कांग्रेस का टिकट चाहिए तो खाते में ₹20 लाख दिखाओ:2027 के चुनाव में पार्टी फंड बंद; जीतने वाले विधायक को मिलेगा ₹40 लाख का ‘इनाम’

कांग्रेस का टिकट चाहिए तो खाते में ₹20 लाख दिखाओ:2027 के चुनाव में पार्टी फंड बंद; जीतने वाले विधायक को मिलेगा ₹40 लाख का ‘इनाम’

2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अपने प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने के लिए पार्टी फंड नहीं देगी। टिकट का दावेदार चुनाव लड़ने में आर्थिक रूप से कितना सक्षम है, अब यह भी देखा जाएगा। टिकट की दावेदारी करने वाले व्यक्ति को अपने खाते में करीब 20 लाख रुपए दिखाने होंगे। पार्टी का मानना है कि जो व्यक्ति अपने चुनाव अभियान की शुरुआत में खुद खर्च करने की स्थिति में नहीं होगा, उसके लिए मजबूती से चुनाव लड़ना भी मुश्किल हो सकता है। पार्टी ने प्रत्याशी चुनने के लिए सिर्फ आर्थिक स्थिति को अहम आधार नहीं बनाया है, बल्कि क्षेत्र में पकड़, सामाजिक समीकरण और संगठन से जुड़ाव को भी अहमियत दी जा रही है। पहले जानिए ‘पार्टी फंड’ बंद करने के पीछे क्या वजह एक कांग्रेस नेता के मुताबिक, पिछले कई विधानसभा चुनावों के अनुभवों को देखते हुए यह कड़ा कदम उठाया गया है। दरअसल, इससे पहले के चुनावों में कांग्रेस अपने प्रत्याशियों को करीब 40 लाख रुपए का फंड देती थी। यह दो फेज में दिया जाता था। पहले 25 लाख, फिर 15 लाख रुपए। लेकिन, पार्टी की अंदरूनी समीक्षा में यह बात सामने आई कि कई सीटों पर दावेदारों का मुख्य उद्देश्य चुनाव जीतना या मजबूती से लड़ना नहीं था। उनका ध्यान पार्टी से मिलने वाले फंड पर ज्यादा रहता था। पार्टी की अंदरूनी समीक्षा में 3 बड़े मुद्दे सामने आए- 1. पैसा बचाने की कोशिश : कई उम्मीदवार चुनावी अभियान में पूरी ताकत लगाने के बजाय पार्टी से मिले पैसों का बड़ा हिस्सा बचाने की कोशिश करते थे। 2. धीमी और कमजोर लड़ाई : आर्थिक रूप से पार्टी पर निर्भर रहने वाले उम्मीदवार चुनाव के आखिरी दिनों तक प्रचार में उम्मीद से ज्यादा तेजी नहीं दिखा पाते थे। 3. संगठन को नुकसान : इसका सीधा असर कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन और कार्यकर्ताओं के मनोबल पर पड़ा। इससे कई सीटों पर पार्टी की लड़ाई महज औपचारिकता बनकर रह गई। कांग्रेस में अब टिकट की स्क्रीनिंग 3 पैमानों पर होगी सूत्रों के मुताबिक, 2027 के चुनावों के लिए उम्मीदवारों का चयन करने के लिए कांग्रेस की स्क्रीनिंग कमेटी ने 3 मानक तय किए हैं। अब किसी भी दावेदार को टिकट पाने के लिए इन 3 कसौटियों पर खरा उतरना होगा- 1. आर्थिक क्षमता : दावेदार चुनाव प्रचार, गाड़ियां और कार्यालय के खर्च को अपने स्तर पर उठाने में सक्षम हो। उसके खाते में कम से कम ₹20 लाख की रकम दिखे, जिससे वह शुरुआत में ही आर्थिक परेशानी में न आए। 2. सामाजिक आधार : प्रत्याशी की अपने विधानसभा क्षेत्र में जातीय और सामाजिक पकड़ कैसी है? क्या उसका अपना कोई वोटबैंक है, जो पार्टी के सिंबल के साथ जुड़ सके? 3. राजनीतिक स्वीकार्यता : उम्मीदवार में भाजपा और सपा जैसी मजबूत पार्टियों के सामने मजबूती से खड़े होने और आक्रामक तरीके से चुनाव लड़ने की क्षमता है या नहीं। यानी पार्टी केवल ‘टिकट मांगने वाले’ व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने के बजाय ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो चुनाव में अपना पैसा, समय और राजनीतिक ताकत लगाने के लिए तैयार हो। पार्टी से जुड़े नेताओं का मानना है कि इससे टिकट लेने के लिए सिर्फ आर्थिक लाभ की उम्मीद रखने वाले दावेदारों को छांटने में मदद मिलेगी। 125 सीटों पर कांग्रेस का ज्यादा फोकस कांग्रेस की यह नई स्क्रीनिंग व्यवस्था केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में से करीब 125 चिह्नित सीटों पर संभावित प्रत्याशियों की बारीकी से जांच चल रही है। इन 125 सीटों पर कांग्रेस अपने पुराने चेहरों के साथ दूसरी पार्टियों, खासकर सपा-बसपा से आने वाले मजबूत या असंतुष्ट नेताओं पर भी नजर रखे है। इसके पीछे पार्टी की एक सोची-समझी रणनीति है। समाजवादी पार्टी के साथ सीट बंटवारे की बातचीत शुरू होने से पहले अपनी स्थिति मजबूत करना। कांग्रेस सपा के साथ बातचीत शुरू होने से पहले 2 बातें पूरी तरह साफ कर लेना चाहती है। पहला- प्रदेश की किन-किन सीटों पर उसका ठोस और मजबूत दावा बनता है। दूसरी- उन सीटों पर उसके पास चुनाव जीतने की क्षमता रखने वाले कौन-कौन से ‘जिताऊ चेहरे’ मौजूद हैं। 2017 के फॉर्मूले पर सपा से सीट बंटवारे की तैयारी सीट बंटवारे को लेकर कांग्रेस 2017 के विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को अपना मुख्य आधार बनाने की तैयारी में है। 2017 के चुनाव से पहले सपा सत्ता में थी। तब सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था। उस समय कांग्रेस को 106 सीटें दी गई थीं। हालांकि, 8 सीटों पर दोनों दलों के बीच फ्रेंडली फाइट हुई थी। कांग्रेस के अंदर रणनीति बन रही है कि जब 2017 में सत्ता में रहते हुए सपा कांग्रेस को 100 से ज्यादा सीटें दे सकती थी। इसलिए 2027 में जब दोनों दल विपक्ष में हैं और एक-दूसरे के सहयोगी हैं। फिर कांग्रेस 100 से कम सीटों पर समझौता क्यों करे? यूपी में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस का मानना है कि सपा को भी उसकी जरूरत है। क्योंकि, कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत जनाधार है। कांग्रेस चाहती है- सपा से बातचीत यूपी नेतृत्व ही करे सीट बंटवारे की बातचीत को लेकर भी दोनों दलों के बीच एक दिलचस्प राजनीतिक खींचतान देखने को मिल रही है। कांग्रेस आलाकमान ने संकेत दिए हैं कि यूपी में सीटों का बंटवारा तय करने की जिम्मेदारी प्रदेश कांग्रेस प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम और प्रदेश अध्यक्ष अजय राय के नेतृत्व वाली राज्य इकाई की होगी। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि अगर कांग्रेस अपनी प्रदेश इकाई को ही सीट बंटवारे की बातचीत का अधिकार देती है, तो इससे यह संदेश जाएगा कि पार्टी अपनी राज्य इकाई को स्वतंत्र रूप से फैसले लेने और गठबंधन में अपनी स्थिति मजबूत करने का पूरा अधिकार दे रही है। संगठन में बड़ा फेरबदल होगा, जिलाध्यक्ष बदले जाएंगे कांग्रेस 2027 के चुनाव की तैयारी में केवल प्रत्याशियों के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने पूरे संगठन में बदलाव करने जा रही है। पार्टी जल्द ही उत्तर प्रदेश के सभी 134 जिलाध्यक्षों और महानगर अध्यक्षों को बदलने वाली है। इनकी नियुक्ति मार्च- 2025 में हुई थी। नया संगठन राहुल गांधी की ओर से तय किए गए ‘सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व’ के आधार पर तैयार होगा। नई प्रदेश कार्यकारिणी की घोषणा जिले के OBC और दलित फॉर्मूले को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। —————————- यह खबर भी पढ़ें- यूपी में रंगों की राजनीति कितनी असरदार?, क्या जातीय-धार्मिक समीकरण भी प्रभावित होते हैं; पार्टियों ने खुद को रंगों से क्यों जोड़ा अखिलेश यादव लाल की जगह नीले गमछे में नजर आए। इसको दलित वोटर को साधने की रणनीति की तरह देखा गया। सपा ने अपनी छात्र विंग का रंग भी मेहरून से बदलकर नीला कर दिया। यूपी में पार्टियों ने रंगों का इस्तेमाल अपनी विचारधारा को वोटर्स तक पहुंचाने के लिए किया। आखिर रंगों का यह खेल जाति-धर्म के समीकरणों को कैसे प्रभावित करता है? जानिए यूपी एक्सप्लेनर में…

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