राजोआना की फांसी केस की आज सुनवाई:2012 से राष्ट्रपति के पास लंबित दया याचिका, SC गुण-दोष के आधार पर करेगा सुनवाई

राजोआना की फांसी केस की आज सुनवाई:2012 से राष्ट्रपति के पास लंबित दया याचिका, SC गुण-दोष के आधार पर करेगा सुनवाई

पंजाब के पूर्व CM बेअंत सिंह की हत्या के मामले में पटियाला जेल में बंद बलवंत सिंह राजोआना की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग पर आज 28 अक्टूबर को सुनवाई होगी। केंद्र के इस रुख के बाद सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब वह राजोआना की याचिका पर उसके गुण-दोष के आधार पर सुनवाई करेगा। राजोआना की ओर से दलील दी गई है कि उसकी दया याचिका वर्ष 2012 से राष्ट्रपति के पास लंबित है। बैकअप मानव बम बनकर पहुंचा था राजोआना बलवंत सिंह राजोआना का मामला पूर्व CM बेअंत सिंह की हत्या से जुड़ा चर्चित केस है। 31 अगस्त 1995 को चंडीगढ़ में पंजाब सिविल सचिवालय के बाहर एक भीषण बम धमाका हुआ था, जिसमें तत्कालीन CM बेअंत सिंह और 17 अन्य लोगों की मौत हो गई थी। राजोआना उस समय पंजाब पुलिस में कांस्टेबल था और आतंकी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल से जुड़ा था। वह इस हमले में बैकअप मानव बम के रूप में खड़ा था। अगर पहला हमलावर दिलावर सिंह बब्बर नाकाम हो जाता तो राजोआना खुद को बम से उड़ाने वाला था। जुर्म कबूला, वकील नहीं किया, फांसी की सजा हुई दिसंबर 1995 में राजोआना को गिरफ्तार किया गया। उसने अदालत में बिना किसी पछतावे के अपना जुर्म कबूल किया। उसने अदालत में अपना बचाव करने के लिए वकील रखने या कोर्ट की ओर से दिए गए कानूनी प्रतिनिधि को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। 1 अगस्त 2007 को चंडीगढ़ की विशेष CBI कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई। साल 2010 में पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने भी इस सजा को बरकरार रखा। कोर्ट ने उसकी फांसी के लिए 31 मार्च 2012 की तारीख तय की थी। फांसी को उम्रकैद में बदलने की याचिका लंबित राजोआना ने खुद कोई दया याचिका दायर नहीं की, क्योंकि वह भारत के कानून को नहीं मानता था। हालांकि, SGPC ने उसके लिए राष्ट्रपति के पास दया याचिका दायर कर दी। पंजाब में कानून-व्यवस्था बिगड़ने के डर से तत्कालीन यूपीए सरकार ने मार्च 2012 में उसकी फांसी पर अंतरिम रोक लगा दी। साल 2019 में गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के मौके पर तत्कालीन एनडीए सरकार ने राजोआना की फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने का प्रस्ताव दिया। हालांकि, इस पर अंतिम आधिकारिक फैसला और अधिसूचना कभी जारी नहीं हो सकी और दया याचिका राष्ट्रपति के पास लंबित ही रही। बचाव पक्ष रिहाई की मांग कर रहा राजोआना पिछले 30 सालों से जेल में बंद है, जिसमें से करीब 15-16 साल उसने फांसी की कोठरी में बिताए हैं। राजोआना के वकीलों का तर्क है कि दया याचिका पर फैसला लेने में केंद्र सरकार और राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से हुई असाधारण और अनुचित देरी उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन है।

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