Allahabad HC Slams UP Police: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस और नौकरशाही के कामकाज पर गहरी नाराजगी जताते हुए सख्त टिप्पणी की है। अदालत ने साफ तौर पर कहा है कि राज्य में पुलिस अधिकारियों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी व्यवस्था के प्रति हो गई है। प्रदेश की पुलिस अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए काम कर रही है। अदालत ने पुलिस की चुनिंदा कार्रवाई, एनकाउंटर और गैंगस्टर एक्ट के मनमाने इस्तेमाल पर भी गहरी चिंता जताई है।
गैंगस्टर एक्ट मामले में आया फैसला
जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने गाजियाबाद के एक परिवार के तीन सदस्यों के खिलाफ यूपी गैंगस्टर एक्ट के तहत दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करते हुए यह 31 पेज का ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने पाया कि एक व्यावसायिक विवाद में इस सख्त कानून का गलत इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट ने 35 वर्षीय घरेलू महिला ललिता त्यागी की गिरफ्तारी पर भी पुलिस को कड़ी फटकार लगाई, जिसे बिना किसी पुख्ता सबूत के एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया था।
संविधान नहीं सत्ता के वफादार हैं अफसर
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि अधिकारियों की वफादारी संविधान के प्रति नहीं बल्कि, सत्ताधारी दल की तरफ नजर आती है। ट्रांसफर और पोस्टिंग के अर्थशास्त्र को अच्छी तरह समझने वाले फील्ड अफसर केवल अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने के लिए अपने आचरण में बदलाव करते हैं। कोर्ट ने कहा कि यूपी ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक आधिपत्य का केंद्र रहा है जो, राजनेताओं और नौकरशाहों की सामंती सोच से संचालित होता है।
एनकाउंटर और चुनिंदा कार्रवाई पर उठे सवाल
अदालत ने पुलिस की पूरी व्यवस्था पर सख्त टिप्पणी करते हुए सिस्टम पर गंभीर सवाल उठाए हैं। जस्टिस दिवाकर ने कहा कि पुलिस एनकाउंटर, चुनिंदा लोगों पर कार्रवाई और असुविधाजनक व्यक्तियों के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के मनमाने इस्तेमाल जैसे मामले समय-समय पर न्यायपालिका के सामने आते रहे हैं।
अधिकारियों का एक बड़ा वर्ग कानून के शासन को अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी मानने के बजाय काम-काज में आने वाली एक रुकावट मानता है। बिना सही प्रक्रिया अपनाए मनमानी गिरफ्तारियां की जाती हैं और गलत इरादों के साथ एफआईआर दर्ज की जाती हैं या उन्हें जानबूझकर दबा दिया जाता है।
वफादारों को मिलती है मलाईदार पोस्टिंग
हाईकोर्ट ने फैसले में इस बात पर भी जोर दिया कि सरकार के प्रति वफादार माने जाने वाले अफसरों को शहरी कमिश्नरेट और जिलों में मलाईदार पोस्टिंग देकर इनाम दिया जाता है। वहीं, जो अधिकारी स्वतंत्र रूप से काम करने की कोशिश करते हैं उनका महत्वहीन जगहों पर ट्रांसफर कर उन्हें सजा दी जाती है। कोर्ट ने कहा कि यह एक सर्वविदित तथ्य है।
सिर्फ कागजों में होता है आदेशों का पालन
हाई कोर्ट की बेंच ने सख्त लहजे में कहा कि क्रिमिनल प्रोसीजर कोड और अब नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत मिलने वाले कानूनी अधिकारों को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इसके साथ ही जस्टिस दिवाकर ने राज्य के गृह सचिव की भूमिका पर भी चिंता व्यक्त की।
कोर्ट ने कहा कि, स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकारी के रूप में काम करने और निष्पक्ष कार्रवाई करने के बजाय कुछ अधिकारी अपने स्वार्थों की पूर्ति का जरिया बन गए हैं। पुलिस अधिकारी अदालती आदेशों का पालन सिर्फ कागजों और दिखावे के लिए करते हैं लेकिन असल में उनके मूल मकसद को पूरा नहीं होने दिया जाता।
सुप्रीम कोर्ट में भी चल रहा है मामला
आपको बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ये गंभीर टिप्पणियां उत्तर प्रदेश गैंगस्टर्स और असामाजिक गतिविधियां रोकथाम अधिनियम 1986 से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की हैं। इस कानून के तहत आरोपी बनाए गए एक व्यक्ति की याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पुलिस शक्तियों के दुरुपयोग पर संज्ञान लिया। चूंकि सुप्रीम कोर्ट भी इस अधिनियम से जुड़े मुद्दों पर विचार कर रहा है इसलिए जस्टिस दिवाकर ने फिलहाल इस पर अंतिम फैसला सुनाने से परहेज किया है, लेकिन यूपी पुलिस की तमाम खामियों को उजागर कर दिया।


