कानपुर किडनी रैकेट में 18 दिन बाद भी 6 सवाल:डॉक्टर दंपत्ति समेत 11 जेल में, 50 अवैध ट्रांसप्लांट; पर्दे के पीछे का पता नहीं

कानपुर किडनी रैकेट में 18 दिन बाद भी 6 सवाल:डॉक्टर दंपत्ति समेत 11 जेल में, 50 अवैध ट्रांसप्लांट; पर्दे के पीछे का पता नहीं

कानपुर में 29 मार्च की देर रात सामने आए किडनी रैकेट के खुलासे के बाद अब तक डॉक्टर दंपत्ति समेत 11 आरोपी जेल जा चुके हैं। 18 दिन बाद भी पुलिस कई अहम सवालों की गुत्थी नहीं सुलझा सकी है। जांच में सामने आया कि कानपुर में 50 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किए गए। फिलहाल पुलिस केवल बेगूसराय निवासी आयुष और मुजफ्फरनगर की पारूल तोमर तक ही पहुंच सकी है। अन्य डोनर और रिसीवर का अभी तक कोई पता नहीं चल पाया है। बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों के सर्जरी कैसे हुई, ग्रेजुएट ओटी टेक्नीशियन ऑपरेशन कैसे कर रहा था और 12वीं पास व्यक्ति एनेस्थीसिया विशेषज्ञ बनकर गिरोह कैसे चला रहा था। इसके अलावा आहूजा हॉस्पिटल, मेड केयर हॉस्पिटल, प्रिया हॉस्पिटल और मेडी लाइफ हॉस्पिटल समेत किन-किन अस्पतालों की भूमिका रही। जानिए क्या हैं वो 6 सवाल ? रडार में आए सात अस्पतालों पर कार्रवाई हुई?
किडनी रैकेट के खुलासे के दौरान पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने 30 मार्च को बताया था कि आहूजा हॉस्पिटल, मेड केयर हॉस्पिटल और प्रिया हॉस्पिटल की संलिप्तता सामने आई है। उन्होंने यह भी कहा था कि कानपुर में 50 से अधिक अवैध किडनी ट्रांसप्लांट किए गए, जिनमें से सात केवल आहूजा हॉस्पिटल में हुए थे। पुलिस कमिश्नर ने यह भी आशंका जताई थी कि शहर के सात और अस्पताल सिंडिकेट के रडार पर हैं। हालांकि, दहशत न फैले इसलिए उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए गए थे। जांच आगे बढ़ने पर गाजियाबाद के दो, मेरठ और लखनऊ के एक-एक अस्पतालों के नाम भी सामने आए थे। लेकिन रडार में आए इन अस्पतालों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, यह स्पष्ट नहीं हो सका है। यदि जांच में दोष नहीं मिला तो क्या उन्हें क्लीनचिट दे दी गई। यह भी अब तक सामने नहीं आया है। बिना डॉक्टरों के सर्जरी कैसे संभव?
पुलिस की जांच में अवैध किडनी ट्रांसप्लांट कराने में किसी भी सर्जन डॉक्टर के शामिल न होने की बात सामने आई। गिरोह का सरगना डॉ. रोहित, जो 12वीं पास है, एनेस्थीसिया देता था। डॉ. वैभव मुदगल डेंटिस्ट है, डॉ. अफजल फिजीशियन है, जबकि डॉ. अनुराग उर्फ अमित अल्फा हॉस्पिटल का संचालक है। 30 से ज्यादा किडनी ट्रांसप्लांट कराने वाला डॉ. अली ओटी टेक्नीशियन बताया गया है। ट्रांसप्लांट के बाद रिसीपिएंट पारूल तोमर और डोनर आयुष कुमार को शुरुआती दौर में हैलट और फिर लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उन्हें डॉक्टरों की सघन निगरानी में रखा गया और वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए। पूरे ट्रांसप्लांट को जिस सधे तरीके से किया गया था, उसे देखकर डॉक्टर भी हैरान थे। जीएसवीएम और राम मनोहर लोहिया के डॉक्टरों का भी मानना था कि जिस तरह से ट्रांसप्लांट किया गया है, वह किसी सर्जन के अलावा कोई नहीं कर सकता। पुलिस ने जब गिरोह से जुड़े लूट और डकैती के आरोपी परवेज सैफी को गिरफ्तार किया, तो उसने बताया कि पारूल के ट्रांसप्लांट में डॉ. रोहित की टीम के साथ लखनऊ के तीन डॉक्टर भी आए थे। कुल 12 लोगों का स्टाफ था। इसमें डॉ. अली, ओटी टेक्नीशियन राजेश कुमार, कुलदीप सिंह जाधव, अफजल समेत तीन अन्य लोग ऑपरेशन थिएटर में मौजूद थे, जबकि डॉ. रोहित समय-समय पर ओटी में आता-जाता रहा। परवेज द्वारा पुलिस को जानकारी देने के बावजूद अब तक पुलिस उन तीन डॉक्टरों तक नहीं पहुंच सकी है, जो पारूल के ट्रांसप्लांट के लिए लखनऊ से कानपुर आए थे। साउथ अफ्रीकन महिला अरेबिका का नहीं मिला सुराग
पूछताछ में आरोपियों ने पुलिस को बताया था कि पारूल के ट्रांसप्लांट से पहले 3 मार्च को साउथ अफ्रीकी महिला अरेबिका का भी ट्रांसप्लांट आहूजा हॉस्पिटल में कराया गया था। कानपुर में पूरे रैकेट के किंगपिन एजेंट शिवम अग्रवाल का जब पुलिस ने मोबाइल खंगाला, तो उसमें साउथ अफ्रीकी महिला का इलाज करते हुए शिवम का वीडियो समेत कई अहम साक्ष्य पुलिस के हाथ लगे। एंबेसी तक पहुंची जांच, फिर भी नहीं मिला सुराग
पुलिस ने अरेबिका के बारे में जानकारी के लिए शिवम से जेल में पूछताछ की। उसने बताया कि डॉ. रोहित ने उसे कानपुर भेजा था। जब रोहित से अरेबिका के बारे में पूछताछ की गई तो उसने डॉ. वैभव का नाम लिया। अरेबिका भारत कैसे पहुंची? वह गिरोह के संपर्क में कैसे आई? वह किस वीजा पर भारत आई थी? यदि मेडिकल वीजा पर आई थी तो उसका अटेंडेंट कौन था?
इन सवालों के जवाब जानने के लिए पुलिस एंबेसी तक संपर्क कर चुकी है, लेकिन अब तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। बताया गया कि मेडीलाइफ हॉस्पिटल में ट्रांसप्लांट के बाद तबीयत बिगड़ने पर उसे दिल्ली के मैक्स अस्पताल भेजा गया, जहां पहुंचने पर उसकी मौत हो गई थी। एजेंटों की बातचीत की रिकॉर्डिंग भी मिली
इस पूरे प्रकरण में कानपुर के एजेंट शिवम और दिल्ली-एनसीआर के एजेंट नवीन के बीच फोन पर बातचीत की रिकॉर्डिंग भी पुलिस के हाथ लगी है। इसके बावजूद उस महिला के बारे में अब तक कोई ठोस जानकारी नहीं मिल सकी है। 48 लाख की ठगी, अब तक दर्ज नहीं हुई एफआईआर
पंजाब के अमृतसर स्थित तरनतारन गांव निवासी मंजिंदर सिंह ने बताया था कि वह डायलिसिस पर हैं और उन्हें किडनी की जरूरत थी। गिरोह के सदस्यों ने किडनी दिलाने के नाम पर उनसे 48 लाख रुपये वसूल लिए, लेकिन उन्हें किडनी नहीं मिली। मंजिंदर के अनुसार जसप्रीत सिंह, विक्रांत, हसन और मोहाली का नवनीत सिंह ठगी में शामिल थे। ठगी के बाद उनके सिर पर लाखों रुपये का कर्ज हो गया है। यह वीडियो पुलिस को कानपुर के एजेंट शिवम अग्रवाल के मोबाइल में मिला था। डीसीपी एसएम कासिम आबिदी ने बताया था कि गोपाल नाम के एजेंट ने मंजिंदर सिंह से किडनी ट्रांसप्लांट के नाम पर 48 लाख रुपये लिए थे, लेकिन डोनर न मिलने के कारण ट्रांसप्लांट नहीं हो सका और गिरोह ने रकम हड़प ली। इसके बावजूद अब तक पीड़ित की ओर से कोई एफआईआर दर्ज नहीं की गई है। डोनर-रेसिपिएंट तक नहीं पहुंच सकी पुलिस
कानपुर में 50 से अधिक लोगों के किडनी ट्रांसप्लांट का पुलिस दावा कर रही है, जिनमें से सात आहूजा हॉस्पिटल में कराए जाने की बात सामने आई है। हालांकि अब तक एक भी डोनर और रेसिपिएंट पुलिस के हाथ नहीं लगा है। वे किस राज्य के रहने वाले थे, किसके संपर्क में आए, ट्रांसप्लांट के लिए कितनी रकम ली गई और ऑपरेशन सफल रहा या नहीं—ये सभी सवाल अब तक अनसुलझे हैं। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक एजेंट शिवम ट्रांसप्लांट से पहले डोनर और रेसिपिएंट का वीडियो बनाकर रखता था। शिवम के मोबाइल की जांच में कुछ ऐसे फोल्डर भी मिले, जिन पर पैटर्न लॉक लगा था। जेल में पूछताछ के दौरान उसने पैटर्न लॉक बताने से आनाकानी की। माना जा रहा है कि लॉक खुलने पर कई अहम सुराग मिल सकते हैं। किंगपिन शिवम की अब तक नहीं ली गई पीसीआर
पुलिस कमिश्नर रघुबीर लाल ने घटना के पहले दिन शिवम को कानपुर का किंगपिन बताया था। जांच में भी अधिकांश कड़ियां उसी से जुड़ती मिलीं। विवेचक ने जेल में उससे करीब दो घंटे पूछताछ की, लेकिन उसने अधिकांश सवालों के जवाब नहीं दिए। कानपुर में किन-किन अस्पतालों में शिवम ट्रांसप्लांट कराता था? अरेबिका को किसने कानपुर भेजा? ट्रांसप्लांट के दौरान डोनर और रेसिपिएंट को कहां रखा जाता था? मैक्स अस्पताल में दम तोड़ने वाली महिला कौन थी? ऐसे कई सवालों के जवाब के लिए पुलिस को शिवम और डॉ. रोहित की पुलिस कस्टडी रिमांड (पीसीआर) लेनी थी, लेकिन अब तक इसके लिए आवेदन नहीं किया गया है।

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