बसपा में चल रहा घमासान अब केवल ससुर-दामाद के संन्यास या निष्कासन तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे पार्टी के अंदर की दो सबसे शक्तिशाली लॉबियों के बीच वर्चस्व की जंग है। एक तरफ पार्टी के इकलौते राज्यसभा सांसद रामजी गौतम और उनके समर्थक हैं। दूसरी ओर, अशोक सिद्धार्थ और आकाश आनंद गुट है। इसमें ससुर-दामाद की जोड़ी फिलहाल पस्त नजर आ रही है। अब देखना यह है कि मायावती चुनाव से पहले आकाश को लेकर कोई नया फॉर्मूला निकालेंगी या नहीं। आखिर इस पूरे ‘पॉलिटिकल थ्रिलर’ के पीछे चल क्या रहा है? बसपा के इस नए पावर गेम के अंदरूनी सच, रामजी गौतम का मास्टरस्ट्रोक, सतीश चंद्र मिश्र की भूमिका और आकाश आनंद के बागी रुख की पूरी कहानी पढ़िए… जब-जब अशोक का पावर छीना, तब-तब रामजी मजबूत हुए लखीमपुर खीरी से आने वाले रामजी गौतम जमीनी कैडर से उठकर आगे बढ़े हैं। बसपा के इकलौते राज्यसभा सांसद गौतम को पार्टी में लाने और आगे बढ़ाने वाले अशोक सिद्धार्थ ही थे। समय के साथ दोनों नेताओं की गिनती मायावती के करीबी लोगों में होने लगी। यहीं से उनके बीच एक प्रतिस्पर्धा भी उभरी, जो समय के साथ गहराती गई। बसपा के कैडर में यह बात जगजाहिर है कि जब-जब अशोक सिद्धार्थ पार्टी में मजबूत हुए, तब-तब रामजी गौतम के पर काटे गए। उनके प्रभार वाले राज्य छीन लिए गए। लेकिन, जैसे ही अशोक सिद्धार्थ साइडलाइन हुए, रामजी गौतम का कद अचानक बढ़ गया। इस बार भी यही देखने को मिला। अशोक सिद्धार्थ पर गाज गिरते ही रामजी गौतम को 10 राज्यों को मिलाकर बने सेक्टर-1 का प्रभार सौंप दिया गया। सूत्रों के मुताबिक, रामजी गौतम ने 3 सितंबर को ही पार्टी के कुछ शीर्ष पदाधिकारियों के बीच यह कह दिया था, “आकाश आनंद को अगर बसपा में काम करना है, तो उनके ससुर अशोक सिद्धार्थ को राजनीति छोड़नी होगी।” 9 सितंबर को मायावती ने अपनी पोस्ट में ठीक इसी लाइन पर मुहर लगाकर साफ कर दिया कि पार्टी का नैरेटिव कौन तय कर रहा था? ‘पार्टी पर कब्जे’ का डर, कितना सच? अशोक सिद्धार्थ ने अपने संन्यास वाले पत्र में इशारों-इशारों में लिखा कि उनके राजनीतिक विरोधी ‘बहनजी’ के कान भर रहे हैं। मायावती को यह कहकर सतर्क किया जा रहा था कि अशोक सिद्धार्थ, आकाश आनंद के जरिए पूरी पार्टी पर कब्जा करना चाहते हैं। जबकि निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार, बसपा की केंद्रीय इकाई और मुख्य बॉडी में राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती, उपाध्यक्ष आनंद कुमार, महासचिव सतीश चंद्र मिश्र, यूपी बसपा अध्यक्ष विश्वनाथ पाल, मुनकाद अली, राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष श्रीधर, मेवालाल गौतम और केंद्रीय कार्यालय में सचिव आरके मित्तल जैसे लोग हैं। ये सभी मायावती के बेहद भरोसेमंद लोग हैं। ये किसी भी कीमत पर मायावती के खिलाफ जाकर अशोक और आकाश का साथ नहीं दे सकते। ऐसे में इन पदाधिकारियों के बिना दामाद-ससुर चाहकर भी पार्टी पर कानूनी तौर पर कब्जा नहीं कर सकते। लेकिन, ऐसा कहा जा रहा है कि ‘कान भरने की राजनीति’ ने इस डर को बसपा सुप्रीमो के दिमाग में बैठा दिया। आकाश पर सतीश चंद्र मिश्र की शिकायत से हुआ एक्शन इस पूरे घटनाक्रम में बसपा के रणनीतिकार सतीश चंद्र मिश्र का रोल भी बेहद निर्णायक बताया जा रहा है। 3 सितंबर को आकाश के पद छीने जाने के बाद दिल्ली के एक यूट्यूबर की सोशल मीडिया पर की गई पोस्ट को अशोक सिद्धार्थ ने री-पोस्ट किया था। इस पोस्ट में पार्टी नेतृत्व और कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे। पार्टी सूत्रों के अनुसार, इस री-पोस्ट का स्क्रीनशॉट और पूरा ब्योरा मायावती तक सतीश चंद्र मिश्र ने पहुंचाया। मायावती ने इसे अनुशासनहीनता का सबसे बड़ा प्रमाण माना। समझाया गया कि इस तरह माहौल बनाकर दामाद-ससुर की जोड़ी पार्टी में आपके खिलाफ बगावत की आग भड़का रही है। इसके बाद मायावती ने आकाश आनंद की बजाय उनके छोटे भाई ईशान आनंद का कद बढ़ाते हुए उन्हें महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंप दी। अब आकाश आनंद की नाराजगी की वजह जान लें अशोक सिद्धार्थ ने भी अपने राजनीतिक संन्यास वाले पोस्ट में इसी भावनात्मक पहलू को छुआ। उन्होंने आकाश आनंद को लेकर लिखा कि वे मेरे दामाद बाद में बने, उससे पहले वे आपके (मायावती) भतीजे हैं। आपका खून का रिश्ता है। क्या फिर आकाश संभालेंगे कमान? बार-बार आरोप लगाकर पार्टी से निकालना, फिर शामिल करना और फिर कद घटा देना आकाश आनंद को नागवार गुजरा है। उन्हें लगा कि उनके राजनीतिक करियर को खिलौना बनाया जा रहा है। यही वजह है कि इस बार वे खुद अड़ गए। उन्होंने पार्टी में फिर कोई पद लेने से साफ मना कर दिया। जब उनसे कहा गया कि वे मायावती की पोस्ट को री-पोस्ट कर दें, तो इसे भी उन्होंने मना कर दिया। 3 सितंबर के बाद से उन्होंने मायावती की कोई भी पोस्ट री-पोस्ट करना बंद कर दिया है। आनंद कुमार (आकाश आनंद के पिता) और परिवार के कुछ अन्य सदस्य बीच का रास्ता निकालने और आकाश आनंद को शांत करने की कोशिश में जुटे हैं। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में चुनाव सामने हैं। ऐसे में अगर आकाश आनंद पूरी तरह किनारे रहते हैं, तो बसपा के पास युवा दलित चेहरे की शून्यता होगी। जिसे फिलहाल ईशान से तुरंत भरने की उम्मीद नहीं है। इसका फायदा आजाद समाज पार्टी (चंद्रशेखर आजाद) और सपा-कांग्रेस गठबंधन उठा सकते हैं। कांशीराम वर्सेज मायावती का राजनीतिक मॉडल बसपा प्रमुख मायावती ने हर राजनीतिक फैसले, खासकर आकाश को लेकर जो भी निर्णय लिए, उनमें एक बात कॉमन रही कि वे कांशीराम के संकल्पों पर चलकर पार्टी में परिवारवाद को आगे नहीं बढ़ाएंगी। लेकिन, पार्टी में सेकेंड लाइन मजबूत करने में कांशीराम और मायावती के मॉडल में ये फर्क दिखते हैं- वरिष्ठ पत्रकार हर्षवर्धन त्रिपाठी कहते हैं कि कांशीराम ने समय रहते एक दूरदर्शी फैसला लेकर मायावती के हाथों में आंदोलन की बागडोर सौंपी थी, जिससे आंदोलन थमा नहीं। लेकिन, मायावती की किसी को भी मजबूत उत्तराधिकारी न बनने देने की नीति ने बसपा के भविष्य को अनिश्चितता के भंवर में डाल दिया है। ———————– यह खबर भी पढ़ें – यूपी पुलिस विभाग सिपाहियों से 8 लाख जमा करवा रहा, परीक्षा देकर दरोगा बने यूपी में पुलिस विभाग के करीब 1700 जवान सिपाही की नौकरी छोड़ना चाहते हैं। इनका सिलेक्शन दरोगा, कंप्यूटर ऑपरेटर के अलावा अन्य भर्तियों में हो चुका है। इनमें से 75% अभ्यर्थियों का सिलेक्शन तो दरोगा के पद पर ही हुआ है। अब पुलिस विभाग इन्हें रिलीविंग लेटर नहीं दे रहा। विभाग की शर्त है कि ट्रेनिंग में हुए खर्च और वेतन की रकम लौटानी होगी। पढ़िए पूरी खबर…

