औरंगाबाद में आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल की गई है। इसी कड़ी में सुरभि दुर्गा पूजा समिति, नबीनगर रोड अंबा की ओर से करीब 40 वर्षों बाद रावण वध नाटक का मंचन किया गया। नई पीढ़ी के कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से रामायण के प्रसंगों को जीवंत कर दिया। नाटक देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक जुटे। कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों को इस कदर आकर्षित किया कि लोग देर रात तक मंचन का आनंद लेते रहे।नाटक का मंच-उद्घाटन अंबा थानाध्यक्ष पवन कुमार ने किया। कार्यक्रम का संचालन विनय कुमार गुप्ता ने किया। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष सुनील सिंह के अलावा प्रवीण कुमार, सत्येंद्र आजाद, मुकेश कुमार, सोनल पांडेय और बिगन शर्मा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। आयोजन के दौरान कलाकारों का उत्साह बढ़ाने के लिए दर्शकों की भीड़ जुटी रही। दो घंटे तक मंच पर जीवंत रही रामायण की कथा करीब दो घंटे तक चले रावण वध नाटक में कलाकारों ने अपने अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं से रामायण के प्रमुख प्रसंगों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। मंचन के दौरान कलाकारों ने पात्रों के अनुरूप अभिनय कर दर्शकों को कथा से जोड़े रखा। नाटक की प्रस्तुति में भगवान श्रीराम की कथा के साथ अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश भी उभरकर सामने आया। हनुमान की भूमिका में अजीत पांडेय ने अपने अभिनय से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया, जबकि इंद्रदेव की भूमिका में श्रवण सोनी ने भी अपनी प्रस्तुति से सराहना बटोरी। कलाकारों के अभिनय पर दर्शकों ने तालियां बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया। नई पीढ़ी ने दिखाई परंपरा को आगे बढ़ाने की राह करीब चार दशक बाद रावण वध नाटक का मंचन क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपरा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस पहल के माध्यम से नई पीढ़ी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि पारंपरिक नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को जीवंत रखने का प्रभावी माध्यम भी हैं। आयोजन से जुड़े लोगों का उद्देश्य पुरानी नाट्य परंपरा को फिर से स्थापित करना और युवाओं को लोक संस्कृति से जोड़ना रहा। दर्शकों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने इस प्रयास को नई ऊर्जा दी। सुरभि दुर्गा पूजा समिति की इस पहल से क्षेत्र में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने और आने वाले वर्षों में पारंपरिक नाटकों के मंचन की परंपरा मजबूत होने की उम्मीद जगी है। औरंगाबाद में आधुनिक मनोरंजन के बढ़ते प्रभाव के बीच अपनी सांस्कृतिक विरासत को सहेजने और पुरानी परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की पहल की गई है। इसी कड़ी में सुरभि दुर्गा पूजा समिति, नबीनगर रोड अंबा की ओर से करीब 40 वर्षों बाद रावण वध नाटक का मंचन किया गया। नई पीढ़ी के कलाकारों ने अपने अभिनय के माध्यम से रामायण के प्रसंगों को जीवंत कर दिया। नाटक देखने के लिए बड़ी संख्या में दर्शक जुटे। कलाकारों की प्रस्तुति ने दर्शकों को इस कदर आकर्षित किया कि लोग देर रात तक मंचन का आनंद लेते रहे।नाटक का मंच-उद्घाटन अंबा थानाध्यक्ष पवन कुमार ने किया। कार्यक्रम का संचालन विनय कुमार गुप्ता ने किया। इस अवसर पर समिति के अध्यक्ष सुनील सिंह के अलावा प्रवीण कुमार, सत्येंद्र आजाद, मुकेश कुमार, सोनल पांडेय और बिगन शर्मा सहित कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। आयोजन के दौरान कलाकारों का उत्साह बढ़ाने के लिए दर्शकों की भीड़ जुटी रही। दो घंटे तक मंच पर जीवंत रही रामायण की कथा करीब दो घंटे तक चले रावण वध नाटक में कलाकारों ने अपने अभिनय, संवाद और भाव-भंगिमाओं से रामायण के प्रमुख प्रसंगों को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। मंचन के दौरान कलाकारों ने पात्रों के अनुरूप अभिनय कर दर्शकों को कथा से जोड़े रखा। नाटक की प्रस्तुति में भगवान श्रीराम की कथा के साथ अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश भी उभरकर सामने आया। हनुमान की भूमिका में अजीत पांडेय ने अपने अभिनय से दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया, जबकि इंद्रदेव की भूमिका में श्रवण सोनी ने भी अपनी प्रस्तुति से सराहना बटोरी। कलाकारों के अभिनय पर दर्शकों ने तालियां बजाकर उनका उत्साहवर्धन किया। नई पीढ़ी ने दिखाई परंपरा को आगे बढ़ाने की राह करीब चार दशक बाद रावण वध नाटक का मंचन क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपरा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस पहल के माध्यम से नई पीढ़ी ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि पारंपरिक नाटक केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक परंपराओं को जीवंत रखने का प्रभावी माध्यम भी हैं। आयोजन से जुड़े लोगों का उद्देश्य पुरानी नाट्य परंपरा को फिर से स्थापित करना और युवाओं को लोक संस्कृति से जोड़ना रहा। दर्शकों की उत्साहपूर्ण भागीदारी ने इस प्रयास को नई ऊर्जा दी। सुरभि दुर्गा पूजा समिति की इस पहल से क्षेत्र में सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने और आने वाले वर्षों में पारंपरिक नाटकों के मंचन की परंपरा मजबूत होने की उम्मीद जगी है।

