10 परीक्षाओं में असफलता के बाद बने असिस्टेंट कमांडेंट:8×8 के कमरे में बिना कोचिंग की तैयारी की, मुजफ्फरपुर के घनश्याम की सक्सेस स्टोरी

10 परीक्षाओं में असफलता के बाद बने असिस्टेंट कमांडेंट:8×8 के कमरे में बिना कोचिंग की तैयारी की, मुजफ्फरपुर के घनश्याम की सक्सेस स्टोरी

मुजफ्फरपुर में बैरिया बस स्टैंड पर पिता की छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान है। मां गृहिणी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन बेटे के सपने बड़े थे। घर के महज 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल लगाकर पढ़ाई करने वाले घनश्याम जायसवाल ने आखिरकार अपनी मेहनत से बड़ा मुकाम हासिल किया। UPSC परीक्षा में सफलता हासिल कर उनका चयन असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर हुआ है। घनश्याम की सफलता की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह पहला मौका नहीं था जब उन्होंने किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के लिए प्रयास किया। पिछले करीब 5-6 वर्षों में उन्होंने लगभग 10 सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, लेकिन हर बार असफलता हाथ लगी। किसी परीक्षा में करीब 10 नंबर से चूक गए तो BPSC 70वीं का रिजल्ट महज 2 नंबर से रह गया। लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी। तैयारी के दौरान धनश्याम की 2 तस्वीरें इंजीनियर बनने का था सपना घनश्याम की शुरुआती पढ़ाई मुजफ्फरपुर के बैरिया स्थित नथनी भगत विद्यालय से हुई। इसके बाद रामेश्वर सिंह कॉलेज से विज्ञान विषय में 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही उनका सपना IIT जाकर इंजीनियर बनने का था। उन्होंने IIT-JEE की परीक्षा भी दी, लेकिन सफलता नहीं मिली और आगे किसी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। इसके बाद उन्होंने इंजीनियर बनने का सपना छोड़ दिया और सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। पढ़ाई का खर्च निकालने और परिवार की मदद करने के लिए उन्होंने बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। दिन में बच्चों को पढ़ाते और इसके बाद खुद की तैयारी में जुट जाते। 10 परीक्षाओं में असफल हुए, फिर भी नहीं रुके घनश्याम बताते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें कई बार असफलता मिली। कभी 10 नंबर से तो कभी कुछ अंकों से परीक्षा छूट गई। BPSC 70वीं में तो वह सिर्फ दो नंबर से पीछे रह गए। हर असफलता के बाद करीब 8-10 दिन तक परेशान होते थे, लेकिन उसे खुद पर हावी नहीं होने देते थे। इसके बाद नए सिरे से तैयारी शुरू कर देते। घर पर रहकर ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल और YouTube वीडियो के जरिए तैयारी जारी रखी। करीब 9 घंटे सेल्फ स्टडी और 2 घंटे बच्चों को पढ़ाने/कोचिंग के काम के बीच वह अपनी तैयारी करते रहे। जरूरत पड़ने पर पिता की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे। 8×8 के कमरे में बनाई सफलता की रणनीति घनश्याम का घर बड़ा नहीं था। जिस छोटे से कमरे में वह रहते थे, उसी में पढ़ाई भी करते थे। 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल थी। इसी जगह बैठकर उन्होंने वर्षों तक तैयारी की। वह बताते हैं कि तैयारी के दौरान उनका सबसे ज्यादा भरोसा निरंतरता पर रहा। रोजाना तय समय तक पढ़ना, खुद नोट्स बनाना और बार-बार रिवीजन करना उनकी तैयारी का हिस्सा रहा। पिता खुद 10वीं के बाद नहीं पढ़ सके, बेटे को पढ़ने से नहीं रोका घनश्याम के पिता शत्रुधन शाह बैरिया बस स्टैंड पर चाय-नाश्ते की छोटी दुकान चलाते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1969 में 10वीं की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन घर की आर्थिक मजबूरियों के कारण आगे नहीं पढ़ सके और परिवार की जिम्मेदारी संभालने में जुट गए। उन्होंने तय किया कि जिस मजबूरी के कारण उनकी पढ़ाई छूटी, उसका असर बेटे की पढ़ाई पर नहीं पड़ने देंगे। सीमित आमदनी के बावजूद बेटे को लगातार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। घनश्याम सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं। उनकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं, जबकि पिता 10वीं पास हैं। बेटे के असिस्टेंट कमांडेंट बनने की खबर के बाद पिता भावुक हैं। उनका कहना है कि बेटे ने उनकी वर्षों की मेहनत और उम्मीद को सफल कर दिया। अब IAS बनने का सपना UPSC में सफलता मिलने के बाद घनश्याम खुश हैं, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारी रोकने का फैसला नहीं किया है। उनका अगला लक्ष्य UPSC क्लियर कर IAS बनना है। वह कहते हैं कि सफलता के बाद भी मेहनत जारी रखेंगे और इससे बेहतर मुकाम हासिल करने की कोशिश करेंगे। अभ्यर्थियों को घनश्याम की सलाह घनश्याम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से कहते हैं कि असफलता से घबराना नहीं चाहिए। असफलता को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। बेसिक्स मजबूत करने के लिए NCERT को खुद पढ़ना, अपने हाथ से नोट्स तैयार करना और लगातार रिवीजन करना जरूरी है। उनका कहना है कि “कितनी बार असफल हुए, यह मायने नहीं रखता। हर असफलता के बाद दोबारा कितनी मजबूती से तैयारी शुरू की, यही सफलता तक पहुंचाता है।” मुजफ्फरपुर में बैरिया बस स्टैंड पर पिता की छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान है। मां गृहिणी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन बेटे के सपने बड़े थे। घर के महज 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल लगाकर पढ़ाई करने वाले घनश्याम जायसवाल ने आखिरकार अपनी मेहनत से बड़ा मुकाम हासिल किया। UPSC परीक्षा में सफलता हासिल कर उनका चयन असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर हुआ है। घनश्याम की सफलता की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह पहला मौका नहीं था जब उन्होंने किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के लिए प्रयास किया। पिछले करीब 5-6 वर्षों में उन्होंने लगभग 10 सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, लेकिन हर बार असफलता हाथ लगी। किसी परीक्षा में करीब 10 नंबर से चूक गए तो BPSC 70वीं का रिजल्ट महज 2 नंबर से रह गया। लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी। तैयारी के दौरान धनश्याम की 2 तस्वीरें इंजीनियर बनने का था सपना घनश्याम की शुरुआती पढ़ाई मुजफ्फरपुर के बैरिया स्थित नथनी भगत विद्यालय से हुई। इसके बाद रामेश्वर सिंह कॉलेज से विज्ञान विषय में 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही उनका सपना IIT जाकर इंजीनियर बनने का था। उन्होंने IIT-JEE की परीक्षा भी दी, लेकिन सफलता नहीं मिली और आगे किसी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। इसके बाद उन्होंने इंजीनियर बनने का सपना छोड़ दिया और सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। पढ़ाई का खर्च निकालने और परिवार की मदद करने के लिए उन्होंने बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। दिन में बच्चों को पढ़ाते और इसके बाद खुद की तैयारी में जुट जाते। 10 परीक्षाओं में असफल हुए, फिर भी नहीं रुके घनश्याम बताते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें कई बार असफलता मिली। कभी 10 नंबर से तो कभी कुछ अंकों से परीक्षा छूट गई। BPSC 70वीं में तो वह सिर्फ दो नंबर से पीछे रह गए। हर असफलता के बाद करीब 8-10 दिन तक परेशान होते थे, लेकिन उसे खुद पर हावी नहीं होने देते थे। इसके बाद नए सिरे से तैयारी शुरू कर देते। घर पर रहकर ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल और YouTube वीडियो के जरिए तैयारी जारी रखी। करीब 9 घंटे सेल्फ स्टडी और 2 घंटे बच्चों को पढ़ाने/कोचिंग के काम के बीच वह अपनी तैयारी करते रहे। जरूरत पड़ने पर पिता की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे। 8×8 के कमरे में बनाई सफलता की रणनीति घनश्याम का घर बड़ा नहीं था। जिस छोटे से कमरे में वह रहते थे, उसी में पढ़ाई भी करते थे। 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल थी। इसी जगह बैठकर उन्होंने वर्षों तक तैयारी की। वह बताते हैं कि तैयारी के दौरान उनका सबसे ज्यादा भरोसा निरंतरता पर रहा। रोजाना तय समय तक पढ़ना, खुद नोट्स बनाना और बार-बार रिवीजन करना उनकी तैयारी का हिस्सा रहा। पिता खुद 10वीं के बाद नहीं पढ़ सके, बेटे को पढ़ने से नहीं रोका घनश्याम के पिता शत्रुधन शाह बैरिया बस स्टैंड पर चाय-नाश्ते की छोटी दुकान चलाते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1969 में 10वीं की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन घर की आर्थिक मजबूरियों के कारण आगे नहीं पढ़ सके और परिवार की जिम्मेदारी संभालने में जुट गए। उन्होंने तय किया कि जिस मजबूरी के कारण उनकी पढ़ाई छूटी, उसका असर बेटे की पढ़ाई पर नहीं पड़ने देंगे। सीमित आमदनी के बावजूद बेटे को लगातार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। घनश्याम सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं। उनकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं, जबकि पिता 10वीं पास हैं। बेटे के असिस्टेंट कमांडेंट बनने की खबर के बाद पिता भावुक हैं। उनका कहना है कि बेटे ने उनकी वर्षों की मेहनत और उम्मीद को सफल कर दिया। अब IAS बनने का सपना UPSC में सफलता मिलने के बाद घनश्याम खुश हैं, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारी रोकने का फैसला नहीं किया है। उनका अगला लक्ष्य UPSC क्लियर कर IAS बनना है। वह कहते हैं कि सफलता के बाद भी मेहनत जारी रखेंगे और इससे बेहतर मुकाम हासिल करने की कोशिश करेंगे। अभ्यर्थियों को घनश्याम की सलाह घनश्याम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से कहते हैं कि असफलता से घबराना नहीं चाहिए। असफलता को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। बेसिक्स मजबूत करने के लिए NCERT को खुद पढ़ना, अपने हाथ से नोट्स तैयार करना और लगातार रिवीजन करना जरूरी है। उनका कहना है कि “कितनी बार असफल हुए, यह मायने नहीं रखता। हर असफलता के बाद दोबारा कितनी मजबूती से तैयारी शुरू की, यही सफलता तक पहुंचाता है।”  

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10 परीक्षाओं में असफलता के बाद बने असिस्टेंट कमांडेंट:8×8 के कमरे में बिना कोचिंग की तैयारी की, मुजफ्फरपुर के घनश्याम की सक्सेस स्टोरी

10 परीक्षाओं में असफलता के बाद बने असिस्टेंट कमांडेंट:8×8 के कमरे में बिना कोचिंग की तैयारी की, मुजफ्फरपुर के घनश्याम की सक्सेस स्टोरी

मुजफ्फरपुर में बैरिया बस स्टैंड पर पिता की छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान है। मां गृहिणी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन बेटे के सपने बड़े थे। घर के महज 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल लगाकर पढ़ाई करने वाले घनश्याम जायसवाल ने आखिरकार अपनी मेहनत से बड़ा मुकाम हासिल किया। UPSC परीक्षा में सफलता हासिल कर उनका चयन असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर हुआ है। घनश्याम की सफलता की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह पहला मौका नहीं था जब उन्होंने किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के लिए प्रयास किया। पिछले करीब 5-6 वर्षों में उन्होंने लगभग 10 सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, लेकिन हर बार असफलता हाथ लगी। किसी परीक्षा में करीब 10 नंबर से चूक गए तो BPSC 70वीं का रिजल्ट महज 2 नंबर से रह गया। लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी। तैयारी के दौरान धनश्याम की 2 तस्वीरें इंजीनियर बनने का था सपना घनश्याम की शुरुआती पढ़ाई मुजफ्फरपुर के बैरिया स्थित नथनी भगत विद्यालय से हुई। इसके बाद रामेश्वर सिंह कॉलेज से विज्ञान विषय में 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही उनका सपना IIT जाकर इंजीनियर बनने का था। उन्होंने IIT-JEE की परीक्षा भी दी, लेकिन सफलता नहीं मिली और आगे किसी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। इसके बाद उन्होंने इंजीनियर बनने का सपना छोड़ दिया और सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। पढ़ाई का खर्च निकालने और परिवार की मदद करने के लिए उन्होंने बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। दिन में बच्चों को पढ़ाते और इसके बाद खुद की तैयारी में जुट जाते। 10 परीक्षाओं में असफल हुए, फिर भी नहीं रुके घनश्याम बताते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें कई बार असफलता मिली। कभी 10 नंबर से तो कभी कुछ अंकों से परीक्षा छूट गई। BPSC 70वीं में तो वह सिर्फ दो नंबर से पीछे रह गए। हर असफलता के बाद करीब 8-10 दिन तक परेशान होते थे, लेकिन उसे खुद पर हावी नहीं होने देते थे। इसके बाद नए सिरे से तैयारी शुरू कर देते। घर पर रहकर ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल और YouTube वीडियो के जरिए तैयारी जारी रखी। करीब 9 घंटे सेल्फ स्टडी और 2 घंटे बच्चों को पढ़ाने/कोचिंग के काम के बीच वह अपनी तैयारी करते रहे। जरूरत पड़ने पर पिता की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे। 8×8 के कमरे में बनाई सफलता की रणनीति घनश्याम का घर बड़ा नहीं था। जिस छोटे से कमरे में वह रहते थे, उसी में पढ़ाई भी करते थे। 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल थी। इसी जगह बैठकर उन्होंने वर्षों तक तैयारी की। वह बताते हैं कि तैयारी के दौरान उनका सबसे ज्यादा भरोसा निरंतरता पर रहा। रोजाना तय समय तक पढ़ना, खुद नोट्स बनाना और बार-बार रिवीजन करना उनकी तैयारी का हिस्सा रहा। पिता खुद 10वीं के बाद नहीं पढ़ सके, बेटे को पढ़ने से नहीं रोका घनश्याम के पिता शत्रुधन शाह बैरिया बस स्टैंड पर चाय-नाश्ते की छोटी दुकान चलाते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1969 में 10वीं की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन घर की आर्थिक मजबूरियों के कारण आगे नहीं पढ़ सके और परिवार की जिम्मेदारी संभालने में जुट गए। उन्होंने तय किया कि जिस मजबूरी के कारण उनकी पढ़ाई छूटी, उसका असर बेटे की पढ़ाई पर नहीं पड़ने देंगे। सीमित आमदनी के बावजूद बेटे को लगातार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। घनश्याम सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं। उनकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं, जबकि पिता 10वीं पास हैं। बेटे के असिस्टेंट कमांडेंट बनने की खबर के बाद पिता भावुक हैं। उनका कहना है कि बेटे ने उनकी वर्षों की मेहनत और उम्मीद को सफल कर दिया। अब IAS बनने का सपना UPSC में सफलता मिलने के बाद घनश्याम खुश हैं, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारी रोकने का फैसला नहीं किया है। उनका अगला लक्ष्य UPSC क्लियर कर IAS बनना है। वह कहते हैं कि सफलता के बाद भी मेहनत जारी रखेंगे और इससे बेहतर मुकाम हासिल करने की कोशिश करेंगे। अभ्यर्थियों को घनश्याम की सलाह घनश्याम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से कहते हैं कि असफलता से घबराना नहीं चाहिए। असफलता को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। बेसिक्स मजबूत करने के लिए NCERT को खुद पढ़ना, अपने हाथ से नोट्स तैयार करना और लगातार रिवीजन करना जरूरी है। उनका कहना है कि “कितनी बार असफल हुए, यह मायने नहीं रखता। हर असफलता के बाद दोबारा कितनी मजबूती से तैयारी शुरू की, यही सफलता तक पहुंचाता है।” मुजफ्फरपुर में बैरिया बस स्टैंड पर पिता की छोटी सी चाय-नाश्ते की दुकान है। मां गृहिणी हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी, लेकिन बेटे के सपने बड़े थे। घर के महज 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल लगाकर पढ़ाई करने वाले घनश्याम जायसवाल ने आखिरकार अपनी मेहनत से बड़ा मुकाम हासिल किया। UPSC परीक्षा में सफलता हासिल कर उनका चयन असिस्टेंट कमांडेंट के पद पर हुआ है। घनश्याम की सफलता की कहानी इसलिए खास है, क्योंकि यह पहला मौका नहीं था जब उन्होंने किसी प्रतियोगी परीक्षा में सफलता के लिए प्रयास किया। पिछले करीब 5-6 वर्षों में उन्होंने लगभग 10 सरकारी प्रतियोगी परीक्षाएं दीं, लेकिन हर बार असफलता हाथ लगी। किसी परीक्षा में करीब 10 नंबर से चूक गए तो BPSC 70वीं का रिजल्ट महज 2 नंबर से रह गया। लगातार असफलताओं के बावजूद उन्होंने तैयारी नहीं छोड़ी। तैयारी के दौरान धनश्याम की 2 तस्वीरें इंजीनियर बनने का था सपना घनश्याम की शुरुआती पढ़ाई मुजफ्फरपुर के बैरिया स्थित नथनी भगत विद्यालय से हुई। इसके बाद रामेश्वर सिंह कॉलेज से विज्ञान विषय में 12वीं की पढ़ाई पूरी की। बचपन से ही उनका सपना IIT जाकर इंजीनियर बनने का था। उन्होंने IIT-JEE की परीक्षा भी दी, लेकिन सफलता नहीं मिली और आगे किसी कॉलेज में दाखिला नहीं मिल सका। इसके बाद उन्होंने इंजीनियर बनने का सपना छोड़ दिया और सिविल सेवा की तैयारी शुरू कर दी। पढ़ाई का खर्च निकालने और परिवार की मदद करने के लिए उन्होंने बच्चों को कोचिंग पढ़ाना शुरू किया। दिन में बच्चों को पढ़ाते और इसके बाद खुद की तैयारी में जुट जाते। 10 परीक्षाओं में असफल हुए, फिर भी नहीं रुके घनश्याम बताते हैं कि प्रतियोगी परीक्षाओं में उन्हें कई बार असफलता मिली। कभी 10 नंबर से तो कभी कुछ अंकों से परीक्षा छूट गई। BPSC 70वीं में तो वह सिर्फ दो नंबर से पीछे रह गए। हर असफलता के बाद करीब 8-10 दिन तक परेशान होते थे, लेकिन उसे खुद पर हावी नहीं होने देते थे। इसके बाद नए सिरे से तैयारी शुरू कर देते। घर पर रहकर ऑनलाइन स्टडी मैटेरियल और YouTube वीडियो के जरिए तैयारी जारी रखी। करीब 9 घंटे सेल्फ स्टडी और 2 घंटे बच्चों को पढ़ाने/कोचिंग के काम के बीच वह अपनी तैयारी करते रहे। जरूरत पड़ने पर पिता की दुकान पर भी हाथ बंटाते थे। 8×8 के कमरे में बनाई सफलता की रणनीति घनश्याम का घर बड़ा नहीं था। जिस छोटे से कमरे में वह रहते थे, उसी में पढ़ाई भी करते थे। 8×8 फीट के कमरे में एक तरफ बिस्तर और दूसरी तरफ स्टडी टेबल थी। इसी जगह बैठकर उन्होंने वर्षों तक तैयारी की। वह बताते हैं कि तैयारी के दौरान उनका सबसे ज्यादा भरोसा निरंतरता पर रहा। रोजाना तय समय तक पढ़ना, खुद नोट्स बनाना और बार-बार रिवीजन करना उनकी तैयारी का हिस्सा रहा। पिता खुद 10वीं के बाद नहीं पढ़ सके, बेटे को पढ़ने से नहीं रोका घनश्याम के पिता शत्रुधन शाह बैरिया बस स्टैंड पर चाय-नाश्ते की छोटी दुकान चलाते हैं। वह बताते हैं कि उन्होंने वर्ष 1969 में 10वीं की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन घर की आर्थिक मजबूरियों के कारण आगे नहीं पढ़ सके और परिवार की जिम्मेदारी संभालने में जुट गए। उन्होंने तय किया कि जिस मजबूरी के कारण उनकी पढ़ाई छूटी, उसका असर बेटे की पढ़ाई पर नहीं पड़ने देंगे। सीमित आमदनी के बावजूद बेटे को लगातार पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। घनश्याम सात भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर हैं। उनकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं, जबकि पिता 10वीं पास हैं। बेटे के असिस्टेंट कमांडेंट बनने की खबर के बाद पिता भावुक हैं। उनका कहना है कि बेटे ने उनकी वर्षों की मेहनत और उम्मीद को सफल कर दिया। अब IAS बनने का सपना UPSC में सफलता मिलने के बाद घनश्याम खुश हैं, लेकिन उन्होंने अपनी तैयारी रोकने का फैसला नहीं किया है। उनका अगला लक्ष्य UPSC क्लियर कर IAS बनना है। वह कहते हैं कि सफलता के बाद भी मेहनत जारी रखेंगे और इससे बेहतर मुकाम हासिल करने की कोशिश करेंगे। अभ्यर्थियों को घनश्याम की सलाह घनश्याम प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं से कहते हैं कि असफलता से घबराना नहीं चाहिए। असफलता को खुद पर हावी नहीं होने देना चाहिए। बेसिक्स मजबूत करने के लिए NCERT को खुद पढ़ना, अपने हाथ से नोट्स तैयार करना और लगातार रिवीजन करना जरूरी है। उनका कहना है कि “कितनी बार असफल हुए, यह मायने नहीं रखता। हर असफलता के बाद दोबारा कितनी मजबूती से तैयारी शुरू की, यही सफलता तक पहुंचाता है।”  

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