65 अस्पतालों के पास प्रदूषण बोर्ड की अनुमति नहीं:धड़ल्ले से चल रहे क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में रजिस्टर्ड

65 अस्पतालों के पास प्रदूषण बोर्ड की अनुमति नहीं:धड़ल्ले से चल रहे क्योंकि स्वास्थ्य विभाग में रजिस्टर्ड

जिले में ऐसे 65 अस्पताल हैं, जिनके पास मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति (प्राधिकार) नहीं है। फिर भी धड़ल्ले से चल रहे हैं क्योंकि इन सभी ने स्वास्थ्य विभाग में पंजीयन करा रखा है। नियमानुसार, बिना प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की अनुमति के अस्पताल का संचालन नहीं हो सकता, लेकिन ग्वालियर में यह आम बात है। चौकाने वाली बात ये है कि नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के ग्वालियर से ऐसे अस्पतालों की सूची मांगी है। जो स्वास्थ्य विभाग में दर्ज हैं, लेकिन बोर्ड से अनुमति नहीं हैं। 2 माह बाद भी बोर्ड, एनजीटी में यह जानकारी नहीं दे सका है। बोर्ड ने एनजीटी में यह जवाब दिया है कि स्वास्थ्य विभाग से जानकारी मिल ही नहीं रही। एनजीटी को देंगे जानकारी
अस्पताल संचालन के लिए प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति जरूरी है। बोर्ड ने सीएमएचओ कार्यालय को ऐसे अस्पतालों की सूची दी है, जिनके पंजीयन रद्द होने चाहिए। कार्रवाई नहीं की तो एनजीटी को जानकारी देंगे। -दुरविजय सिंह जाटव, क्षेत्रीय अधिकारी, मप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड सबको नोटिस दे दिया है
ऐसे तमाम अस्पताल जिनके पास प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनुमति नहीं है उन्हें नोटिस दे दिया है। एक महीने में यदि बोर्ड से अनुमति नहीं ली तो सभी अस्पतालों के लाइसेंस को रद्द कर दिया जाएगा।
-डॉ. सचिन श्रीवास्तव, सीएमएचओ ग्वालियर एक्सपर्ट – डॉ. सुदेश वाघमारे, पर्यावरण विशेषज्ञ
इंसीनरेटर के बिना निपटान, संक्रमण फैलने का खतरा
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से प्रत्येक अस्पताल को अनिवार्य रूप से प्राधिकार लेना ही चाहिए। इसका प्रमुख कारण ये है कि बॉयोमेडिकल वेस्ट जैसे सिरिंज,इंजेक्शन आदि को निष्पादित (इंसीनरेटर में) करने की प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए-टीबी के कीटाणु 2 साल जीवित रहते हैं। जब तक इन्हें इंसीनरेटर से भस्म नहीं किया जाता। तब तक ये संक्रमण फैलाएंगे। बोर्ड को चाहिए कि पर्यावरण संरक्षण अधिनियम-1984 के अंतर्गत कार्रवाई करे। यही नहीं, कलेक्टर को प्रतिवेदन दें ताकि वे कार्रवाई करें

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