महाराष्ट्र की महायुति सरकार और ऑटो-टैक्सी यूनियनों के बीच मराठी अनिवार्यता को लेकर टकराव बढ़ता जा रहा है। सरकार के उस प्रस्तावित फैसले ने हड़कंप मचा दिया है, जिसके तहत 2 मई से मराठी न जानने वाले टैक्सी और ऑटो चालकों के लाइसेंस रद्द करने की बात कही गई है। इस नियम के खिलाफ रिक्शा-टैक्सी यूनियनों ने हुंकार भरते हुए इसे पूरी तरह से अन्यायपूर्ण और गैर-कानूनी करार दिया है। साथ ही 4 मई से बड़े आंदोलन की चेतावनी भी दी है।
परिवहन मंत्री के साथ अहम बैठक
राज्य के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक ने इस मुद्दे पर चर्चा के लिए यूनियन नेता शशांक राव, शिवसेना (शिंदे गुट) नेता संजय निरुपम और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधियों की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई है। सोमवार को दोपहर साढ़े 12 बजे मंत्रालय में होने वाली इस बैठक में सरकार अपना पक्ष रखेगी। सरकार का मुख्य तर्क है कि सार्वजनिक परिवहन में यात्रियों के साथ बेहतर संवाद के लिए चालकों को बुनियादी मराठी आनी ही चाहिए। बैठक में इस बात पर भी चर्चा होगी कि गैर-मराठी चालकों को भाषा सिखाने के लिए सरकार क्या प्रयास कर सकती है।
शशांक राव का पलटवार: गोरेगांव में जुटेगी चालकों की भीड़
मुंबई ऑटोरिक्शा-टैक्सीमेन्स यूनियन के नेता शशांक राव ने सरकार के रुख का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने मांग की है कि लाइसेंस रद्द करने जैसा सख्त फैसला तुरंत वापस लिया जाए। अपनी अगली रणनीति तय करने के लिए यूनियन ने सोमवार को ही गोरेगांव के केशव गोरे स्मारक ट्रस्ट हॉल में एक बड़ी सभा बुलाई है। शशांक राव ने मुंबई के सभी चालकों से इस सभा में शामिल होने का आह्वान किया है, जिससे शहर की परिवहन व्यवस्था पर बड़ा असर पड़ सकता है।
राज्य सरकार ने क्या कहा?
परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के अनुसार, यह निर्णय केवल भाषा सीखाने के लिए नहीं है, बल्कि सार्वजनिक परिवहन सेवा की गुणवत्ता सुधारने का भी एक प्रयास है। महाराष्ट्र की राजभाषा मराठी है। लाखों यात्रियों और चालकों के बीच स्पष्ट संवाद होना जरूरी है। अक्सर देखा गया है कि भाषा की समझ न होने के कारण यात्रियों और चालकों के बीच विवाद, गलतफहमी होती है, जिस वजह से शिकायतें बढ़ती हैं। सरकार का मानना है कि ओला-उबर जैसी ऐप-आधारित सेवाओं और पारंपरिक ऑटो-टैक्सी चालकों को कम से कम व्यावहारिक मराठी आना अनिवार्य है।
क्या है विवाद की जड़?
बता दें कि महाराष्ट्र सरकार ने 1 मई से राज्य में सभी लाइसेंस प्राप्त ऑटोरिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी भाषा का ज्ञान अनिवार्य किया है। इसके तहत चालकों को मराठी पढ़ना, लिखना और बोलना आना चाहिए। आदेश है कि अगर कोई चालक इस भाषा में बुनियादी दक्षता नहीं दिखा पाता, तो उसके लाइसेंस को रद्द कर दिया जाएगा। इसके लिए आरटीओ (RTO) अधिकारी सड़कों पर उतरकर ड्राइवरों की मराठी जांचेंगे।
इसको लेकर यूनियन का आरोप है कि मराठी लिखने-पढ़ने की शर्त रखकर हजारों चालकों के रोजगार को संकट में डालने की कोशिश की जा रही है। इससे ओला-उबर जैसी निजी कंपनियों को फायदा होगा।
यूनियन नेता शशांक राव के मुताबिक, पूरे महाराष्ट्र में करीब 15 लाख ऑटो चालक इस आंदोलन में शामिल होंगे। इनमें से लगभग 5 लाख चालक मुंबई महानगर क्षेत्र (MMR) के हैं। अकेले मुंबई में ही लगभग 2.8 लाख ऑटो हैं।
शशांक राव ने यह भी कहा कि राज्य में बड़ी संख्या में चालक दूसरे राज्यों से हैं और उन्हें अचानक नई भाषा सीखने के लिए बाध्य करना उनके रोजगार पर असर डाल सकता है। इसलिए सरकार को इस नियम को लागू करने से पहले पर्याप्त समय और प्रशिक्षण देने की व्यवस्था करनी चाहिए।


