलिस आती थी तो क्रांतिकारियों को ढूढं नहीं पाती थी और उन्हें वापस जाना पड़ता था। इसमें नारियल बाजार में रहने वाली कोयला बाई, लच्छू महराज की मौसेरी बहन कुमकुम के कोठे पर क्रांतिकारी पनाह लेते थे। उस वक्त तवायफें खुलकर कहती थीं की हां हमने छुपाया है। चंद्रशेखर आजाद भी अक्सर जद्दन बाई के घर में शरण लेते थे। इसी लिए जद्दन बाई को स्वतंत्रता सेनानी का टाइटिल भी मिला था। दालमंडी के गोविंदपुरा इलाके में छुपते थे क्रांतिकारी दालमंडी के ही रहने वाले नंन्हे खां ने बताया – दालमंडी में जो तवायफें रहती थीं। वो कभी गलत नहीं करती थीं। यदि किसी शरीफ घर का लड़का यहां आ जाता था तो उनके घर सूचना भिजवाती थीं। की आप का लड़का यहां आया है। इसके अलावा आजादी के आंदोलन की बात करें तो यहां क्रांतिकारी आकर छुपते थे। इसमें गोविंदपुरा इलाके में स्थिति पन्ना खन्ना का कोठा था जो हिरोईन भी हुईं बाद में। उनके घर क्रांतिकारी आकर छुपते थे। राजा, महराजा, रईस और व्यापारी यहां शाम में कोठे पर आकर मनोरंजन करते थे और वापस चले जाते थे। शराब बहुत कम कोठों पर परोसी जाती थी। लोग नीचे खड़े होकर भी संगीत की स्वरलहरियां सुना करते थे। कभी अंग्रेजों के बुलावे पर नहीं सजाई महफिल शकील अहमद ने बताया – हमने जो बुजर्गों से सुना है उसके अनुसार पूरे देश के अच्छे घरानों के लोग यहां संगीत की शिक्षा लेने आते थे। पुराने जामने में जब देश आजादी की लड़ाई लड़ रहा था। उस समय भी इन तवायफों ने भी देश का और स्वतंत्रता सेनानियों की मदद की। तवायफों ने कभी अंग्रेजों की महफिलों में नहीं गाया और न ही उनके बुलावे पर कहीं गईं। इसके अलावा जो क्रांतिकारी भाग कर आते थे उन्हें शरण भी देती थीं। अब जानिए काशी को पिछले 40 सालों से करीब से देखने वाले पूर्व पत्रकार राजेश गुप्ता ने क्या कहा ? सिर्फ शरण ही नहीं उनकी आर्थिक मदद भी करती थीं आजादी के आंदोलन में समाज के हर एक वर्ग का योगदान था। अगर दालमंडी की बात करें तो वैश्वियक जीवन के रूप में दालमंडी बहुत सरनाम थी। वहां की तवायफें और वहां के कोठे का नाम भी आजादी के आंदोलन में लिया जाता रहा है। लोग कहते हैं की अप्रत्यक्ष रूप में योगदान था लेकिन मै कहता हूं की प्रत्यक्ष रूप से योगदान था। क्योंकि दालमंडी के जो कोठे हैं क्रांतिकारी उन्ही में छुपाते थे और वो उनकी शरण स्थली थी। चाहे वो रसूलन बाई रही हों । या राजेश्वरी बाई, जद्दन बाई, छोटी मैना, बड़ी मैना का नाम लीजिये। यहां क्रांतिकारी छुपाते थे और अंग्रेज सिपाहियों को भनक तक नहीं लगती थी। सिर्फ ये छुपते नहीं थे बल्कि इन्हे सूचनांए देना और इनकी आर्थिक मदद भी दालमंडी की तवायफें करती थीं। गुप्त बैठकों का भी रहा है इतिहास राजेश गुप्ता ने बताया – क्रांतिकारियों की गुप्त बैठकें भी इन कोठों पर अक्सर हुआ करती थी। जिसकी भनक भी अंग्रेज नहीं लगा पाते थे। ये बैठकें अगले आंदोलन, या हमले के बारे में होती थी। बहुत सारे पर्चे भी हाथ से लिखे हुए इन्ही कोठों पर तैयार किए जाते थे। आप कह सकते हैं की आजादी के आंदोलन की रूप रेखा को इन कोठों पर अमलीजामा पहनाया जाता था। बनारस के आंदोलन में हर वर्ग का सहयोग बनारस में आजादी के आंदोलन में हर वर्ग का योगदान था। जितने बनारस में साहित्यकार थे, कवि थे सभी योगदान दे रहे थे। कोई कविता केमाध्यम से देशभक्ति का अलख जगा रहा था। कोई अपने साहित्य के मध्यम से योगदान देता था। कोठे को कभी वाराणसी में हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता था। रईस शान के साथ जाते थे मुजरा सुनने बड़े ही शान के साथ बनारस के जो रईस होते थे। वो उन कोठों पर जाते थे। मुजरा सुनते थे और मलाई का एक पुरवा लेकर अपने घर पहुंचते थे। तो वहां उनकी मां कहती थी बहु खाना निकाल दो साव जी मुजरा सुनके आ गए। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं की उसे हेय दृष्टि से नहीं देखा गया। शरीर बेचने का नहीं होता था काम राजेश गुप्ता ने बताया – बनारस के इन कोठों पर शरीर बेचने का काम नहीं होता वहां गायन वादन और नृत्य की महफ़िल सजती थी। एक तरीके से कहा जाए की वो ऐसा सेंटर होता था की लोग बेतकुल्लफी से लोग जाते थे और आजादी के आंदोलन को मूर्त रूप देते थे।

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