पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में मरीजों को इलाज और जांच के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कैंसर, किडनी समेत गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को साधारण जांच के लिए भी घंटों दौड़-भाग करनी पड़ रही है, जबकि कई जांचों के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में जांच प्रक्रियाएं जटिल हैं, जिसके कारण मरीजों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। अल्ट्रासाउंड जैसी महत्वपूर्ण जांच के लिए मरीजों को तीन महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है। एक जांच के लिए 5 घंटे, कई विभागों के चक्कर एक मरीज के परिजन ने बताया कि FNAC (फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी) जांच कराने में करीब पांच घंटे लग गए। सबसे पहले सैंपल स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) में लिया गया, फिर उसे जमा करने के लिए रेडियोलॉजी विभाग भेजा गया, जो करीब 200 मीटर दूर है। वहां बिल की फोटोकॉपी मांगी गई, जिसके लिए उन्हें अस्पताल से बाहर जाना पड़ा। इसके बाद सैंपल को पुरानी बिल्डिंग की दूसरी मंजिल स्थित माइक्रोबायोलॉजी विभाग में जमा करने को कहा गया, जो कैंसर विभाग से लगभग 200 मीटर की दूरी पर है। इस तरह एक ही जांच के लिए मरीजों और उनके परिजनों को अलग-अलग भवनों के कई चक्कर लगाने पड़े। परिजनों ने बताया कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए इतनी भागदौड़ करना उनकी शारीरिक स्थिति को और अधिक प्रभावित कर रहा है। मरीज खुद ढो रहे सैंपल, बढ़ रही परेशानी अस्पताल की व्यवस्था का बड़ा सवाल यह है कि कई मामलों में मरीजों या उनके परिजनों को खुद ही सैंपल लेकर एक विभाग से दूसरे विभाग जाना पड़ता है। कागजी औपचारिकताएं—बिल की कॉपी, अलग-अलग काउंटर पर जमा, बार-बार लाइन लगना, इससे परेशानी और बढ़ जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में न सिर्फ समय बर्बाद होता है, बल्कि प्रक्रिया में लंबा वक्त बीतने से मरीज की स्थिति खतरनाक हो जाती है। खासकर तब, जब वह कैंसर या अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हो। अल्ट्रासाउंड के लिए 3-4 महीने की वेटिंग अस्पताल में सिर्फ FNAC ही नहीं, बल्कि अन्य जांचों के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। जहानाबाद के एक मरीज के परिजन ने बताया कि 14 अप्रैल को अल्ट्रासाउंड के लिए रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन जांच की तारीख 30 जुलाई मिली। यानी करीब तीन महीने का इंतजार। परिजनों का कहना है कि इतनी लंबी वेटिंग के दौरान मरीज की स्थिति और बिगड़ सकती है, जिससे इलाज और मुश्किल हो जाता है। डायलिसिस मरीजों की हालत सबसे खराब किडनी मरीजों के लिए स्थिति और चिंताजनक है। IGIMS में डायलिसिस यूनिट में सिर्फ 14 मशीनें हैं, जबकि रोजाना 60 से ज्यादा मरीज पहुंचते हैं। कई मरीजों को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। समय पर डायलिसिस नहीं मिलने से जान का खतरा बढ़ जाता है मजबूरी में मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां एक बार डायलिसिस कराने में 2,000 से 3,000 रुपये तक खर्च आता है। गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए यह खर्च उठाना आसान नहीं है। मरीजों के तीखे सवाल मरीज और उनके परिजन व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं: मरीजों का कहना है कि अगर प्रशासन खुद आम मरीज बनकर इस प्रक्रिया से गुजरे, तो उन्हें असली समस्या समझ में आएगी। अस्पताल प्रशासन का पक्ष अस्पताल प्रशासन का कहना है कि IGIMS में रोजाना 5000 से 5500 मरीज ओपीडी में आते हैं, जिसे सीमित संसाधनों और डॉक्टरों के साथ संभालना चुनौती है। अल्ट्रासाउंड में देरी को लेकर प्रशासन ने माना कि मरीजों की संख्या मशीनों और डॉक्टरों की क्षमता से ज्यादा है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि जहां समन्वय की कमी है, वहां सुधार की कोशिश की जाएगी।
सुधार की जरूरत साफ IGIMS जैसे बड़े अस्पताल में मरीजों का दबाव स्वाभाविक है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था मरीजों के लिए कठिन होती जा रही है। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए समय सबसे अहम होता है। ऐसे में घंटों की दौड़-भाग और महीनों की वेटिंग उनकी मुश्किलों को और बढ़ा रही है। जरूरत है कि अस्पताल प्रशासन व्यवस्था को सरल, तेज और मरीज-केंद्रित बनाए, ताकि समय पर इलाज शुरू हो सके और मरीजों को राहत मिल सके। सुधारों नहीं होने पर मरीजों की परेशानी बढ़ेगी IGIMS में इलाज कराने आए मरीज पहले ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में जांच के लिए घंटों की दौड़ और महीनों की वेटिंग उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देती है। जरूरत इस बात की है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों की सुविधा को प्राथमिकता दे और व्यवस्था को आसान, तेज और बेहतर बनाए, ताकि समय पर इलाज शुरू हो सके और मरीजों को बड़ी राहत मिल सके। पटना के इंदिरा गांधी आयुर्विज्ञान संस्थान (IGIMS) में मरीजों को इलाज और जांच के लिए भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। कैंसर, किडनी समेत गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को साधारण जांच के लिए भी घंटों दौड़-भाग करनी पड़ रही है, जबकि कई जांचों के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ रहा है। अस्पताल में जांच प्रक्रियाएं जटिल हैं, जिसके कारण मरीजों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है। अल्ट्रासाउंड जैसी महत्वपूर्ण जांच के लिए मरीजों को तीन महीने तक इंतजार करना पड़ रहा है। एक जांच के लिए 5 घंटे, कई विभागों के चक्कर एक मरीज के परिजन ने बताया कि FNAC (फाइन नीडल एस्पिरेशन साइटोलॉजी) जांच कराने में करीब पांच घंटे लग गए। सबसे पहले सैंपल स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट (SCI) में लिया गया, फिर उसे जमा करने के लिए रेडियोलॉजी विभाग भेजा गया, जो करीब 200 मीटर दूर है। वहां बिल की फोटोकॉपी मांगी गई, जिसके लिए उन्हें अस्पताल से बाहर जाना पड़ा। इसके बाद सैंपल को पुरानी बिल्डिंग की दूसरी मंजिल स्थित माइक्रोबायोलॉजी विभाग में जमा करने को कहा गया, जो कैंसर विभाग से लगभग 200 मीटर की दूरी पर है। इस तरह एक ही जांच के लिए मरीजों और उनके परिजनों को अलग-अलग भवनों के कई चक्कर लगाने पड़े। परिजनों ने बताया कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए इतनी भागदौड़ करना उनकी शारीरिक स्थिति को और अधिक प्रभावित कर रहा है। मरीज खुद ढो रहे सैंपल, बढ़ रही परेशानी अस्पताल की व्यवस्था का बड़ा सवाल यह है कि कई मामलों में मरीजों या उनके परिजनों को खुद ही सैंपल लेकर एक विभाग से दूसरे विभाग जाना पड़ता है। कागजी औपचारिकताएं—बिल की कॉपी, अलग-अलग काउंटर पर जमा, बार-बार लाइन लगना, इससे परेशानी और बढ़ जाती है। इस पूरी प्रक्रिया में न सिर्फ समय बर्बाद होता है, बल्कि प्रक्रिया में लंबा वक्त बीतने से मरीज की स्थिति खतरनाक हो जाती है। खासकर तब, जब वह कैंसर या अन्य गंभीर बीमारी से पीड़ित हो। अल्ट्रासाउंड के लिए 3-4 महीने की वेटिंग अस्पताल में सिर्फ FNAC ही नहीं, बल्कि अन्य जांचों के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ रहा है। जहानाबाद के एक मरीज के परिजन ने बताया कि 14 अप्रैल को अल्ट्रासाउंड के लिए रजिस्ट्रेशन कराया, लेकिन जांच की तारीख 30 जुलाई मिली। यानी करीब तीन महीने का इंतजार। परिजनों का कहना है कि इतनी लंबी वेटिंग के दौरान मरीज की स्थिति और बिगड़ सकती है, जिससे इलाज और मुश्किल हो जाता है। डायलिसिस मरीजों की हालत सबसे खराब किडनी मरीजों के लिए स्थिति और चिंताजनक है। IGIMS में डायलिसिस यूनिट में सिर्फ 14 मशीनें हैं, जबकि रोजाना 60 से ज्यादा मरीज पहुंचते हैं। कई मरीजों को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता है। समय पर डायलिसिस नहीं मिलने से जान का खतरा बढ़ जाता है मजबूरी में मरीजों को निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है, जहां एक बार डायलिसिस कराने में 2,000 से 3,000 रुपये तक खर्च आता है। गरीब और मध्यम वर्ग के मरीजों के लिए यह खर्च उठाना आसान नहीं है। मरीजों के तीखे सवाल मरीज और उनके परिजन व्यवस्था पर सवाल उठा रहे हैं: मरीजों का कहना है कि अगर प्रशासन खुद आम मरीज बनकर इस प्रक्रिया से गुजरे, तो उन्हें असली समस्या समझ में आएगी। अस्पताल प्रशासन का पक्ष अस्पताल प्रशासन का कहना है कि IGIMS में रोजाना 5000 से 5500 मरीज ओपीडी में आते हैं, जिसे सीमित संसाधनों और डॉक्टरों के साथ संभालना चुनौती है। अल्ट्रासाउंड में देरी को लेकर प्रशासन ने माना कि मरीजों की संख्या मशीनों और डॉक्टरों की क्षमता से ज्यादा है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि जहां समन्वय की कमी है, वहां सुधार की कोशिश की जाएगी।
सुधार की जरूरत साफ IGIMS जैसे बड़े अस्पताल में मरीजों का दबाव स्वाभाविक है, लेकिन मौजूदा व्यवस्था मरीजों के लिए कठिन होती जा रही है। गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए समय सबसे अहम होता है। ऐसे में घंटों की दौड़-भाग और महीनों की वेटिंग उनकी मुश्किलों को और बढ़ा रही है। जरूरत है कि अस्पताल प्रशासन व्यवस्था को सरल, तेज और मरीज-केंद्रित बनाए, ताकि समय पर इलाज शुरू हो सके और मरीजों को राहत मिल सके। सुधारों नहीं होने पर मरीजों की परेशानी बढ़ेगी IGIMS में इलाज कराने आए मरीज पहले ही गंभीर बीमारियों से जूझ रहे होते हैं। ऐसे में जांच के लिए घंटों की दौड़ और महीनों की वेटिंग उनकी मुश्किलों को और बढ़ा देती है। जरूरत इस बात की है कि अस्पताल प्रशासन मरीजों की सुविधा को प्राथमिकता दे और व्यवस्था को आसान, तेज और बेहतर बनाए, ताकि समय पर इलाज शुरू हो सके और मरीजों को बड़ी राहत मिल सके।


