आजादी के अमृत महोत्सव के तहत शुरू हुआ हर घर तिरंगा अभियान केवल राष्ट्रभक्ति का जज्बा ही नहीं जगा रहा। बल्कि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की एक अनूठी कहानी भी लिख रहा है। बेगूसराय जिले में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जीविका से जुड़ी महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की एक मिसाल कायम की है। जिले के दो सिलाई केंद्रों में काम करने वाली करीब 100 जीविका दीदियों ने मात्र 15 दिनों के भीतर 10 से 12 हजार रुपए तक की कमाई की है। जीविका को इस वर्ष 2 लाख 25 हजार तिरंगे झंडे तैयार करने का ऑर्डर मिला था। दीदियों ने निर्धारित समय में न केवल इस लक्ष्य को हासिल किया। बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूती का अहसास भी कराया। सुबह 7 बजे घर का काम निपटाया, 8 बजे ड्यूटी पर- कामनी देवी पचंबा सिलाई केंद्र में काम करने वाली कामनी देवी 2016 से जीविका से जुड़ी हैं और 4 सालों से सिलाई का काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि हर घर तिरंगा अभियान से हमें बहुत बड़ा आर्थिक सहारा मिला है। मैं रोज 100 से 125 झंडे सिलती हूं। पिछले 10-12 दिनों की मेहनत से मैंने 8 से 9 हजार रुपए कमा लिए हैं। कामनी देवी कहती है कि सुबह 7 बजे तक घर का सारा खाना-पीना और काम निपटा लेती हूं और 8 बजे सिलाई सेंटर पहुंच जाती हूं। इस कमाई का उपयोग मैं अपने बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और घर के खर्चों में करती हूं। अब हमें अपने हाथ में पैसा रहने के कारण किसी के भरोसे नहीं रहना पड़ता और न ही किसी से आस लगानी पड़ती है। 15 दिनों में 15 हजार तक की कमाई- पूजा कुमारी सिलाई केंद्र में व्यस्तता के बीच बगवाड़ा की रहने वाली पूजा कुमारी बताती हैं कि पिछले 12 से 15 दिनों से झंडा बनाने का कार्यक्रम लगातार चल रहा है। हम रोज 100 से अधिक झंडे सिल लेते हैं। इससे हमें प्रतिदिन 500 से 600 तक की कमाई आसानी से हो जाती है। अब तक 12-13 दिन का काम हो चुका है और 1-2 दिन और काम चलेगा तो कुल मिलाकर 12 हजार तक की कमाई हो जाएगी। जब से झंडे की सिलाई का काम शुरू हुआ है, हमें मन में बहुत अच्छा महसूस होता है। देश के लिए तिरंगा सिलना गर्व की बात है और इसके साथ हमारी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। पूजा के चेहरे पर अपनी मेहनत की इस कमाई की खुशी साफ झलकती है। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि रक्षाबंधन के अवसर पर वे इन पैसों का इस्तेमाल करेंगी और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करेंगी। 3 हजार झंडे सिल चुकी हैं तारा देवी, बच्चों की पढ़ाई में लगाएंगी पैसा सिलाई केंद्र की दूसरी ओर बैठी तारा देवी की उंगलियां भी उतनी ही तेजी से सिलाई मशीन पर चल रही हैं। वे पिछले दो से तीन हफ्तों से लगातार इस काम में जुटी हुई हैं और हजारों झंडे तैयार कर चुकी हैं। तारा देवी बताती है कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पिछले 15 से 20 दिनों से लगातार झंडा सिल रहे हैं। इतने दिनों की मेहनत में मैंने अकेले करीब 3 हजार झंडे सिल दिए हैं। इतनी बड़ी संख्या में झंडे सिलने के पीछे तारा देवी का मुख्य उद्देश्य अपने परिवार और बच्चों का बेहतर भविष्य है। तारा देवी कहती है कि इस काम से जो पैसे हमें मिलेंगे, उससे हम अपने बच्चों को पढ़ाएंगे, उनकी स्कूल फीस और किताबों का खर्च उठाएंगे। इसके अलावा घर के अन्य जरूरी खर्चों में भी यह पैसा बहुत काम आएगा। देश के झंडे को सिलकर हमें बहुत खुशी और सुकून मिल रहा है। देशभक्ति के साथ आर्थिक क्रांति और महिला सशक्तिकरण कामिनी देवी, पूजा कुमारी और तारा देवी जैसी महिलाओं की कहानियां यह साबित करती हैं कि जब सरकारी और सामाजिक अभियानों को जमीनी स्तर पर रोजगार से जोड़ा जाता है, तो उसके परिणाम कितने सुखद होते हैं। हर घर तिरंगा अभियान ने ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्र की महिलाओं को एक ऐसा मंच दिया है, जहां वे अपनी क्षमता और हुनर का प्रदर्शन कर पा रही हैं। 90 से अधिक दीदियां सिलाई और 20 दीदियां पैकेजिंग में पचंबा यूनिट से जुड़ी निहारिका नयन ने बताया कि शुरुआत में झंडों का ऑर्डर 2 लाख का था, जो बाद में बढ़कर सवा दो लाख तक पहुंच गया। उन्होंने बताया कि सिलाई केंद्र पर रोजाना 90 से 96 दीदियां सिलाई का काम संभालती है। जबकि 20 दीदियां पैकेजिंग और डिस्पैच में लगी हुई हैं। निहारिका नयन ने केंद्र सरकार और प्रशासन का धन्यवाद करते हुए कहा कि जो दीदियां कभी अपने बच्चों की स्कूल फीस भरने या घर में दाल-सब्जी खरीदने के लिए सोचती थी, वे आज खुद कमा रही हैं। उनके चेहरे पर खुशी है क्योंकि वे अपने परिवार को आर्थिक मजबूती देकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ रही हैं। जीविका दीदियों द्वारा तैयार किए गए एक तिरंगे झंडे पर दीदियों को 6 रुपए की आमदनी हुई है। तैयार किए गए झंडों की मांग इतनी अधिक रही कि इनकी आपूर्ति बड़े-बड़े कॉर्पोरेट व सरकारी संस्थानों को की गई। मुख्य रूप से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL), हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (HURL), नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC), जिला प्रशासन, विभिन्न सामुदायिक संगठन सहित अन्य को आपूर्ति किया गया है। उद्यमिता और रोजगार का नया मॉडल जीविका के गैर-कृषि प्रबंधक श्याम सुन्दर भगत ने बताया कि पचंबा स्थित स्टिचिंग यूनिट और बरौनी यूनिट में जीविका दीदियों ने दिन-रात निरंतर कार्य करके समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की। जीविका के DPM अविनाश कुमार ने कहा कि जीविका दीदियों द्वारा तैयार किए गए तिरंगे झंडों ने हर घर तिरंगा अभियान को एक नई ऊर्जा दी है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए आय सृजन, स्थानीय स्तर पर रोजगार, महिला उद्यमिता और आर्थिक स्वावलंबन का बेहतरीन उदाहरण है। DPM ने कहा कि राष्ट्रध्वज के निर्माण से जुड़ी ये जीविका दीदियां न केवल देश के गौरव तिरंगे को घर-घर पहुंचा रही हैं। बल्कि अपने परिश्रम से अपने परिवारों के भविष्य को भी रोशन कर रही हैं। घरों पर तिरंगा लहराएगा, तो उस तिरंगे के हर एक टांके में इन महिलाओं का पसीना, उनकी मेहनत, देशभक्ति का जज्बा और आत्मनिर्भर बनने का सपना भी लहरा रहा होगा। आजादी के अमृत महोत्सव के तहत शुरू हुआ हर घर तिरंगा अभियान केवल राष्ट्रभक्ति का जज्बा ही नहीं जगा रहा। बल्कि ग्रामीण इलाकों में महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण की एक अनूठी कहानी भी लिख रहा है। बेगूसराय जिले में स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर जीविका से जुड़ी महिलाओं ने आत्मनिर्भरता की एक मिसाल कायम की है। जिले के दो सिलाई केंद्रों में काम करने वाली करीब 100 जीविका दीदियों ने मात्र 15 दिनों के भीतर 10 से 12 हजार रुपए तक की कमाई की है। जीविका को इस वर्ष 2 लाख 25 हजार तिरंगे झंडे तैयार करने का ऑर्डर मिला था। दीदियों ने निर्धारित समय में न केवल इस लक्ष्य को हासिल किया। बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था में अपनी मजबूती का अहसास भी कराया। सुबह 7 बजे घर का काम निपटाया, 8 बजे ड्यूटी पर- कामनी देवी पचंबा सिलाई केंद्र में काम करने वाली कामनी देवी 2016 से जीविका से जुड़ी हैं और 4 सालों से सिलाई का काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि हर घर तिरंगा अभियान से हमें बहुत बड़ा आर्थिक सहारा मिला है। मैं रोज 100 से 125 झंडे सिलती हूं। पिछले 10-12 दिनों की मेहनत से मैंने 8 से 9 हजार रुपए कमा लिए हैं। कामनी देवी कहती है कि सुबह 7 बजे तक घर का सारा खाना-पीना और काम निपटा लेती हूं और 8 बजे सिलाई सेंटर पहुंच जाती हूं। इस कमाई का उपयोग मैं अपने बच्चों की पढ़ाई, स्वास्थ्य और घर के खर्चों में करती हूं। अब हमें अपने हाथ में पैसा रहने के कारण किसी के भरोसे नहीं रहना पड़ता और न ही किसी से आस लगानी पड़ती है। 15 दिनों में 15 हजार तक की कमाई- पूजा कुमारी सिलाई केंद्र में व्यस्तता के बीच बगवाड़ा की रहने वाली पूजा कुमारी बताती हैं कि पिछले 12 से 15 दिनों से झंडा बनाने का कार्यक्रम लगातार चल रहा है। हम रोज 100 से अधिक झंडे सिल लेते हैं। इससे हमें प्रतिदिन 500 से 600 तक की कमाई आसानी से हो जाती है। अब तक 12-13 दिन का काम हो चुका है और 1-2 दिन और काम चलेगा तो कुल मिलाकर 12 हजार तक की कमाई हो जाएगी। जब से झंडे की सिलाई का काम शुरू हुआ है, हमें मन में बहुत अच्छा महसूस होता है। देश के लिए तिरंगा सिलना गर्व की बात है और इसके साथ हमारी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो रही है। पूजा के चेहरे पर अपनी मेहनत की इस कमाई की खुशी साफ झलकती है। उन्होंने मुस्कुराते हुए बताया कि रक्षाबंधन के अवसर पर वे इन पैसों का इस्तेमाल करेंगी और अपने परिवार की जरूरतों को पूरा करेंगी। 3 हजार झंडे सिल चुकी हैं तारा देवी, बच्चों की पढ़ाई में लगाएंगी पैसा सिलाई केंद्र की दूसरी ओर बैठी तारा देवी की उंगलियां भी उतनी ही तेजी से सिलाई मशीन पर चल रही हैं। वे पिछले दो से तीन हफ्तों से लगातार इस काम में जुटी हुई हैं और हजारों झंडे तैयार कर चुकी हैं। तारा देवी बताती है कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर पिछले 15 से 20 दिनों से लगातार झंडा सिल रहे हैं। इतने दिनों की मेहनत में मैंने अकेले करीब 3 हजार झंडे सिल दिए हैं। इतनी बड़ी संख्या में झंडे सिलने के पीछे तारा देवी का मुख्य उद्देश्य अपने परिवार और बच्चों का बेहतर भविष्य है। तारा देवी कहती है कि इस काम से जो पैसे हमें मिलेंगे, उससे हम अपने बच्चों को पढ़ाएंगे, उनकी स्कूल फीस और किताबों का खर्च उठाएंगे। इसके अलावा घर के अन्य जरूरी खर्चों में भी यह पैसा बहुत काम आएगा। देश के झंडे को सिलकर हमें बहुत खुशी और सुकून मिल रहा है। देशभक्ति के साथ आर्थिक क्रांति और महिला सशक्तिकरण कामिनी देवी, पूजा कुमारी और तारा देवी जैसी महिलाओं की कहानियां यह साबित करती हैं कि जब सरकारी और सामाजिक अभियानों को जमीनी स्तर पर रोजगार से जोड़ा जाता है, तो उसके परिणाम कितने सुखद होते हैं। हर घर तिरंगा अभियान ने ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्र की महिलाओं को एक ऐसा मंच दिया है, जहां वे अपनी क्षमता और हुनर का प्रदर्शन कर पा रही हैं। 90 से अधिक दीदियां सिलाई और 20 दीदियां पैकेजिंग में पचंबा यूनिट से जुड़ी निहारिका नयन ने बताया कि शुरुआत में झंडों का ऑर्डर 2 लाख का था, जो बाद में बढ़कर सवा दो लाख तक पहुंच गया। उन्होंने बताया कि सिलाई केंद्र पर रोजाना 90 से 96 दीदियां सिलाई का काम संभालती है। जबकि 20 दीदियां पैकेजिंग और डिस्पैच में लगी हुई हैं। निहारिका नयन ने केंद्र सरकार और प्रशासन का धन्यवाद करते हुए कहा कि जो दीदियां कभी अपने बच्चों की स्कूल फीस भरने या घर में दाल-सब्जी खरीदने के लिए सोचती थी, वे आज खुद कमा रही हैं। उनके चेहरे पर खुशी है क्योंकि वे अपने परिवार को आर्थिक मजबूती देकर समाज की मुख्यधारा से जुड़ रही हैं। जीविका दीदियों द्वारा तैयार किए गए एक तिरंगे झंडे पर दीदियों को 6 रुपए की आमदनी हुई है। तैयार किए गए झंडों की मांग इतनी अधिक रही कि इनकी आपूर्ति बड़े-बड़े कॉर्पोरेट व सरकारी संस्थानों को की गई। मुख्य रूप से इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL), हिंदुस्तान उर्वरक एवं रसायन लिमिटेड (HURL), नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन (NTPC), जिला प्रशासन, विभिन्न सामुदायिक संगठन सहित अन्य को आपूर्ति किया गया है। उद्यमिता और रोजगार का नया मॉडल जीविका के गैर-कृषि प्रबंधक श्याम सुन्दर भगत ने बताया कि पचंबा स्थित स्टिचिंग यूनिट और बरौनी यूनिट में जीविका दीदियों ने दिन-रात निरंतर कार्य करके समय पर आपूर्ति सुनिश्चित की। जीविका के DPM अविनाश कुमार ने कहा कि जीविका दीदियों द्वारा तैयार किए गए तिरंगे झंडों ने हर घर तिरंगा अभियान को एक नई ऊर्जा दी है। यह पहल ग्रामीण महिलाओं के लिए आय सृजन, स्थानीय स्तर पर रोजगार, महिला उद्यमिता और आर्थिक स्वावलंबन का बेहतरीन उदाहरण है। DPM ने कहा कि राष्ट्रध्वज के निर्माण से जुड़ी ये जीविका दीदियां न केवल देश के गौरव तिरंगे को घर-घर पहुंचा रही हैं। बल्कि अपने परिश्रम से अपने परिवारों के भविष्य को भी रोशन कर रही हैं। घरों पर तिरंगा लहराएगा, तो उस तिरंगे के हर एक टांके में इन महिलाओं का पसीना, उनकी मेहनत, देशभक्ति का जज्बा और आत्मनिर्भर बनने का सपना भी लहरा रहा होगा।


