West Bengal Election 2026: ममता के लिए सबसे मुश्किल चुनाव क्यों? 5 कारण

West Bengal Election 2026: ममता के लिए सबसे मुश्किल चुनाव क्यों? 5 कारण

Paschim Bengal Chunav: टीएमसी ने पहली बार 38 फीसदी वोट लाकर सरकार बनाई थी, बीजेपी पिछले चुनाव में इस आंकड़े तक पहुँच गई थी। 

ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन छठे दशक की ओर बढ़ रहा है। वह शुरू से जुझारू प्रवृत्ति की नेता रही हैं, लेकिन 2026 के पश्चिम बंगाल चुनाव में उन्हें जितना जूझना पड़ रहा है, उतना शायद ही कभी जूझना पड़ा हो। पश्चिम बंगाल में चौथी बार सरकार बनाने के लिए चुनाव मैदान में उतरीं ममता अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़ रही हैं।

20 गुना वोट बढ़ा चुकी बीजेपी दे रही है सबसे कड़ी टक्कर

2011 में जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पहली बार पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई तो ममता ने राज्य में करीब साढ़े तीन दशक पुराना वामपंथ का किला ढहाया था। उसके बाद के चुनावों में वामपंथ और कांग्रेस की ताकत लगातार कम होती गई। लेकिन, भाजपा के रूप में नया विरोधी सामने आया और उसकी ताकत बढ़ती ही गई।

2019 के लोक सभा चुनाव में भाजपा ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटों पर कब्जा कर लिया था। उसकी सीटें टीएमसी से केवल चार कम थीं। 2021 के विधान सभा चुनाव में टीएमसी ने 215 तो भाजपा ने 77 सीटें जीती थीं।

2024 के लोक सभा चुनाव में ममता ने अपनी सीटें तो 22 से 29 कर लीं, लेकिन भाजपा ने कई ऐसी सीटों पर उसे मात दी जो टीएमसी की गढ़ मानी जाती थीं। हालांकि, उसकी सीटें 12 ही रह गईं। लेकिन, विधान सभा चुनाव में बीजेपी लगातार मजबूत ही हो रही है। ऐसे में ममता को विधान सभा चुनाव में अपना गढ़ बचाए रखने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव : 15 साल में 20 गुना बढ़ा बीजेपी का वोट शेयर

चुनाव वर्ष कुल सीटें भाजपा द्वारा जीती गई सीटें वोट शेयर (%)
2006 294 0 1.93%
2011 294 0 4.06%
2016 294 3 10.16%
2021 294 77 38.14%

टीएमसी ने जितना वोट शेयर लेकर पहली बार सरकार बनाई थी, उतना वोट शेयर बीजेपी ने पिछली बार हासिल कर लिया था। 2016 की तुलना में 2021 में बीजेपी का वोट शेयर 28 फीसदी बढ़ा था। इस बार अगर इसका आधा भी बढ़ गया और वोट सीटों में भी तब्दील हुए तो ममता के लिए मुसीबत हो सकती है।

चुनाव वर्ष कुल सीटें टीएमसी द्वारा जीती गई सीटें वोट शेयर (%) मुख्य गठबंधन / स्थिति
2001 294 60 30.66% कांग्रेस के साथ गठबंधन (विपक्ष में)
2006 294 30 26.64% अकेले चुनाव (विपक्ष में, भारी गिरावट)
2011 294 184 38.93% कांग्रेस के साथ गठबंधन (सत्ता में आगमन)
2016 294 211 44.91% अकेले चुनाव (दूसरी बार पूर्ण बहुमत)
2021 294 215 48.02% अकेले चुनाव (तीसरी बार प्रचंड बहुमत)

15 साल की सत्ता और भ्रष्टाचार

ममता बनर्जी 15 साल से सत्ता में हैं। यह अपने आप में एक चुनौती है। सत्ता विरोधी लहर को बेअसर करने के लिए उन्हें खूब पापड़ बेलने पड़ रहे हैं।

इन वर्षों में तृणमूल के अनेक नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। शिक्षक भर्ती घोटाला, राशन घोटाला, कोयला तस्करी, पशुओं की तस्करी जैसे कई मामलों में तृणमूल के बड़े नेताओं पर आरोप लगे हैं। ममता सरकार के आधार दर्जन से ज्यादा मंत्रियों पर सीबीआई, ईडी, इनकम टैक्स जैसे विभागों का शिकंजा कसा हुआ है। कई मंत्रियों की गिरफ्तारी तक हो चुकी है।

नाम पहचान काम मुख्य आरोप केस की वर्तमान स्थिति (अप्रैल 2026)
पार्थ चटर्जी पूर्व महासचिव, टीएमसी शिक्षा, उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री शिक्षक भर्ती घोटाला (SSC): नियुक्तियों में धांधली और करोड़ों रुपये का कैश बरामद होना। नवंबर 2025 में सशर्त जमानत पर रिहा। अप्रैल 2026 में ED ने फिर से उनके घर की तलाशी ली है।
अनुब्रत मंडल जिला अध्यक्ष, बीरभूम टीएमसी के प्रभावशाली ‘छत्रप’ मवेशी तस्करी घोटाला: भारत-बांग्लादेश सीमा पर मवेशियों की अवैध तस्करी का मुख्य सूत्रधार होना। जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली। वर्तमान में बीरभूम में सक्रिय, जाँच जारी है।
ज्योतिप्रिय मल्लिक पूर्व कैबिनेट मंत्री खाद्य एवं आपूर्ति विभाग राशन वितरण घोटाला: सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) के अनाज को खुले बाजार में बेचने का आरोप। जनवरी 2025 में कोर्ट से जमानत मिली। जाँच एजेंसी (ED) की कार्रवाई अभी भी जारी है।
माणिक भट्टाचार्य विधायक, पलाशीपाड़ा पूर्व अध्यक्ष, प्राथमिक शिक्षा बोर्ड शिक्षक भर्ती घोटाला: प्राथमिक शिक्षकों की भर्ती में अनियमितता और रिश्वतखोरी। न्यायिक हिरासत/जेल में (लंबे समय से कानूनी लड़ाई जारी)। 2026 में टिकट कटा।
जीवन कृष्ण साहा सक्रिय नेता, मुर्शिदाबाद विधायक, बुरवान शिक्षक भर्ती घोटाला: भर्ती प्रक्रिया में दलाली और सबूत मिटाने के आरोप। केंद्रीय एजेंसियों के रडार पर, कानूनी कार्रवाई प्रक्रियाधीन है।
शंकर आद्या प्रभावशाली स्थानीय नेता प्रपूर्व चेयरमैन, बनगांव नगर पालिका राशन वितरण घोटाला: राशन घोटाले के पैसे को विदेशी मुद्रा में बदलने का आरोप। अगस्त 2024 में जमानत मिली। ED मामले की गहराई से जांच कर रही है।
अभिषेक बनर्जी राष्ट्रीय महासचिव सांसद, डायमंड हार्बर कोयला और मवेशी तस्करी: एजेंसियों ने इन घोटालों के संदर्भ में उनसे पूछताछ की है। अदालती संरक्षण प्राप्त है, लेकिन एजेंसियां समय-समय पर पूछताछ के लिए समन जारी करती हैं।

SIR का असर

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Incentive Revision – SIR) किया है। इसके बाद बड़ी संख्या में वोटर कम हुए हैं। करीब 34 लाख मतदाताओं की अपील ट्रिब्यूनल के पास पड़ी है। 23 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के दिन तक इनमें से 139 को ही वोट देने का हक मिल सका।

वोटर लिस्ट से बाहर हुए मतदाताओं में बड़ी संख्या में मुसलमान हैं और तृणमूल की जीती हुई सीटों के हैं। वे आम तौर पर सत्ताधारी टीएमसी को ही वोट किया करते थे।

मतदाता कम होने की चुनौती ममता बनर्जी के सामने पहली बार आई है। इस नए मोर्चे पर उन्हें अलग से लगातार लड़ाई लड़नी पड़ रही है। न केवल जमीन पर, बल्कि चुनाव आयोग और कोर्ट तक में वह लड़ रही हैं।

विवरण SIR से पहले (अक्टूबर 2025) SIR के बाद (अप्रैल 2026) कमी
कुल मतदाता संख्या 7.66 करोड़ 6.75 करोड़ 91 लाख (~12%)
महिला मतदाता ~3.73 करोड़ (अनुमानित) ~3.11 करोड़ ~61.9 लाख
लिंगानुपात (Electoral) ~973 ~961 -12 अंक

हालांकि, तृणमूल का एक खेमा SIR को एक लिहाज से फायदेमंद भी मानता है। उन्हें ऐसा लगता है कि यह मुद्दा इतना गरम हो गया है कि भ्रष्टाचार का मुद्दा शायद थोड़ा ठंडा पड़ जाए। उनका यह भी मानना है कि ममता बनर्जी ने जिस तरह SIR के खिलाफ लड़ाई लड़ी है और इसे वोट का हक खत्म किए जाने के खिलाफ जनता के हक में लड़ी गई लड़ाई बताया है, उससे टीएमसी को फायदा मिलेगा। इन लोगों का मानना है कि जिन लोगों का नाम वोटर लिस्ट से हटा है, उनके परिवार वाले बीजेपी को कभी वोट नहीं देंगे।

बीजेपी का आक्रामक चुनाव प्रचार

बीजेपी ने मुसलमानों के खिलाफ आक्रामक प्रचार किया है। बीजेपी का साफ आंकलन है कि उसे मुसलमानों का वोट न मिलता है और न मिलेगा, लेकिन हिंदुओं का एकमुश्त वोट मिल जाए तो सरकार भी बन सकती है।

पिछले दो विधान सभा चुनावों में टीएमसी ने आधी से ज्यादा मुस्लिम बहुल सीटें जीती थीं। 2006 और 2011 में बीजेपी को ऐसी एक भी सीट नहीं मिली थी। 2016 में बस एक मिली थी।

मुसलमानों की आबादी करीब 30 फीसदी है। वे 2011 से टीएमसी को ही वोट देते आ रहे हैं। इस बार इस वोट बैंक को अपने पक्ष में एकजुट बनाए रखना तृणमूल के लिए बड़ी चुनौती होगी।

राज्य की करीब 70 फीसदी विधान सभा सीटें उन जिलों में पड़ती हैं, जहां मुस्लिम आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है। करीब 17 फीसदी विधान सभा क्षेत्रों में मुस्लिम जनसंख्या 40 प्रतिशत से भी ज्यादा है।

भवानीपुर की चुनौती

भवानीपुर ममता बनर्जी की सीट है। यहां से भाजपा के सुवेन्दु अधिकारी मैदान में हैं। अधिकारी पिछली बार ममता को नंदीग्राम में हरा चुके हैं। भवानीपुर से ममता 58,800 वोट के मार्जिन से जीती थीं, लेकिन इस बार 51000 वोटर (21 प्रतिशत) मतदाता सूची से बाहर हो गए हैं। इसलिए ममता बनर्जी को इस सीट पर भी विशेष ध्यान देना पड़ रहा है।

Bhabanipore Mamta Seat Result

  

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