Ahmedabad news: देश में हर साल करीब एक से डेढ़ लाख मरीजों को कॉर्निया प्रत्यारोपण की जरूरत होती है, जबकि 55 से 60 हजार ही कॉर्निया उपलब्ध हो पाते हैं। हर साल 20 से 25 हजार नए मरीज जुड़ते हैं। इसलिए चक्षुदान के प्रति जागरूकता बढ़ाना जरूरी है। अब एक व्यक्ति के चक्षुदान से तीन से चार दृष्टिहीन लोगों को रोशनी मिल सकती है। कॉर्निया की अलग-अलग परतों को जरूरत के अनुसार अलग कर प्रत्यारोपित किया जा सकता है। स्वास्थ्य मंत्री प्रफुल पानशेरिया ने राज्य विधानसभा में कांग्रेस विधायकों के सवाल के जवाब में यह जानकारी देते हुए कहा कि अंगदान और अंग प्रत्यारोपण के क्षेत्र में गुजरात देश में अग्रणी है और यह राज्य के लिए गौरव की बात है।
उन्होंने बताया कि सूरत जिले की विभिन्न स्वास्थ्य संस्थाओं को वर्ष 2024-25 और 2025-26 में कुल 2645 चक्षुदान प्राप्त हुए। सरकारी मेडिकल कॉलेज-सिविल अस्पताल में क्रमश: 152 और 118, स्मीमेर अस्पताल में 47 और 32, दिव्य चक्षु आइ बैंक में 493 और 498 तथा लोकदृष्टि ट्रस्ट में 776 और 529 चक्षुदान मिले। इस तरह इन संस्थाओं को दोनों वर्षों में क्रमश: 1468 और 1177 चक्षुदान प्राप्त हुए।
100 में 20-30 कॉर्निया ही प्रत्यारोपण योग्य
मंत्री के अनुसार, आधुनिक चिकित्सा तकनीक ने नेत्रदान को और अधिक उपयोगी बना दिया है। पहले एक कॉर्निया का इस्तेमाल एक ही मरीज के लिए किया जाता था। अब तकनीक के जरिए कॉर्निया की तीन-चार परतों में से मरीज की जरूरत के अनुरूप परत अलग कर प्रत्यारोपित की जाती है। इससे एक चक्षुदान का लाभ तीन-चार मरीजों तक पहुंच सकता है। चक्षुदान में प्राप्त 100 कॉर्निया में से करीब 20 से 30 ही प्रत्यारोपण के लिए उपयोगी होते हैं। कॉर्निया प्रत्यारोपण छह सरकारी अस्पतालों में किया जा रहा है। मंत्री ने कहा कि नई आई बैंक खोलने के लिए करीब 40 लाख रुपए तथा प्रत्येक चक्षुदान स्वीकार करने पर 2,000 रुपए की सरकारी सहायता दी जाती है। आई डोनेशन सेंटर खोलने के लिए भी एक लाख रुपए की ग्रांट का प्रावधान है।
150 से 200 किडनी ही उपलब्ध, जरूरत 2000 की
उन्होंने कहा कि अंगदान और अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया नेशनल ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (नोट्टो) और राज्य ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोट्टो) के नियमों के तहत सॉफ्टवेयर आधारित है। इसमें मरीज को उसकी व्यक्तिगत पहचान, सिफारिश या प्रभाव के आधार पर प्राथमिकता नहीं मिलती, बल्कि पंजीकरण और निर्धारित नियमों के अनुसार अंग आवंटित किए जाते हैं। गुजरात में जागरूकता के बावजूद हर वर्ष करीब 150 से 200 किडनी ही उपलब्ध हो पाती हैं, जबकि जरूरत 2,000 से अधिक की है।
कॉर्निया से जुड़ा अंधत्व ठीक हो सकता है
मंत्री ने बताया कि जन्मजात अंधत्व वाले बच्चे की समस्या यदि कॉर्निया से जुड़ी है तो जांच के बाद ऑपरेशन से उसका उपचार संभव है, लेकिन रेटिना या आंख की अंदरूनी नसें क्षतिग्रस्त होने पर दृष्टि लौटाना संभव नहीं होता। स्कूलों और सिविल अस्पतालों के नेत्र विभागों में नियमित जांच के जरिए ऐसे मामलों की पहचान की जा रही है। उन्होंने यह भी बताया कि कॉक्लियर इम्प्लांट करा चुके 612 बच्चों के सॉफ्टवेयर अपग्रेड के लिए प्रति बच्चा तीन लाख रुपए की अतिरिक्त सहायता मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल की मंजूरी से दी गई है। इससे बच्चों को स्पीच थैरेपी के जरिए सुनने और बोलने में मदद मिल रही है।

