Nagaur: हाउसिंग बोर्ड के मकानों में भ्रष्टाचार, लाखों रुपए की सीमेंट ‘गायब’ कर गए ठेकेदार, फाइलों में दबा घोटाला

Nagaur: हाउसिंग बोर्ड के मकानों में भ्रष्टाचार, लाखों रुपए की सीमेंट ‘गायब’ कर गए ठेकेदार, फाइलों में दबा घोटाला

नागौर। शहर की डॉ. भीमराव अम्बेडकर आवासीय योजना में बने हाउसिंग बोर्ड के मकानों में करोड़ों रुपए के निर्माण घोटाले और घटिया निर्माण के आरोपों की जांच में पुष्टि होने के बावजूद जिम्मेदार ठेकेदारों और अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई का मामला अभी तक ठंडे बस्ते में पड़ा हुआ है। इस मुद्दे को लेकर चार महीने पहले डेगाना विधायक ने विधानसभा में सवाल उठाया था, लेकिन सरकार ने आज तक जवाब नहीं दिया।

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दूसरी ओर, पुराने विवादित और घटिया मकानों के निस्तारण के बजाय हाउसिंग बोर्ड नई आवासीय योजनाओं के निर्माण में जुटा हुआ है। सूत्रों के अनुसार ताऊसर रोड स्थित हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में खाली पड़ी जमीन पर मकान बनाकर देने के नाम पर दो वर्ष पहले बोर्ड ने आवेदन लिए थे, लेकिन उस जमीन पर न्यायालय का स्थगन आदेश होने के कारण अब बालवा रोड हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में मकान बनाकर देने की तैयारी की जा रही है। आवेदकों ने इसका विरोध करने की बात कही है।

विधायक ने सवाल पूछकर मांगी थी जानकारी

डेगाना विधायक अजयसिंह किलक ने फरवरी 2026 में विधानसभा में सवाल लगाकर सरकार से पूछा था कि क्या नागौर की डॉ. भीमराव अम्बेडकर आवासीय योजना में बने मकानों के घटिया निर्माण को लेकर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) ने ठेकेदारों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की थी? यदि हां, तो जांच में कौन-कौन दोषी पाए गए और उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की गई?

साथ ही आवंटियों को राहत देने को लेकर सरकार की क्या योजना है? इस संबंध में सरकार की ओर से अब तक कोई जवाब नहीं मिला है। जबकि एसीबी में प्रकरण दर्ज होने से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के निर्देश पर कराई गई एफएसएल जांच में घटिया निर्माण की पुष्टि हो चुकी थी। इसके बावजूद बोर्ड के अधिकारी मामले को दबाए हुए हैं।

आवंटी आज भी राहत का इंतजार कर रहे

बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों ने जीवनभर की कमाई लगाकर ये मकान खरीदे, उन्हें आज तक न तो आर्थिक राहत मिली और न ही जिम्मेदारों पर कार्रवाई का कोई परिणाम दिखाई दिया। जांच रिपोर्ट, एफआईआर और तकनीकी प्रमाण मौजूद होने के बावजूद फाइलें आगे नहीं बढ़ सकीं। आरोप है कि बोर्ड अधिकारियों ने मामले को दबा दिया।

आवंटियों को राहत नहीं

एसीबी की जांच में सामने आया कि सेक्टर-1 के 60 मकानों और सेक्टर-4 के 45 मकानों में निर्धारित मात्रा से हजारों सीमेंट बैग कम उपयोग किए गए। विधि विज्ञान प्रयोगशाला जयपुर की रिपोर्ट के अनुसार दोनों सेक्टरों में कुल 5,524 सीमेंट बैग कम लगाए गए, जिनकी तत्कालीन कीमत 13.81 लाख रुपए आंकी गई थी।

जांच में यह भी सामने आया कि घटिया निर्माण के बावजूद संबंधित फर्मों को भुगतान कर दिया गया। इस मामले में तत्कालीन आवासीय अभियंता हाकमचंद पंवार, परियोजना अभियंता प्रमोद कुमार माथुर, मोजदीन कंस्ट्रक्शन कम्पनी के मालिक मोजदीन तथा बीएस कंस्ट्रक्शन कम्पनी के मालिक बलवंत सिंह सेवदा के खिलाफ 8 अक्टूबर 2014 को एसीबी ने प्रकरण दर्ज किया था।

मिश्रण अनुपात में भी भारी गड़बड़ी

सेक्टर-3 में मध्यम आय वर्ग के 54 मकानों की जांच में चिनाई कार्य में सीमेंट कम उपयोग करने का मामला सामने आया। पीसीसी कार्य में निर्धारित 1:4:8 अनुपात के बजाय 1:6:7 का मिश्रण पाया गया। विशेषज्ञों का मानना था कि इससे निर्माण की मजबूती प्रभावित हुई और भवनों की गुणवत्ता पर गंभीर असर पड़ा।

सेक्टर-2 में भी मिली अनियमितता

एक अन्य मामले में सेक्टर-2 के 68 मकानों की जांच के दौरान करणी कंस्ट्रक्शन कम्पनी की ओर से 1,128 सीमेंट बैग कम उपयोग करने की पुष्टि हुई। इसकी कीमत उस समय 2.82 लाख रुपए आंकी गई थी। इस मामले में 4 दिसंबर 2017 को एसीबी ने अलग प्रकरण दर्ज किए थे। इस संबंध में नागौर आवासीय अभियंता राज्यश्री कच्छावा से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया।

आवेदकों की चिंता

पिछले दो वर्षों से 5 लाख रुपए से अधिक राशि जमा है, लेकिन अब भी यह पता नहीं है कि मकान मिलेगा या नहीं। हाउसिंग बोर्ड को या तो राशि वापस करनी चाहिए या आवेदकों का घर का सपना पूरा करना चाहिए।

  • मनीष पारीक, आवेदक, हाउसिंग बोर्ड आवासीय योजना

मैंने नागौर में मकान लेने की उम्मीद के साथ हाउसिंग बोर्ड पर भरोसा कर योजना में 5 लाख 20 हजार रुपए जमा करवाए थे, लेकिन दो वर्षों से हमारे पैसे अटके हुए हैं। जिस जमीन पर मकान देने का सपना दिखाया गया था, वहां अभी तक निर्माण कार्य भी शुरू नहीं हुआ है। पता नहीं मकान कब बनेंगे।

  • श्रवण गहलोत, आवेदक, ताऊसर रोड हाउसिंग बोर्ड आवासीय योजना

पत्रिका व्यू

हाउसिंग बोर्ड आवासीय योजना की जांच में भ्रष्टाचार सामने आ चुका है, तो दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और यदि कार्रवाई हुई है तो उसकी जानकारी सार्वजनिक क्यों नहीं की जा रही? विधानसभा में उठे सवालों पर सरकार की चुप्पी इस पूरे मामले को और अधिक संदेहास्पद बनाती है। चंद अधिकारियों और ठेकेदारों को बचाने के लिए सैकड़ों आवंटियों के साथ अन्याय करना कहां तक उचित है? जब सरकारी एजेंसी यह मान चुकी है कि मकानों के निर्माण में निर्धारित मात्रा से कम सीमेंट का उपयोग किया गया, तो फिर आवंटियों से पूरी राशि क्यों ली गई? इस मामले में सरकार को चाहिए कि आवंटियों को आर्थिक राहत देते हुए संबंधित अधिकारियों और ठेकेदारों से वसूली की जाए, ताकि भविष्य में भ्रष्टाचार करने से पहले लोग सोचने को मजबूर हों।

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